भूमाफियाओं से सुरक्षित रहेंगी जमीनें, अब भूमिहीन नहीं हो पाएंगे उत्तराखंडी

जनसरोकार से जुड़े मुद्दों पर गंभीर धामी सरकार आम जनमानस से किया अपना एक और वादा पूरा करने जा रही है। धामी सरकार का यह वादा है राज्य के लिए एक मजबूत भू-कानून बनाने का। उत्तराखंड में यदि भू-कानून समिति की सिफारिशें लागू होती हैं, तो व्यवस्थाएं पूर्व सीएम बीसी खंडूड़ी के समय से भी अधिक सख्त हो जाएंगी। धामी सरकार का भू-कानून, खंडूड़ी सरकार के भू-कानून से मजबूत होगा। दरअसल भू-समिति ने अपनी सिफारिशों में खंडूड़ी सरकार के भू-कानून की खामियां को भी दूर करने की भी बात कही है। इससे राज्य में जमीनों की बंदरबांट पर रोक लगेगी। राज्य के लोग भूमिहीन नहीं हो पाएंगे व भूमाफिया से भी जमीनें सुरक्षित रहेंगी। राज्य के लोग भूमिहीन न हो,उनके हकहकूक सुरक्षित रहें, सिफारिशों में इसका भी इंतजाम किया गया है। ऐसे में इन सिफारिशों को लागू कर सीएम के सामने अपना नाम उत्तराखंड के इतिहास में सुनहरे अक्षरों से दर्ज कराने का मौका है। इसके जरिए न सिर्फ उनका सियासी कद बढ़ेगा, बल्कि वे राजनीतिक रूप से भी बढ़त बना सकते हैं।

जनभावनाओं के अनुरूप बनेगा नया भू-कानून-धामी
भू-कानून के अध्ययन व परीक्षण को गठित समिति की रिपोर्ट मिलने के बाद मुख्यमंत्री धामी ने कहा कि सरकार शीघ्र ही समिति की रिपोर्ट का गहन अध्ययन कर व्यापक जन हित व प्रदेश हित में समिति की संस्तुतियों पर विचार करेगी। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का कहना है कि हमारी सरकार जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों को लेकर गंभीर है। उत्तराखंड में जमीनों का दुरुपयोग न हो और उद्योग व निवेश प्रभावित न हों, कानून में इसके लिए व्यवस्था की जाएगी। आर्थिक गतिविधियों को बनाए रखना है और प्राकृतिक संसाधनों का भी संरक्षण करना है। राज्य में उपलब्ध भूमि के संरक्षण, विकास कार्यों की आवश्यकता और जमीन खरीद के दुरुपयोग न होने देने में संतुलन स्थापित किया जाएगा।

एक ही व्यक्ति के नाम खरीदी जाएगी 250 वर्गमीटर भूमि
समिति ने 250 वर्गमीटर आवासीय भूमि खरीद की व्यवस्था बहाल रखने की संस्तुति की है, लेकिन इसका दुरुपयोग रोकने को कहा है। कोई व्यक्ति स्वयं या अपने परिवार के किसी सदस्य के नाम बिना अनुमति अपने जीवनकाल में अधिकतम 250 वर्गमीटर भूमि आवासीय उपयोग को खरीद सकता है। समिति ने संस्तुति की है कि परिवार के सभी सदस्यों के नाम अलग-अलग भूमि खरीद पर रोक लगाने के लिए परिवार के सभी सदस्यों के आधार कार्ड राजस्व अभिलेख से लिंक किए जाएं।
राज्य में जमीनों की बंदरबांट पर रोक लगेगी। राज्य के लोग भूमिहीन नहीं हो पाएंगे। भूमाफिया से राज्य की जमीनें बच सकेंगी। इस तरह पुष्कर के सामने हिमाचल के पहले सीएम यशवंत सिंह परमार बनने का मौका रहेगा। भू-कानून समिति ने एक परिवार के सभी लोगों का आधार नंबर राजस्व खाते से लिंक कर फर्जीवाड़ा रोकने का उपाय सुझाया गया है। इसी तरह निवेश के नाम पर बड़ी-बड़ी जमीनें घेरने वालों पर भी नकेल कसने का प्रावधान किया गया है। सिफारिश की गई है कि जमीनों पर यदि उद्योग या अन्य व्यावसायिक गतिविधि होती है तो उसमें 70 प्रतिशत रोजगार, स्थानीय लोगों के लिए सुनिश्चित कराना होगा। खेती और उद्यान के नाम पर कृषि भूमि लेकर खेल करने पर भी रोक लगाने की व्यवस्था की गई है। लोगों की जमीनें बची रहें, इसके लिए भूमि को लीज पर देने का मानक प्रस्तावित किया गया है। पहाड़ों पर बढ़ते अवैध निर्माण के चलते बने धार्मिक स्थलों पर भी नकेल कसने के प्रावधान किए गए हैं।

राजस्व रिकॉर्ड से लिंक किया जाए आधार कार्ड
राज्य में नगर निगम सीमा से बाहर दूसरे प्रदेश के लोगों के लिए जमीन खरीदने के सख्त मानक हैं। कोई भी बाहरी व्यक्ति 250 वर्ग मीटर से अधिक जमीन नहीं खरीद सकता। इसके बाद भी एक ही परिवार के कई सदस्यों के नाम पर अलग अलग 250 वर्ग मीटर से अधिक भूमि खरीदकर खेल कर दिया जाता है। भू कानून समिति ने इस पर रोक लगाने को पूरे परिवार के आधार राजस्व रिकॉर्ड से लिंक करने का नियम बनाने पर जोर दिया है।

अवैध रूप से धार्मिक स्थल का निर्माण अब संभव नहीं
राज्य में सार्वजनिक भूमि पर कब्जा कर अवैध रूप से धार्मिक स्थल का निर्माण अब संभव नहीं हो सकेगा। साथ में धार्मिक प्रयोजन के लिए भूमि खरीदने की छूट के साथ अब शर्तें जोड़ी जाएंगी। भू-कानून के अध्ययन व परीक्षण को गठित समिति ने धार्मिक उपयोग के लिए भूमि खरीद पर निर्णय शासन स्तर से लेने की संस्तुति की है। साथ में भूमि पर निर्माण के संबंध में अनिवार्य रूप से जिलाधिकारी की रिपोर्ट भी शासन को भेजी जाएगी। समिति ने अपनी रिपोर्ट में प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों में भूमि बंदोबस्त करने पर विशेष बल दिया है। भू-कानून को लेकर गठित समिति की संस्तुति पर अमल हुआ तो प्रदेश की पिछली एनडी तिवारी सरकार के कार्यकाल में वर्ष 2005-06 में धार्मिक प्रयोजन के लिए भूमि खरीदने की अनुमति पर पाबंदी लगना तय है। तिवारी सरकार के कार्यकाल में भू-कानून में धार्मिक उपयोग के लिए भूमि खरीद की अनुमति देने को जिलाधिकारी को अधिकृत किया गया था। यह व्यवस्था वर्तमान में भी लागू है। समिति ने इसमें संशोधन करने का सुझाव दिया है।

अवैध कब्जे रोकने को होगा नया प्रविधान
साथ ही नदी-नालों, वन क्षेत्रों, चारागाहों, सार्वजनिक भूमि पर अतिक्रमण का निर्माण या धार्मिक स्थल बनाने वालों के विरुद्ध नए भूमि कानून में कठोर दंड की व्यवस्था करने की संस्तुति समिति ने की है। दरअसल राज्य बनने के बाद विभिन्न क्षेत्रों में सार्वजनिक भूमि पर अतिक्रमण कर धार्मिक उपयोग में लाने और निर्माण कार्य करने के प्रकरण बढ़े हैं। धामी सरकार इस पर सख्त रुख अपनाने के संकेत दे चुकी है। अब समिति ने भी इस संबंध में अपनी संस्तुति दी है। इसमें कहा गया है कि ऐसे अवैध कब्जों के विरुद्ध प्रदेशव्यापी अभियान चलाया जाए। साथ ही ऐसे मामलों में संबंधित विभागों के अधिकारियों के विरुद्ध भी कार्रवाई होनी चाहिए। इसके लिए भू-कानून में प्रविधान करने को कहा गया है।

खाली पड़ी भूमि पर साइनबोर्ड लगाएं विभाग
समिति ने सरकारी विभाग की खाली पड़ी भूमि पर साइनबोर्ड लगाने का सुझाव भी दिया है। कुछ व्यक्तियों के एक साथ भूमि खरीद कर ऐसी व्यवस्था की जाती है कि इस भूमि के बीच अन्य किसी व्यक्ति की भूमि के लिए रास्ता नहीं मिले। रोके गए रास्ते को खोलने के लिए रास्ते के अधिकार की व्यवस्था करने का सुझाव दिया गया है।

सिडकुल की भूमि उद्योगों को ही दी जाए
भूमि की खरीद-बिक्री में पारदर्शिता, भूमि हस्तांतरण एवं स्वामित्व संबंधी समस्त प्रक्रिया आनलाइन करने की संस्तुति समिति ने की है। इस समस्त प्रक्रिया को एक वेबसाइट के माध्यम से पब्लिक डोमेन में डालने को कहा गया है। प्राथमिकता के आधार पर सिडकुल और औद्योगिक क्षेत्रों में खाली पड़ी भूमि या बंद पड़ी फैक्ट्रियों की भूमि का आवंटन औद्योगिक प्रयोजन के लिए करने को कहा गया है।

लीज पर ली जा सकेगी अन्य प्रयोजनों के लिए भूमि
पर्वतीय व मैदानी क्षेत्रों में उद्योगों, आयुष शिक्षा, स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा, उद्यान एवं विभिन्न प्रसंस्करण, पर्यटन, कृषि के लिए 12.50 एकड़ से ज्यादा भूमि आवेदक संस्था, फर्म, कंपनी या व्यक्ति को उसके आवेदन पर सरकार दे सकती है। समिति ने यह व्यवस्था समाप्त करने कर हिमाचल की भांति न्यूनतम भूमि आवश्यकता यानी इसेंसियलिटी सर्टिफिकेट के आधार पर देने की संस्तुति की है। समिति का कहना है कि केवल बड़े उद्योगों के अतिरिक्त चार-पांच सितारा होटल-रिसोर्ट, मल्टी स्पेशियलिटी अस्पताल, वोकेशनल-प्रोफेशनल इंस्टीट्यूट को ही इसेंशियलिटी सर्टिफिकेट के आधार पर भूमि खरीदने की अनुमति शासन से मिलनी चाहिए। अन्य प्रयोजनों के लिए लीज पर भूमि उपलब्ध कराने की व्यवस्था होनी चाहिए।

गैर कृषि घोषित भूमि उल्लंघन होने पर सरकार में हो सकेगी निहित
समिति ने अपनी संस्तुति में धारा-143 के साथ नई उपधारा जोड़ने की संस्तुति की है, ताकि खरीदी गई भूमि का दुरुपयोग न होने पाए। वर्तमान में गैर कृषि उपयोग को खरीदी गई भूमि को 10 दिन में एसडीएम धारा-143 के अंतर्गत गैर कृषि घोषित कर खतौनी में दर्ज करेगा। क्रय अनुमति आदेश में दो वर्ष में भूमि का उपयोग निर्धारित उद्देश्य में करने की शर्त रहती है। निर्धारित अवधि में ऐसा नहीं होने या किसी अन्य उपयोग होने पर भूमि को राज्य सरकार में निहित करने की व्यवस्था है। इस आदेश में गैर कृषि घोषित करने के बाद भूमि उपयोग का उल्लंघन होने की स्थिति में राज्य सरकार में उसे निहित करने का प्रविधान नहीं है। समिति ने नई उपधारा जोड़ते हुए इस भूमि को दोबारा कृषि भूमि घोषित कर राज्य सरकार में निहित करने की व्यवस्था बनाने को कहा है।

अधिकतम तीन वर्ष में करना होगा भूमि का उपयोग
वर्तमान में भूमि खरीदने के बाद भूमि का उपयोग करने के लिए दो वर्ष की अवधि निर्धारित है। राज्य सरकार को विवेक के अनुसार इसे बढ़ाने का अधिकार दिया गया है। समिति ने इसमें संशोधन कर विशेष परिस्थिति में यह अवधि अधिकतम एक वर्ष बढ़ाने यानी तीन वर्ष करने की संस्तुति की है। समिति ने कहा कि विभिन्न प्रयोजनों के लिए जो भूमि खरीदी जाएगी, उसमें समूह-ग और समूह-घ श्रेणियों में स्थानीय व्यक्तियों को 70 प्रतिशत रोजगार आरक्षण रोजगार देने और इसकी सूचना अनिवार्य रूप से शासन को उपलब्ध कराने की व्यवस्था हो।

इसेंसियलिटी सर्टिफिकेट के आधार पर भूमि खरीद की अनुमति
राज्य में अब 12.50 एकड़ से अधिक भूमि खरीद की अनुमति केवल बड़े उद्योगों के अतिरिक्त चार-पांच सितारा होटल-रिसोर्ट, मल्टी स्पेशियलिटी अस्पताल, व्यावसायिक व रोजगारपरक शिक्षण संस्थाओं को होगी। उत्तराखंड में भूमि खरीद की यह अनुमति हिमाचल की भांति न्यूनतम भूमि आवश्यकता आकलित कर जारी किए जाने वाले इसेंसियलिटी सर्टिफिकेट के आधार पर मिलेगी। जमीन खरीदने की अनुमति जिलाधिकारी से नहीं मिलेगी। यह अधिकार शासन के पास होगा। भूमि खरीद का दुरुपयोग और अनाप-शनाप बिक्री पर रोक लगाई जाएगी।

कृषि, उद्यान व एमएसएमइ के लिए डीएम को नहीं होगा अधिकार
प्रदेश में वर्तमान में जिलाधिकारी कृषि अथवा औद्यानिक प्रयोजन के लिए कृषि भूमि खरीदने की अनुमति देते हैं। समिति ने पाया कि कई प्रकरणों में ऐसी अनुमति का दुरुपयोग हुआ। कृषि व औद्यानिक उपयोग के स्थान पर रिसोर्ट या निजी बंगले बनाए गए। इससे पर्वतीय क्षेत्रों में व्यक्ति भूमिहीन हो रहे हैं और रोजगार सृजन भी नहीं हो रहा है। समिति ने संस्तुति की है कि ऐसी अनुमति जिलाधिकारी के स्तर से न दी जाए।

वर्तमान भू-कानून के अध्ययन व परीक्षण को पूर्व मुख्य सचिव सुभाष कुमार की अध्यक्षता में गठित समिति ने अपनी बहुप्रतीक्षित रिपोर्ट सोमवार को मुख्यमत्री पुष्कर सिंह धामी को सौंप दी। समिति ने भूमि खरीद के उद्देश्य के दुरुपयोग को रोकने के लिए जिला, मंडल व शासन स्तर पर टास्क फोर्स गठित करने की संस्तुति की है। टास्क फोर्स के माध्यम से भूमि को सरकार में निहित किया जाएगा। प्रदेश में वर्तमान भू-कानून का तीव्र विरोध होने पर जुलाई, 2021 में इस समिति का गठन किया गया था। सालभर बाद समिति ने अपनी रिपोर्ट सौंपी।

प्रदेश हित में भू कानून की संस्तुतियों पर सरकार विचार कर कानून में करेगी संशेधानः सीएम

राज्य में भू – कानून के अध्ययन व परीक्षण के लिए गठित समिति ने आज प्रदेश के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को अपनी रिपोर्ट सौंप दी है। समिति ने प्रदेश हित में निवेश की संभावनाओं और भूमि के अनियंत्रित क्रय और विक्रय के बीच संतुलन स्थापित करते हुए अपनी 23 संस्तुतियां सरकार को दी हैं।

आज मुख्यमंत्री कैंप कार्यालय में समिति के अध्यक्ष व प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव सुभाष कुमार, समिति के सदस्य व श्री बदरीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति के सदस्य अजेंद्र अजय, पूर्व आईएएस अधिकारी अरुण ढौंडियाल व डी.एस.गर्व्याल और समिति के पदेन सदस्य सचिव के रूप में हाल तक सचिव राजस्व का कार्यभार संभाल रहे दीपेंद्र कुमार चौधरी ने मुख्यमंत्री से भेंट की। इस अवसर पर मुख्यमंत्री धामी ने कहा कि सरकार शीघ्र ही समिति की रिपोर्ट का गहन अध्ययन कर व्यापक जनहित व प्रदेश हित में समिति की संस्तुतियों पर विचार करेगी और भू – कानून में संशोधन करेगी।

जुलाई 2021 में सीएम धामी ने उच्च स्तरीय समिति गठित की थी

उल्लेखनीय है कि सीएम ने जुलाई 2021 में प्रदेश का मुख्यमंत्री नियुक्त होने के बाद उसी वर्ष अगस्त माह में एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया था। समिति को राज्य में औद्योगिक विकास कार्यों हेतु भूमि की आवश्यकता तथा राज्य में उपलब्ध भूमि के संरक्षण के मध्य संतुलन को ध्यान में रख कर विकास कार्य प्रभावित न हों, इसको दृष्टिगत रखते हुए विचार – विमर्श कर अपनी संस्तुति सरकार को सौंपनी थी।

सभी हितधारकों से सुझाव लेकर गहन विचार विमर्श कर 80 पृष्ठ में तैयार की रिपोर्ट

समिति ने राज्य के हितबद्ध पक्षकारों, विभिन्न संगठनों, संस्थाओं से सुझाव आमंत्रित कर गहन विचार – विमर्श कर लगभग 80 पृष्ठों में अपनी रिपोर्ट तैयार की है। इसके अलावा समिति ने सभी जिलाधिकारियों से प्रदेश में अब तक दी गई भूमि क्रय की स्वीकृतियों का विवरण मांग कर उनका परीक्षण भी किया।

राज्य में निवेश और रोजगार बढ़ाने के साथ भूमि के दुरुपयोग को रोकने पर फोकस

समिति ने अपनी संस्तुतियों में ऐसे बिंदुओं को सम्मिलित किया है जिससे राज्य में विकास के लिए निवेश बढ़े और रोजगार के अवसरों में वृद्धि हो। साथ ही भूमि का अनावश्यक दुरूपयोग रोकने की भी अनुशंसा की है।

समिति ने वर्तमान में प्रदेश में प्रचलित उत्तराखंड (उत्तर प्रदेश जमींदारी विनाश एवं भूमि व्यवस्था अधिनियम, 1950) यथा संशोधित और यथा प्रवृत्त में जन भावनाओं के अनुरूप हिमाचल प्रदेश की तरह कतिपय प्रावधानों की संस्तुति की है।

समिति की प्रमुख संस्तुतियां

वर्तमान में जिलाधिकारी द्वारा कृषि अथवा औद्यानिक प्रयोजन हेतु कृषि भूमि क्रय करने की अनुमति दी जाती है। कतिपय प्रकरणों में ऐसी अनुमति का उपयोग कृषि/औद्यानिक प्रयोजन न करके रिसोर्ट/ निजी बंगले बनाकर दुरुपयोग हो रहा है। इससे पर्वतीय क्षेत्रों में लोग भूमिहीन हो रहें और रोजगार सृजन भी नहीं हो रहा है।

समिति ने संस्तुति की है कि ऐसी अनुमतियां जिलाधिकारी स्तर से ना दी जाऐं। शासन से ही अनुमति का प्रावधान हो।

वर्तमान में सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम श्रेणी के उद्योगों हेतु भूमि क्रय करने की अनुमति जिलाधिकारी द्वारा प्रदान की जा रही है। हिमांचल प्रदेश की भांति ही ये अनुमतियाँ, शासन स्तर से न्यूनतम भूमि की आवश्यकता के आधार पर, प्राप्त की जाएं।

वर्तमान में राज्य सरकार पर्वतीय एवं मैदानी में औद्योगिक प्रयोजनों, आयुष, शिक्षा, स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा, उद्यान एवं विभिन्न प्रसंस्करण, पर्यटन, कृषि के लिए 12.05 एकड़ से ज्यादा भूमि आवेदक संस्था/फर्म/ कम्पनी/ व्यक्ति को उसके आवेदन पर दे सकती है।

उपरोक्त प्रचलित व्यवस्था को समाप्त करते हुए हिमाचल प्रदेश की भांति न्यूनतम भूमि आवश्यकता के आधार पर दिया जाना उचित होगा।

वर्तमान में, गैर कृषि प्रयोजन हेतु खरीदी गई भूमि को 10 दिन में धारा- 143 के अंतर्गत गैर कृषि घोषित करते हुए खतौनी में दर्ज करेगा।
परन्तु क्रय अनुमति आदेश में 2 वर्ष में भूमि का उपयोग निर्धारित प्रयोजन में करने की शर्त रहती है। यदि निर्धारित अवधि में उपयोग न करने पर या किसी अन्य उपयोग में लाने/विक्रय करने पर राज्य सरकार में भूमि निहित की जाएगी, यह भी शर्त में उल्लखित रहता है।

यदि 10 दिन में गैर कृषि प्रयोजन हेतु क्रय की गई कृषि भूमि को “गैर कृषि“ घोषित कर दिया जाता है, तो फिर यह धारा-167 के अंतर्गत राज्य सरकार में (उल्लंघन की स्थिति में) निहित नहीं की जा सकती है।

अतः नई उपधारा जोङते हुए उक्त भूमि को पुनः कृषि भूमि घोषित करना होगा तत्पश्चात उसे राज्य सरकार में निहित किया जा सकता है।

कोई व्यक्ति स्वयं या अपने परिवार के किसी भी सदस्य के नाम बिना अनुमति के अपने जीवनकाल में अधिकतम 250 वर्ग मीटर भूमि आवासीय प्रयोजन हेतु खरीद सकता है ।

समिति की संस्तुति है कि परिवार के सभी सदस्यों के नाम से अलग अलग भूमि खरीद पर रोक लगाने के लिए परिवार के सभी सदस्यों के आधार कार्ड राजस्व अभिलेख से लिंक कर दिया जाए।

राज्य सरकार ’भूमिहीन’ को अधिनियम में परिभाषित करे। समिति का सुझाव है कि पर्वतीय क्षेत्र में न्यूनतम 5 नाली एवं मैदानी क्षेत्र में 0.5 एकड़ न्यूनतम भूमि मानक भूमिहीन’ की परिभाषा हेतु औचित्यपूर्ण होगा।

भूमि जिस प्रयोजन के लिए क्रय की गई, उसका उललंघन रोकने के लिए एक जिला / मण्डल / शासन स्तर पर एक टास्क फ़ोर्स बनायीं जाए। ताकि ऐसी भूमि को राज्य सरकार में निहित किया जा सके।

सरकारी विभाग अपनी खाली पड़ी भूमि पर साइनबोर्ड लगाएं।

कतिपय प्रकरणों में कुछ व्यक्तियों द्वारा एक साथ भूमि क्रय कर ली जाती है तथा भूमि के बीच में किसी अन्य व्यक्ति की भूमि पड़ती है तो उसका रास्ता रोक दिया जाता है। इसके लिए व्यवस्था।

विभिन्न प्रयोजनों हेतु जो भूमि खरीदी जायेगी उसमें समूह ग व समूह ’घ’ श्रेणीयो में स्थानीय लोगों को 70 प्रतिशत रोजगार आरक्षण सुनिश्चित हो। उच्चतर पदों पर योग्यतानुसार वरीयता दी जाए।

विभिन्न अधिसूचित प्रयोजनों हेतु प्रदान की गयी अनुमतियों के सापेक्ष आवेदक इकाइयों/ संस्थाओं द्वारा कितने स्थानीय लोगों को रोजगार दिए गए, इसकी सूचना अनिवार्य रूप से शासन को उपलब्ध कराने की व्यवस्था हो

वर्तमान में भूमि क्रय करने के पश्चात भूमि का सदुपयोग करने के लिए दो वर्ष की अवधि निर्धारित है और राज्य सरकार को अपने विवेक के अनुसार इसे बढ़ाने का अधिकार दिया गया है। इसमें संशोधन कर विशेष परिस्थितयों में यह अवधि तीन वर्ष (2 $ 1 = 3) से अधिक नहीं होनी चाहिए।

पारदर्शिता हेतु क्रय- विक्रय, भूमि हस्तांतरण एवं स्वामित्व संबंधी समस्त प्रक्रिया हो। समस्त प्रक्रिया एक वेबसाइट के माध्यम से पब्लिक डोमेन में हो।

प्राथमिकता के आधार पर सिडकुल/ औद्योगिक आस्थानों में खाली पड़े औौद्योगिक प्लाट्स/ बंद पड़ी फैक्ट्रियों की भूमि का आबंटन औद्योगिक प्रयोजन हेतु किया जाए।

प्रदेश में वर्ष बन्दोबस्त हुआ है। जनहित/ राज्य हित में भूमि बंदोबस्त की प्रक्रिया प्रारंभ की जाए।

भूमि क्रय की अनुमतियों का जनपद एवं शासन स्तर पर नियमित अंकन एवं इन अभिलेखों का रख-रखाव ।

धार्मिक प्रयोजन हेतु कोई भूमि क्रय/ निर्माण किया जाता है तो अनिवार्य रूप से जिलाधिकारी की रिपोर्ट के आधार पर शासन स्तर से निर्णय लिया जाए।

राज्य में भूमि व्यवस्था को लेकर जब भी कोई नया अधिनियम/ नीति / भूमि सुधार कार्यक्रम चलायें जायें तो राज्य हितबद्ध पक्षकारों / राज्य की जनता से सुझाव अवश्य प्राप्त कर लिए जाएँ।

नदी – नालों, वन क्षेत्रों, चारागाहों, सार्वजनिक भूमि आदि पर अतिक्रमण कर अवैध कब्जे /निर्माण / धार्मिक स्थल बनाने वालों के विरुद्ध कठोर दंड का प्रावधान हो। संबंधित विभागों के अधिकारियों के विरुद्ध भी कार्रवाई का प्रावधान हो। ऐसे अवैध कब्जों के विरुद्ध प्रदेशव्यापी अभियान चलाया जाए।