भाजपा की बढ़ी परेशानी, कैसे एडजस्ट होंगे भाजपा विधायक

राज्य सरकारों की ओर से संसदीय सचिवों की नियुक्ति को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से प्रदेश भाजपा सरकार के साथ ही पार्टी विधायकों की चिंताएं भी बढ़ने लगी हैं। इस निर्णय से सरकार के सामने अब विधायकों को सत्ता में एडजस्ट करने की चुनौती आ खड़ी हुई है तो सरकार में ओहदा पाने के अरमान पाले विधायकों को भी झटका लगा है।
प्रदेश में भाजपा भारी बहुमत से सत्ता में आई है। इस बहुमत के साथ ही भाजपा के सामने कई चुनौतियां भी आई हैं। इसमें सबसे बड़ी चुनौती सभी पार्टी विधायकों को उचित सम्मान और सत्ता में हिस्सेदारी देने की भी है। प्रदेश में सरकार बनाने के बाद भाजपा ने क्षेत्रीय व जातीय संतुलन साधते हुए मंत्रिमंडल की संख्या अभी फिलहाल दस तक ही सीमित रखी है।
मंत्रिमंडल में अभी दो पद रिक्त चल रहे हैं। संवैधानिक व्यवस्था के मुताबिक उत्तराखंड में अधिकतम बारह सदस्यीय मंत्रिमंडल हो सकता है। मंत्रिमंडल के इन दो रिक्त पदों पर कई वरिष्ठ विधायकों को दावा है। इनमें लगभग आधा दर्जन विधायक ऐसे भी हैं जो पूर्व में मंत्री रह चुके हैं। गाहे-बगाहे ये विधायक अप्रत्यक्ष तौर पर वरिष्ठता के नाते रिक्त मंत्री पदों पर अपना दावा जताने से चूकते भी नहीं हैं।
विधायकों की संख्या बहुत अधिक होने के कारण फिलहाल सरकार और मुख्यमंत्री मंत्रिमंडल के दो पदों को भरने के मामले में चुप्पी ही साधे हुए हैं। हालांकि, निकट भविष्य में इन पदों का भरना तय है। माना जा रहा था कि मंत्रिमंडल के रिक्त पदों को भरने के बाद भाजपा बड़ी संख्या में वरिष्ठ विधायकों का मान सम्मान रखने के लिए उनकी संसदीय सचिवों के रूप में तैनाती कर सकती है।
दरअसल, पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार ने भी इस परिपाटी के मुताबिक संसदीय सचिवों की तैनाती की थी। कांग्रेस ने सरकार में उठ रहे विरोधी स्वरों को शांत करने के लिए सात विधायकों को संसदीय सचिव का दायित्व दिया था। इन्हें कैबिनेट मंत्रियों जैसे अधिकार तो नहीं थे लेकिन इन्हें सभी सुविधाएं कैबिनेट मंत्रियों समान दी गई थी।
मौजूदा सरकार में भी माना जा रहा था कि आने वाले समय में भाजपा इसी परिपाटी को आगे बढ़ा सकती है। सुप्रीम कोर्ट की ओर से दी गई व्यवस्था के बाद संसदीय सचिव बनाने की परंपरा भी समाप्त हो गई है। इससे सरकार के सामने विधायकों को एडजस्ट करने की चुनौती बढ़ गई है।

आधार लिंक नही कराने पर एक अगस्त ने राशन नही

खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग की नई व्यवस्था के तहत एक अगस्त से सिर्फ उन्हीं उपभोक्ताओं को खाद्यान्न आवंटित किया जाएगा, जिन्होंने अपना आधार कार्ड राशन कार्ड से लिंक करा लिया है। फिलहाल विभाग आधार न देने वाले उपभोक्ताओं का राशन अपने पास रखेगा और यदि उपभोक्ता जल्द आधार कार्ड जमा कराते हैं तो उन्हें राशन आवंटित कर दिया जाएगा।
आपूर्ति विभाग पिछले दो साल से राशन कार्ड को आधार से लिंक करने की तैयारी कर रहा है। अब शासन से निर्देश जारी होने के बाद विभाग ने इसे अनिवार्य रूप से लागू कर दिया है। उपभोक्ताओं को अपने आधार कार्ड जमा करने के लिए जुलाई तक का समय दिया गया है। देहरादून जिले में कुल चार लाख राशन कार्ड हैं। इनमें से 2.60 लाख कार्डधारक आधार कार्ड से लिंक हो चुके हैं। जबकि 1.40 लाख कार्ड ऐसे हैं जिसमें या तो सिर्फ मुखिया का ही कार्ड जमा हो पाया है या किसी ने भी जमा नहीं किया।

16 तारीख तक राशन अनिवार्य
जिला आपूर्ति विभाग ने खाद्यान्न आवंटन के लिए समय सीमा तय कर दी है। नई व्यवस्था के तहत उपभोक्ताओं को हर हाल में माह की 16 तारीख तक पूरा खाद्यान्न आवंटित कर दिया जाएगा। यदि कोई डीलर तय समय में राशन नहीं बांटता है तो उसके खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी। नई व्यवस्था के तहत प्रत्येक माह की 23 तारीख से अगले माह 10 तारीख तक राशन डीलर गोदाम से गेहूं, चावल सहित पूरे खाद्यान्न का उठान करेगा।

मोबाइल नंबर पर करें शिकायत
आपूर्ति विभाग ने उपभोक्ताओं की शिकायतों का निस्तारण करने के लिए शीघ्र नया टोल फ्री नंबर जारी करने की तैयारी कर ली है। तब तक विभाग ने कलक्ट्रेट का मोबाइल नंबर व ई-मेल अगले 10 दिन में सभी दुकानों पर दर्ज करने के निर्देश दिए। ताकि लोग अपनी शिकायतें दर्ज कर सकें।

गुलदार स्कूल में घुसा और मच गई भगदड़

श्रीनगर के पास बुघाणी मार्ग पर खोला गांव में गुलदार की दहशत है। यहां गुरुवार को दोपहर के समय स्कूल में गुलदार घुस गया। इसके बाद बच्चों और टीचरों की चीख-पुकार मच गई।
जानकारी के अनुसार जूनियर हाईस्कूल स्कूल खोला में गुरुवार को कक्षाएं चल रही थी। स्कूल में उस वक्त चार-पांच बच्चे ही थे। जबकि तीन शिक्षिकाएं मौजूद थीं। सभी एक कमरे में थे। तभी उन्होंने गुलदार के घुर्राने की आवाज सुनीं। सभी सतर्क हो गईं। शिक्षिकाओं ने तुरंत दरवाजा बंद कर लिया। इसी बीच गुलदार स्कूल के आंगन में धमक गया। इससे शिक्षिकाओं ने बच्चों की चीख-पुकार मच गई। यह सुनकर गांव के लोग स्कूल की ओर दौड़ पड़े। काफी देर तक गुलदार आंगन में घुमता रहा। ग्रामीणों को आता देख गुलदार जंगल की ओर भाग निकला।
खोला के नितिन घिल्डियाल व स्कूल की शिक्षिका राधा बिष्ट ने बताया कि स्कूल में गुलदार के घुसने की सूचना मिलने पर गांव वाले स्कूल में पहुंचे। तब जाकर गुलदार वहां से भागा। उन्होंने कहा कि इस घटना से स्कूल के बच्चे व शिक्षिकाएं बुरी तरह से सहमी हुई हैं। सूचना पर श्रीनगर तहसीलदार सुनील राज व वन विभाग की टीम स्कूल में पहुंची। ग्रामीणों ने तहसीलदार व वन विभाग की टीम से गुलदार को पकड़ने के लिए पिंजरा लगाने तथा गश्त लगाए जाने की मांग की।
तीन लोगों पर झपटा मार चुका है गुलदार
बीते बुधवार को ही गुलदार ने दो अलग-अलग बाइक में सवार तीन लोगों पर झपटा मार दिया था। इस घटना में एक महिला व युवक घायल हो गए थे। उनके पांवों पर गुलदार ने नाखून मारे हैं। प्राप्त जानकारी के अनुसार खोला के नरेश कुमार अपनी मां बीना देवी के साथ बाइक से श्रीनगर से खोला गांव जा रहे थे। गांव के नजदीक ही सड़क के ऊपर से गुलदार ने उन पर हमला कर दिया। जिसमें बीना देवी के पांवों पर गुलदार ने नाखून गाड़ दिए। बाइक का हमला होते ही नरेश कुमार ने बाइक की स्पीड तेज कर दी। जिससे वह गुलदार के चंगुल से बच गए। इसी घटना के दस मिनट बाद खोला के निर्मल घिल्डियाल(21) भी श्रीनगर से बाइक से खोला गांव आ रहे थे। घात लगाए बैठे गुलदान ने उस पर भी हमला कर दिया। निर्मल के भी पांव पर गुलदार ने नाखून मारे हैं। किसी तरह निर्मल ने गुलदार से अपनी जान बचाई। सूचना मिलते ही तहसीलदार सुनील राज टीम सहित मौके पर पहुंचे। उन्होंने घायलों को तत्काल संयुक्त अस्पताल पहुंचाकर उपचार दिलाया। उन्होंने कहा कि वन विभाग को क्षेत्र में पिंजरा लगाने के आदेश दे दिए गए हैं।

ट्रेन की टिकट सस्ती होने के आसार

रेलवे में खाने को लेकर आए दिन कोई न कोई शिकायत मिलती रहती है। ऐसे में बहुत से यात्री चाहते थे कि टिकट के साथ खाना लेना अनिवार्य नहीं होना चाहिए। अगर आप भी ऐसे लोगों में से हैं जो ट्रेन का खाना पसंद नहीं करते हैं, तो आपके लिए रेलवे एक बड़ी खुशखबरी लेकर आया है।
खाने के नहीं देने होंगे पैसे बुधवार को रेलवे ने घोषणा करते हुए कहा है कि अब आपको ट्रेन टिकट खरीदते समय खाने के पैसे देना जरूरी नहीं होगा। यह नया नियम 26 जुलाई से प्रभावी हो चुका है। इसका फायदा सबसे अधिक उन लोगों को होगा, जिन्हें ट्रेन का खाना पसंद नहीं आता था और वह उसका पैसा नहीं देना चाहते थे। अब आप टिकट बुक करते समय चाहें तो खाने का पैसा दें या चाहें तो खाने को टिकट से हटा दें, आपकी मर्जी।
इन ट्रेनों में मिलेगी सुविधा रेलवे ने कैटरिंग को फिलहाल 31 प्रीमियम ट्रेनों में वैकल्पिक बनाया है। इन 31 प्रीमियम ट्रेनों में 7 राजधानी, 6 शताब्दी और दूरंतो शामिल हैं। फिलहाल रेलवे की तरफ से उन 31 प्रीमियम ट्रेनों में इसे पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर चलाया गया है। इसका सीधा मतलब यह है कि इन ट्रेनों की टिकटें सस्ती हो जाएंगी, क्योंकि आपके लिए खाने के पैसे देना वैकल्पिक कर दिया जाएगा।
ये भी होगा बदलाव कैटरिंग सेवा को बेहतर बनाने के लिए आईआरसीटीसी यात्रियों से उनके फीडबैक लेगी। इसके अलावा, भारतीय रेलवे के तहत चल रहे 100 किचन को आईआरसीटीसी को दे दिया जाएगा और साथ ही 20 नए मॉडर्न किचन भी खोले जाएंगे। यह कदम इसलिए उठाया जा रहा है ताकि आईआरसीटी के ग्राहकों को बेहतर सेवाएं दी जा सकें।

ट्रेन के खाने में निकली छिपकली, यात्री की तबीयत हुई खराब

ट्रेनों में यात्रियों को परोसे जाने वाले भोजन की क्वॉलिटी की तस्वीर उस वक्त सामने आई, जब एक यात्री को परोसी गई वेज बिरयानी में छिपकली पाई गई। इसके बाद यात्री की तबीयत भी खराब हुई, जिसकी वजह से उसे दवा लेनी पड़ी। इसके बाद बैकफुट पर आए रेलवे बोर्ड ने ट्रेन में भोजन सप्लाई करने वाले ठेकेदार का ठेका रद्द करने का ऐलान कर दिया। इसके साथ ही अब रेलवे ने चुनींदा राजधानी, शताब्दी और दुरंतो ट्रेनों में यात्रियों को विकल्प देने का फैसला लिया है कि अगर यात्री चाहें तो रेलवे का भोजन लेने से इनकार कर दें। ऐसी स्थिति में टिकट जारी करते वक्त पैसेंजर से भोजन का पैसा नहीं लिया जाएगा।
ट्रेन में खाने में छिपकली मिलने का यह मामला सीएजी की रिपोर्ट के एक सप्ताह के भीतर सामने आया है। पिछले ही सप्ताह सीएजी की रिपोर्ट में यह खुलासा किया गया था कि रेलवे स्टेशनों और ट्रेनों में परोसे जाने वाले खाने की क्वॉलिटी कितनी खराब है। हालांकि, इसके बाद रेलवे ने दावा किया कि वह सुधार के लिए कदम उठा रहा है लेकिन मंगलवार को बिरयानी में छिपकली निकलने का मामला सामने आ गया।
इंडियन रेलवे के सूत्रों के मुताबिक बिरयानी में छिपकली मिलने का मामला पूर्वा एक्सप्रेस में सामने आया। ट्रेन नंबर 12303 के फर्स्ट क्लास में यात्रा कर रहे वकील संतोष कुमार सिंह ने अपने लिए वेज बिरयानी का ऑर्डर किया। उन्हें बिरयानी में छिपकली दिखी। इसके बाद उन्होंने कैटरिंग स्टाफ को इसकी जानकारी दी और बिरयानी की फोटो भी ट्वीट करते हुए रेलमंत्री सुरेश प्रभु को टैग कर दी। बाद में इस यात्री की तबीयत खराब होने पर उसे दवा भी दी गई।
इस मामले के सामने आने के बाद रेलवे ने इस ट्रेन में खाना परोसने वाले कांट्रैक्टर आर.के. असोसिएटस का ठेका रद्द करने का फैसला किया है। महत्वपूर्ण है कि इसी ठेकेदार के खिलाफ पिछले साल भी खराब खाने की शिकायतें आई थीं। उस वक्त रेलवे ने इस पर क्रमश 10 लाख और साढ़े सात लाख रुपये का जुर्माना ठोंका था। अब रेलवे अपने बचाव में दावा कर रही है कि उसने भोजन की क्वॉलिटी को लेकर जीरो टॉलरेंस की नीति अपना रखी है। इसी वजह से उसने इस साल जनवरी से अब तक ट्रेनों में खाना परोसने वाले 12 ठेकेदारों के ठेके रद्द किए हैं।

मृतक किसान का परिवार गरीबी में कर रहा जीवन यापन

स्वाड़ी गांव के मृतक किसान राजू कुमार के परिजन बेहद गरीबी में जीवन-यापन कर रहे हैं। परिवार के मुखिया की मौत के बाद पूरा परिवार चिंतित है। चिंता जीवन-यापन की भी है और बैंक का ऋण चुकाने की भी। जो कमाने वाला था वह तो रहा नही, इसलिए आगे क्या होगा परिवार इसी चिंता में डूबा है। परिवार अभी मौत के सदमें से नही उभर पाया है। रहने के लिए मकान के नाम पर उनके पास दो जर्जर कमरे हैं। एक में परिवार के सात सदस्य रहते हैं और दूसरे कमरे में पशु रहते हैं। मकान भी इतना जर्जर है कि कभी भी गिर सकता है बारिश होने पर उससे पानी टपकता है। गौर करने वाली बात यह है कि उक्त परिवार के पास शौचालय भी नही है। परिवार में कोई भी कमाने वाला नही है। मृतक का सबसे बड़ा बेटा चौबीस साल का अजयवीर भी बेरोजगार है। मृतक का बैंक से लोन ले रखा था और लोन न चुका पाने की वजह से वह कई दिनों से तनाव में था और इसी वजह से उसने आत्म हत्या की। खास बात यह है कि शासन-प्रशासन यह कतई मानने को तैयार नही है कि उसने ऋण की वजह से आत्महत्या की। उसकी पत्नी रोशनी देवी ने बताया कि उसके पति राजू की कोई और समस्या नही थी, उसका किसी से कोई विवाद भी नही था और वह बीमार भी नही था, लेकिन दो बैंको से कर्ज लेने कारण वह कई दिनों से तनाव में था। बैंक कर्मचारी कई बार घर में भी आये और उन्होंने कर्ज चुकाने के लिए कई बार फोन भी किया। इसी तनाव की वजह से उसने आत्म हत्या की है।

योगी ने कंडारी को दिया प्रभावितों की समस्याओं के निदान का आश्वासन

श्रीनगर जलविद्युत परियोजना के प्रभावितों की समस्याओं के निदान को लेकर देवप्रयाग क्षेत्र के विधायक विनोद कंडारी शनिवार को लखनऊ में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिले। विधायक विनोद कंडारी ने योगी आदित्यनाथ को बताया कि श्रीनगर जलविद्युत परियोजना के निर्माण से कीर्तिनगर ब्लॉक क्षेत्र विशेषकर चौरास क्षेत्र के दर्जनों गांव की जनता प्रभावित हुई है। निर्माण के दौरान परियोजना की निर्माणदायी कंपनी जीवीके ने प्रभावितों के साथ उनके आर्थिक, सामाजिक पक्षों को लेकर अनुबंध किए, लेकिन उन्हें कंपनी क्रियान्वित नहीं कर रही है। जिससे प्रभावित बुरी तरह परेशान हैं। परियोजना से विद्युत उत्पादन भी हो रहा है। विधायक विनोद कंडारी ने लखनऊ से लौटने पर बताया कि इस मामले में योगी आदित्यनाथ ने पूरी मदद का आश्वासन भी दिया है। पिछले सप्ताह गढ़वाल केंद्रीय विवि के चौरास परिसर स्थित प्रेक्षागृह में प्रभावितों के साथ दिनभर पंचायत भी की थी जिसमें डीएम टिहरी के साथ ही परियोजना निर्माणदायी कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी भी शामिल थे।

कैग ने खोली भारतीय रेला सेवा की पोल!

नियंत्रक महालेखा परीक्षक (कैग) ने रेल मंत्रालय पर गंभीर आरोप लगाते हुए स्टेशनों व ट्रेनों में परोसा जाने वाला खाना यात्रियों के खाने योग्य नहीं बताया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि रेलवे के खाने में कीलें निकली। पेंट्रीकार में चूहे एवं काकरोच पाए गए।
इससे अधिक गंभीर बात यह है कि रेलवे ही ठेकेदारों को घटिया, बासी, कम मात्रा और अधिक दरों पर खाना देने के लिए मजूबर करती है। यात्रियों को ब्रांडेड के बजाए दूसरी कंपनियों का बोलतबंद पानी दिया जाता है। इतना ही नहीं 22 ट्रेनों में पेय, काफी, चाय और शूप तैयार करने में सीधे नल से आ रहे अशुद्ध जल का उपयोग किया जा रहा है।
कैग ने शुक्रवार को संसद में पेश अपनी रिपोर्ट में कहा है कि रेलवे की खानपान सेवाओं की कलई खोल दी है। कैग ने रेलवे अफसरों के साथ संयुक्त जांच में पाया कि खाना बनाने में साफ सफाई का ध्यान नहीं रखा जाता। बेस किचन व पेंट्रीकार कॉकरोच-चूहे घूमते हैं। लखनऊ-आनंद विहार डबल डेकर (ट्रेन नंबर 12583) में एक यात्री के कटलेट में खाते समय कील निकली। इसी प्रकार एक अन्य ट्रेन कानपुर दिल्ली शताब्दी की शिकायत पुस्तक में भी खाने में कील निकलने की शिकायत दर्ज है। दुरंतो एक्सप्रेस ट्रेनों (ट्रेन नंबर 12260 व 12269) में कॉकरोच व चूहे देखे गए। इसी प्रकार जांच के दौरान वेलकम ड्रिंक को नल के पानी से बनाते हुए देखा गया।
कैग ने कहा कि खाने की रसीद यात्रियों को नहीं दी जाती है। ट्रेनों की कोच में मैन्यू नहीं लगया जाता है जिससे खाने की दरें व मात्रा पता चल सके। यात्रियों को घटिया खाना कम मात्रा में परोसा जाता है, और तय मूल्य से अधिक पैसा लिया जाता है। यह स्थिति यात्री ट्रेनों व रेलवे स्टेशनों दोनो जगह की बनी हुई है।
रेलवे खानपान की गुणवत्ता की जांच और नियंत्रण प्रभावी ढ़ग से लागू करने में विफल साबित हुआ है। रेलवे बोर्ड से लेकर जोनल रेलवे तक शिकायत प्रणाली व्यवस्था लागू की गई, लेकिन इनकी संख्या में कमी नहीं आ रही है। कैग ने रिपोर्ट में कहा है कि खानपान नीति में बार बार परिर्वतन कर आईआरसीटीसी से लेने और फिर देने के फैसले से खानपान व्यवस्था बुरी तरह से प्रभावित हुई है। 2010 से इसका खामियाजा यात्रियों को भुगतना पड़ रहा है।
कैग व रेलवे के संयुक्त जांच में पाया गया कि जोनल रेलवे ने मास्टर प्लान बनाकर सभी स्टेशनों व ट्रेनों में खानपान आपूर्ति की ठीक प्रकार से निगरानी नहीं की। लंबी दूरी की ट्रेनों में पेंट्रीकार नहीं थी। ट्रेनों में खाना आपूर्ति के लिए रेलवे मात्र तीन फीसदी बेस किचन का प्रयोग करती है, शेष बेस किचन कैटरिंग ठेकेदारों द्वारा रेल परिसर से बाहर बनाया जाता है। यहां रेलवे का निगरानी तंत्र नहीं है। इसलिए खाना बनाने की गुणवत्ता, बेस किचन की साफ सफाई, कम मात्रा में खाना पैक करना आदि अनियमितताएं होती है।
रेलवे ने बेस किचन, कैटरिंग यूनिट, विशिष्ठ बेस किचन जैसे फूड प्लाजा, फूड कोर्ट, फास्ट फूड यूनिट, ट्रेन साइड वेडिंग लगाने की दिशा में ठोस काम नहीं किया। कैग ने सिफारिश की है कि आईआरसीटीसी को खानपान सेवा को देने के नियम को सरल बनाया जाना चाहिए। पेंट्रीकार में गैस बर्नर के स्थान पर इलेक्ट्रिकल चूल्हा लगाना चाहिए।

अधीनस्थ सेवा चयन आयोग ने गुपचुप तरीके से गजट नोटिफिकेशन जारी किया

देहरादून।
समूह ‘ग’ की परिधि में आने वाले ग्राम्य विकास विभाग में ग्राम विकास अधिकारी और ग्राम पंचायत अधिकारी के पदों पर निर्धारित योग्यता तकनीकी तरीके से बढ़ा कर पहाड़ के युवाओं को इन पदों से दूर करने का षडयत्र उजागर हुआ है। इसके लिए योग्यता में बदलाव लाने वाले प्रावधानों को गुपचुप तरीके से गजट नोटिफिकेशन भी जारी कर दिया गया है। निकट भविष्य में अधीनस्थ सेवा चयन आयोग के पास ग्राम विकास अधिकारी और ग्राम पंचायत अधिकारी के सैकड़ों पदों का अधियाचन पहुंचा है। इन पदों से सीधे तौर पर पहाड़ में पढ़ने वाले अधिकांश छात्र बाहर हो जाएंगे।
ग्राम्य विकास अधिकारी के जिन पदों पर अब तक इंटरमिडिएट अर्हता थी। अब उसे स्नातक कर दिया गया है। स्नातक में भी कृषि, विज्ञान, अर्थशास्त्र, कामर्स होना अनिवार्य है। पहाड़ों में विज्ञान के शिक्षकों का नितांत अभाव है, इसलिए जो विज्ञान पढ़ता है मैदानों में ही आता है। इंटरमिडिएट में कृषि विषय किसी भी पहाड़ के इंटर कालेज में नहीं है, यही स्थिति कामर्स की भी है। इस तरह ग्राम्य विकास अधिकारी के लिए इस तरह की अर्हता तय कर पर्वतीय क्षेत्र के अभ्यर्थियों को सीधे तौर पर इससे बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है।
इसके लिए बाकायदा गजट नोटिफिकेशन जारी कर दिया गया है। निकट भविष्य में अधीनस्थ सेवा चयन आयोग ग्राम विकास अधिकारी के 400 से अधिक पदों पर भर्ती करने का जा रहा है। इन पदों की भर्ती के लिए यह नई अर्हता लागू हो जाएगी। इसका मतलब यह है कि पहाड़ के इंटर कालेजों में पढ़ने वाले छात्र छात्राए इन पदो के लिए पहली ही सीढ़ी में अनर्ह हो जाएंगे। क्योंकि इंटर में जिन छात्रों के पास कृषि, विज्ञान, अर्थशास्त्र, कामर्स विषय होंगे वही ग्रेज्युयेशन में इन विषयों के साथ पढ़ेगा। पहाड़ से इंटर मिडिएट करके आने वाला छात्र इन विषयों को कैसे पढ़ पाएगा?
उत्तराखंड के निवासियों की भर्ती के लिए अधीनस्थ सेवा चयन आयोग का गठन किया गया था। जो राज्य गठन के पंद्रह साल बाद हो पाया। अब इस आयोग के दायरे में आने वाले सबसे अधिक पदों पर इस तरह की अर्हता लगाकर एक क्षेत्र विशेष के लोगों को बड़ी चोट पहुंचाने की कोशिश की जा रही है।
गौरतलब है कि उत्तराखंड अधिकांश मामलों में उत्तर प्रदेश की नकल करता रहा है। जबकि उत्तर प्रदेश में परंपरा रही है कि यदि किसी पद की योग्यता में बदलाव करना आवश्यक हो तो उसके लिए बाकायदा कमेटी का गठन किया जाता है। कमेटी इसके समाज के सभी वर्गों में पढ़ने वाले प्रभावों का आंकलन करती है, साथ ही कई बार जन सुनवाई कर जन सामान्य के पक्ष को भी सुना जाता रहा है। इसके बाद ही योग्यता में परिवर्तन किया जाता है। उत्तराखंड में कुछ अधिकारी अपनी मानसिकता थोपकर इस तरह के निर्णय ले रहे हैं। चुपचाप गजट नोटिफिकेशन जारी कर परीक्षा के ठीक पहले उसे सामने लाया जा रहा है, ताकि प्रभावित पक्ष को इसका विरोध करने का भी मौका तक न मिले। एक क्षेत्र विशेष के युवाओं को टारगेट कर ग्राम विकास अधिकारी और ग्राम पंचायत अधिकारी के पदों से पूरी तरह उन्हें दरकिनार करने की यह कार्यवाही निंदनीय है। गौरतलब है कि इस पदों पर अर्हताएं शासन स्तर पर तय होती हैं, अधीनस्थ सेवा चयन आयोग इसे लागू करता है।

अलग झंडे की मांग पर सिद्धारमैया ने कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ाई

कर्नाटक में सरकार ने राज्य के लिए स्टेट फ्लैग के लिए कवायद शुरू की है। सीएम सिद्धारमैया ने इसके लिए 9 मेंबर्स की कमेटी बनाई है, जो झंडे के डिजाइन और इसके कानूनी पक्ष तय करेगी। मीडिया में खबरें आने के बाद बीजेपी-शिवसेना ने इसका विरोध शुरू कर दिया। सरकार का दावा है कि इस झंडे को कर्नाटक की खास पहचान के तौर पर देखा जाएगा। संविधान विशेषज्ञों के अनुसार, संविधान में अगल से झंडे का कोई प्रावधान नहीं है, यहां सिर्फ राष्ट्रध्वज हो सकता है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने भी सिद्धारमैया सरकार के प्रस्ताव को खारिज कर दिया है। बता दें कि, जम्मू-कश्मीर को छोड़कर देश के किसी भी राज्य के पास खुद का झंडा नहीं है। आर्टिकल 370 के तहत जम्मू-कश्मीर को खास राज्य का दर्जा मिला हुआ है।

इन पर भी दे ध्यान…
स्टेट फ्लैग के लिए बनाई कमेटी जल्द ही राज्य की कांग्रेस सरकार को रिपोर्ट सौंपेगी। अगर, सिद्धरमैया कर्नाटक का झंडा बनाने में कामयाब हुए तो इससे उन्हें 2018 के असेंबली इलेक्शन में फायदा हो सकता है।
सरकार ने 6 जून को कमेटी बनाने के लिए ऑर्डर जारी किया था। इसमें कन्नड़ और कल्चर डिपार्टमेंट के प्रिंसिपल सेक्रेटरी को कमेटी का चेयरपर्सन बनाया गया।
2012 में राज्य में बीजेपी की सरकार थी। तब सरकार ने कहा था कि इससे देश की एकता और अखंडता के लिए खतरा हो सकता है। कन्नड़ कम्युनिटी की आवाज बुलंद करने वाले कुछ संगठन अलग झंडे की मांग कर रहे थे। बता दें कि कर्नाटक में पिछले दिनों हिन्दी का भी विरोध हो रहा था। लोगों ने हिन्दी के बोर्ड हटाए थे।
बता दें कि कर्नाटक के फाउंडेशन डे पर हर 1 नवंबर को राज्य के गली-चौराहों पर लाल और पीले रंग का कन्नड़ फ्लैग लगाया जाता है। इसे कन्नड़ एक्टिविस्ट वीरा सेनानि एम. राममूर्ति ने 1960 में डिजाइन किया था। इसे भारत सरकार की मान्यता नहीं मिली है।