बीएड के नए कॉलेजों की एनओसी पर लगी रोक

प्रदेश में बीएड डिग्रीधारक बेरोजगारों की संख्या में दिनोदिन बढ़ोतरी को देखते हुए सरकार ने राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) के चार वर्षीय नए पाठ्यक्रमों की एनओसी पर सरकार ने रोक लगा दी है। इसके कारण यहां का कोई भी कॉलेज अब इन नए पाठ्यक्रमों की मान्यता नहीं ले पाएगा।

प्रदेश सरकार ने करीब छह साल पहले बीएड के नए कॉलेजों की एनओसी पर रोक लगाई थी। इसकी सूचना एनसीटीई को भी भेज दी थी। इसके बाद डिप्लोमा इन एलिमेंट्री एजुकेशन (डीएलएड) के निजी या सरकारी कॉलेजों में संचालन पर भी सरकार ने रोक लगाते हुए केवल डायट में यह पाठ्यक्रम शुरू किए थे।

अब एनसीटीई के नए इंटीग्रेटिड टीचर एजुकेशन प्रोग्राम (आईटीईपी) के पाठ्यक्रमों की एनओसी पर भी रोक लगा दी है। इस रोक के पीछे प्रदेश में बीएड डिग्रीधारक बेरोजगार युवाओं की भारी संख्या को बताया गया है। सरकार का तर्क है कि प्रदेश में बेरोजगार बीएड डिग्रीधारकों की संख्या बढ़ने के बाद वह आंदोलन करते हैं, जिससे कानून-व्यवस्था भी खराब होती है।

क्या है आईटीईपी

एनसीटीई ने हाल ही में चार वर्षीय इंटीग्रेटिड आईटीईपी लांच किए हैं। इनमें दाखिले के लिए 12वीं में कम से कम 50 प्रतिशत अंकों की अनिवार्यता रखी गई है। इनमें एक कोर्स प्राथमिक और दूसरा कोर्स माध्यमिक में शिक्षण के लिए होगा।

श्रीदेव सुमन उत्तराखंड विवि के कुलपति डा. उदय सिंह रावत का कहना है कि एनसीटीई के इंटीग्रेटिड पाठ्यक्रमों की मान्यता के लिए शासनस्तर से एनओसी दी जाती है। शासन ने फिलहाल अग्रिम आदेशों तक इसकी एनओसी देने पर रोक लगाई हुई है। इसकी सूचना विवि को भी भेज दी गई है।

वहीं, उच्च शिक्षा सचिव अशोक कुमार ने बताया कि प्रदेश में बीएड डिग्रीधारक बेरोजगारों की बड़ी संख्या है। इस क्षेत्र में रोजगार की संभावनाएं अब काफी कम हैं। लिहाजा, इस बढ़ती छात्र संख्या पर लगाम लगाने के लिए एनओसी रोकी जानी जरूरी है।

चीन सीमा पर सेना की चौकियों में संचार सेवा दो माह से है बंद

भारत-चीन सीमा क्षेत्र में स्थित नीती घाटी के 11 गांवों का संपर्क दो माह से देश-दुनिया से कटा हुआ है। घाटी में संचार सेवा ठप पड़ी हुई है। ग्रामीणों के साथ ही आईटीबीपी, सेना और बीआरओ (सीमा सड़क संगठन) की चौकियों में भी संचार सेवा ठप पड़ी हुई है।

भारत संचार निगम लिमिटेड के अधिकारियों का कहना है कि सेटेलाइट में आई तकनीकी खामियों के चलते घाटी में संचार सेवा ठप पड़ी हुई है। चमोली जिले से लगे चीन सीमा क्षेत्र के ग्राम पंचायत गमशाली, नीती, बांपा, मेहरगांव, कैलाशपुर, मलारी, फरकिया, कोषा, झेलम, द्रोणागिरी, कागा और गरपक के ग्रामीणों को संचार सेवा से जोड़ने के लिए बीएसएनएल की ओर से क्षेत्र में सेटेलाइट फोन वितरित किए गए थे।

सेना, आईटीबीपी और सीमा सड़क संगठन के अधिकारी और जवान भी सेटेलाइट फोन से ही एक दूसरे से संपर्क करते हैं। लेकिन पिछले दो माह से क्षेत्र में फोन डेड पड़े हुए हैं। मेहरगांव के प्रधान रणजीत सिंह टोलिया, रक्मणी देवी, धर्मेंद्र पाल और धीरेंद्र सिंह गरोड़िया ने बताया कि नीती घाटी में संचार सेवा ठप पड़ जाने से करीब छह हजार की आबादी का देश-दुनिया से संपर्क कटा हुआ है।

बीएसएनएल के अधिकारियों को कई बार अवगत कराने के बावजूद भी सेटेलाइट फोन ठीक नहीं किए जा रहे हैं। इधर, बीएसएनएल के महाप्रबंधक विजयपाल का कहना है कि भूसमकालिक कक्षा में स्थापित सेटेलाइट से नीती घाटी में सिग्नल नहीं मिल पा रहे हैं। जिससे सेटेलाइट फोन ने काम करना बंद कर दिया है। इस संबंध में उच्च अधिकारियों से वार्ता की जा रही है। जल्द ही सेवा बहाल कर दी जाएगी।

2020 तक देहरादून को सीएनजी उपलब्ध कराना लक्ष्यः टीएस रावत

मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने मंगलवार मिशन स्थापना दिवस के अवसर पर विभिन्न फर्मों को कई कार्यों के कार्यादेश एवं स्मार्ट कार्ड वितरित किये। उन्होंने कहा कि देहरादून शहर की बढ़ती आबादी के दवाब को कम करने के लिये नये देहरादून की परिकल्पना को साकार किया जायेगा। इसके लिये लगभग 4 हजार हेक्टियर क्षेत्र का लैण्ड बैंक बनाने के प्रयास किये जायेंगे। उन्होंने कहा कि स्मार्ट नागरिकों के बिना स्मार्ट शहर की कल्पना नही की जा सकती है। देहरादून को स्मार्ट शहर बनाने के लिये प्रबुद्धजनो व नागरिको को भी सहयोगी बनना होगा। उन्होंने कहा कि देहरादून स्मार्ट शहर के रूप में शीघ्र ही नये क्लेवर में दिखाई देगा।

मुख्यमंत्री ने कहा कि देहरादून का नया स्वरूप प्रदान करने के साथ ही यहां के नागरिकों को सभी आवश्यक सुविधाये उपलब्ध कराने का हमारा प्रयास है। 2020 के अन्त तक देहरादून को सीएनजी उपलब्ध हो जायेगा। बरसात के बाद सौंग बांध का कार्य आरम्भ हो जायेगा इससे देहरादून को ग्रेविटी आधारित पेयजल उपलब्ध होगा तथा इससे लगभग 92 करोड़ की बिजली की बजत होगी। उन्होंने कहा कि रिस्पना को ऋषिपर्णा के स्वरूप में लाने के भी प्रयास तेजी से किये जा रहे हैं।

मुख्यमंत्री ने कहा कि स्मार्ट सिटी के अन्दर स्थापित होने वाले स्मार्ट डाटा सेन्टर तथा स्मार्ट कमाण्ड कन्ट्रोल सेन्टर से देहरादून के साथ ही हरिद्वार में आयोजित होने वाले महाकुम्भ के आयोजन में भी मदद मिलेगी।

मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री की स्मार्ट सिटी परियोजना को मूर्त रूप देने में राज्य सरकार तथा देहरादून स्मार्ट सिटी द्वारा सभी सम्भव प्रयास किये जायेंगे। देहरादून स्मार्ट सिटी द्वारा अपने 87 प्रतिशत कार्यों को मूर्त रूप देने कि तैयारी शुरू कर दी गई है।

स्मार्ट सिटी प्लान के तहत कार्यों की प्रगति की जानकारी देते हुए मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ आशीष श्रीवास्तव ने बताया कि स्मार्ट रोड परियोजना के क्रियान्वयन के लिए इस कार्य में दक्ष भारत सरकार की कार्यदायी संस्था ब्रिज एण्ड रूफ लिमिटेड को कार्य आवंटित कर दिया गया है। एकीकृत कमाण्ड एण्ड कण्ट्रोल सेन्टर के क्रियान्वयन के लिए मै0 एच0पी0 लिमिटेड का चयन कर लिया गया है।

उन्होंने कहा कि अभी तक स्मार्ट सिटी मिशन के अन्तर्गत कुल 484.76 करोड़ रूपए लागत की परियोजनाओं के कार्यादेश जारी किये जा चुकें हैं। इनमें स्मार्ट रोड लागत 57.49 करोड रूपए, ड्रेनेज लागत 37.99 करोड़ रूपए, मल्टीयूटीलिटी डक्ट लागत 64.33 करोड रूपए, स्मार्ट रोड़ के किनारे पेयजल पाइप लाईन लागत 9.96 करोड रूपए, स्मार्ट रोड़ के किनारे सीवर लाईन लागत 20.77 करोड रूपए, एकीकृत कमाण्ड एंड कण्ट्रोल सेन्टर लागत 199.78 करोड रूपए, आई०टी०एम०एस लागत 50 करोड रूपए, सिटी साइनेज लागत 18 करोड रूपए, स्मार्ट बिन्स तथा स्मार्ट वैस्ट गाड़ियां लागत 9.34 करोड रूपए, पापीपी मोड पर वाटर एटीएम लागत 1.98 करोड़ रूपए, स्मार्ट टॉयलेट लागत 2.07 करोड रूपए, स्मार्ट स्कूल्स लागत 6.05 करोड़ रूपए, एमडीडीए पार्क का सौन्दर्यकरण लागत 7 करोड रूपए शामिल हैं।

उन्होंने बताया कि इसके अतिरिक्त 331.20 करोड़ रूपए की विभिन्न महत्वपूर्ण परियोजनाओं की डीपीआर की स्वीकृति प्रदान की गई है। इनमें इलेक्ट्रिक बस लागत 41.56 करोड रूपए, इण्टरैक्टिव बस स्टॉप्स लागत 15.72 करोड़ रूपए, परेड ग्राउंड विकास योजना लागत 23.63 करोड़ रूपए,. पल्टन बाजार पैदल मार्ग का विकास लागत 13.82 करोड़ रूपए, एकीकृत ऑफिस ग्रीन बिल्डिंग लागत 204.46 करोड रूपए, सचिवालय में शिशु पालन केंद्र लागत 0.90 करोड रूपए, एबीडी क्षेत्र में पेयजल संवर्धन योजना लागत 24.11 करोड़ रूपए व राजपुर रोड का सौन्दर्यीकरण लागत 7 करोड़ रूपए शामिल हैं। इस प्रकार कुल लागत रू0 484.76 करोड के कार्यादेश दिये जा चुके हैं। जबकि कुल 331.2 करोड की डीपीआर को स्वीकृत किया जा चुका है। इस प्रकार देहरादून स्मार्ट सिटी के अंतर्गत 800 करोड़ से अधिक के कार्य जल्द ही प्रारम्भ कर दिए जाएंगे।

जल पुलिस के जवानों के पास नहीं हैं सुरक्षा उपकरण, फिर भी बचा रहे लोगों को

ऋषिकेश के त्रिवेणी घाट पर गंगा में डूबने से बचाने के लिए 40वीं वाहिनी पीएससी की ई कंपनी तैनात है। लोगों की सुरक्षा के लिए तैनात इन जवानों के पास खुद के बचाव के बुनियादी उपकरण नहीं हैं। हालात यह है कि लोगों को बचाने में इन जवानों को सड़ चुके लाइफ जैकेट के सहारे गंगा की लहरों जूझना पड़ रहा है।

ऋषिकेश के त्रिवेणी घाट पर प्रतिदिन करीब 15 से 20 हजार लोग गंगा स्नान, पितृ तर्पण के लिए पहुंचते हैं। इस घाट पर प्रतिदिन टिहरी डैम से पानी भी छोड़ा जाता है। इससे यहां पानी का बहाव बढ़ जाता है। कई बार गंगा स्नान के दौरान लोग दुर्घटना का शिकार हो जाते हैं। किसी भी अप्रिय घटना से बचाने के लिए इस घाट पर उत्तराखंड पुलिस की एक जल चौकी भी है। यहां नौ जवान हर समय मुस्तैद रहते हैं, लेकिन गंभीर बात यह है कि इन जवानों के पास जरूरी सुरक्षा उपकरण नहीं हैं। वर्ष 2010 में मिलीं लाइफ जैकट अभीतक बदली नहीं गई हैं। फिलवक्त लाइफ जैकेट की हालात काफी खराब हो चुकी है। जैकेट के अंदर का फॉम गल चुका है। सिलाई उधड़ चुकी है। अमूमन लाइफ जैकेट की मियाद दो साल होती है। इसके बाद निष्प्रयोज्य मान ली जाती है। बहरहाल यात्रियों के साथ किसी दुर्घटना की स्थिति में जल पुलिस के जवानों को इन्हीं सड़ चुकीं लाइफ जैकेट के सहारे गंगा की लहरों से जूझना पड़ता है। जल पुलिस के हेड कांस्टेबल मदन सिंह चौहान ने बताया कि जल चौकी पर नौ जवान हैं। कांवड़ यात्रा के दौरान जवानो की संख्या बढ़ाई जाती है।

यह सामान है उपलब्ध
सामान संख्या
लाइफ जैकेट्स 12
लाइफ ब्वाय 02
थ्रो बैग 02
सर्चिंग कांटा 02
साइकिल 02

इन सामानों की है दरकार
सामान संख्या
लाइफ जैकेट्स 10
लाइफ बाय 03
थ्रो बैग 03
सर्चिंग कांटा 02
राफ्ट 01
डीप डाइवर 01
40वीं वाहनी पीएससी ई-कंपनी के कंपनी कमांडर वीरेन्द्र सिंह चौहान का कहना है कि विभागीय मुख्यालय देहरादून को जरूरी उपकरणों की सूची भेजी गई है। इसके अलावा जरूरत पड़ने पर राफ्ट हरिद्वार तथा मुनिकीरेती कार्यालय से रेस्क्यू के लिए भेजी जाती है।

इस शैक्षणिक सत्र से निजी स्कूलों ने अधिक फीस वसूली तो दंड का भी होगा प्रावधान

राज्य के निजी स्कूलों में फीस निर्धारण के लिए सरकार ने उत्तराखंड सेल्फ फाईनेंस्ड इंडिपेंडेंट स्कूल (रेग्युलेशन ऑफ फीस) एक्ट तैयार कर लिया है। इसके तहत राज्य सरकार प्री-प्राइमरी से लेकर सीनियर सेंकेंडरी की कक्षाओं का अधिकतम शुल्क निर्धारित होगा। हर जिले में फीस निर्धारण के लिए जिलाधिकारी की अध्यक्षता में छह सदस्य समिति बनाई जाएगी। यह समिति फीस को लेकर स्कूलों की आपत्तियों का निस्तारण करेगी। इस समिति का कार्यकाल दो वर्ष का रहेगा। इसके निर्णयों के विरुद्ध राज्य स्तरीय अपीलीय प्राधिकरण में जा सकता है। छह सदस्य प्राधिकरण सचिव विद्यालयी शिक्षा की अध्यक्षता में गठित किया जाएगा। इस एक्ट में अधिक फीस वसूलने की शिकायत पर दंड का भी प्रावधान किया गया है। इस एक्ट को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए शिक्षा मंत्री ने सभी से सुझाव आमंत्रित किए हैं। इसके बाद इसे अमली जामा पहनाते हुए कैबिनेट में लाया जाएगा।

सचिवालय में शिक्षा मंत्री अरविंद पांडेय ने बुधवार को शिक्षा विभाग की समीक्षा बैठक में फीस एक्ट के संबंध में अधिकारियों के साथ चर्चा की। फीस एक्ट के संबंध में जानकारी देते हुए शिक्षा मंत्री ने बताया कि फीस एक्ट को अगले शैक्षणिक सत्र से लागू कराने की तैयारी है। इसके लिए खाका तैयार कर लिया गया है। इसके तहत स्कूलों में फीस का निर्धारण सरकार करेगी। जो भी विद्यालय इससे असहमत होंगे वे सत्र प्रारंभ होने से तीन माह पूर्व तक शुल्क निर्धारण के संबंध में अपना प्रत्यावेदन जनपद स्तर पर गठित फीस नियंत्रण समिति को देंगे। यह समिति आवेदन प्राप्त होने के बाद शुल्क का पुनर्निर्धारण करेगी। समिति अनियमितताओं की शिकायत का भी निस्तारण करेगी। जनपद स्तरीय समिति के निर्णय के विरुद्ध राज्य स्तरीय विनियामक प्राधिकरण में अपील दायर की जा सकेगी। यह प्राधिकरण एक सप्ताह के भीतर प्रकरण को निस्तारित करेंगे। सत्र शुरू होने से पहले सभी स्कूल अपनी फीस का विवरण वेबसाइट पर अनिवार्य रूप से प्रकाशित करेंगे।

इन बिंदुओं पर रहेगा फोकस
– कोई भी स्कूल एडवांस के रूप में फीस की वसूली नहीं कर सकेंगे।

– कोई भी स्कूल अपने परिसर में व्यावसायिक गतिविधि नहीं करेंगे यानी ड्रेस और किताब कॉपी नहीं बेच सकेंगे।

– कोई भी स्कूल बिना जिला स्तरीय समिति के अनुमोदन के ड्रेस में कोई बदलाव नहीं कर सकेंगे।

दंड का प्रावधान

एक्ट में अधिक फीस वसूले जाने की स्थिति में दंड का भी प्रावधान किया गया है। इसके तहत पहली बार शिकायत सही पाए जाने पर एक लाख रुपये, दूसरी बार शिकायत सही पाए जाने पर पांच लाख रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा। तीसरी बार शिकायत सही पाए जाने पर मान्यता समाप्ति अथवा अनापत्ति वापस लेने की कार्यवाही की जाएगी।

जनपद स्तरीय फीस नियंत्रण समिति
जिलाधिकारी, मुख्य शिक्षा अधिकारी, जिलाधिकारी द्वारा नामित चार्टेड अकाउंटेंट, लोक निर्माण विभाग का अधिशासी अभियंता, जिलाधिकारी द्वारा नामित कोई अभिभावक, जिलाधिकारी द्वारा नामित किसी विद्यालय का प्रबंधक व प्रधानाचार्य

राज्य विनियामक प्राधिकरण
सचिव, विद्यालयी शिक्षा, शिक्षा निदेशक, शिक्षा सचिव द्वारा नामित चार्टेड अकाउंटेंट, लोक निर्माण विभाग का अभियंता, सचिव द्वारा नामित अभिभावक और सचिव द्वारा नामित किसी विद्यालय का प्रबंधक व प्रधानाचार्य।

राज्य सरकार ड्रोन का इस्तेमाल इन कार्यों को करने में लगा सकती है, जानिए

सब कुछ ठीक रहा तो जल्द ही राज्य सरकार प्रदेश में ड्रोन कैमरों का प्रयोग स्वास्थ्य, प्राकृतिक आपदा, कृषि, खनन क्षेत्र में कर सकती हैं। इसके लिए व्यापक स्तर पर रणनीति तैयारियां चल रही है। अभी तक ड्रोन के माध्यम से कम समय में दवाईयां और जांच के लिए सैंपल भेजने का सफल ट्रायल हो चुका है।
प्रदेश में ड्रोन का निर्माण और तकनीक को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने फरवरी 2019 में पहली बार ड्रोन फेस्टिवल का आयोजन किया। सरकार का मानना है कि ड्रोन तकनीक से समय और मैनपावर में कमी आएगी।

आपदा प्रबंधन के साथ ही स्वास्थ्य, कृषि, खनन, वन सेक्टर में ड्रोन का इस्तेमाल कर सकते हैं। हाल ही में सूचना एवं प्रौद्योगिक विकास प्राधिकरण (आईटीडीए) की अनुमति से ड्रोन से दवाईयां और सैंपल पहुंचाने का ट्रायल कामयाब रहा। 18 मिनट के भीतर ही ड्रोन से 36 किलोमीटर दूर ब्लड सैंपल पहुंचाया गया।

जबकि वाहन से आमतौर पर एक से डेढ़ घंटे का समय लगता है। आईटीडीए विभिन्न विभागों के साथ मिल कर ड्रोन तकनीक को धरातल पर पहुंचाने के लिए रणनीति बना रहा है। सरकार प्रदेश में ड्रोन मैन्युफैक्चरिंग और तकनीक इस्तेमाल के लिए पॉलिसी बनाने पर विचार कर रही है।
आईटीडीए के वरिष्ठ कार्यक्रम अधिकारी आलोक तोमर का ने बताया कि स्वास्थ्य, खनन, कृषि, आपदा प्रबंधन समेत अन्य क्षेत्रों में ड्रोन तकनीक को धरातल पर उतारने के लिए रणनीति बनाई जा रही है।

आईटीडीए ने प्रदेश के राजकीय पॉलिटेक्नीक में पढ़ रहे 70 छात्रों को ड्रोन को उड़ाने की प्रशिक्षण दिया है, जिसमें 24 छात्राएं हैं। आईटीडीए प्रशिक्षण कार्यक्रम के माध्यम से छात्रों को ड्रोन तकनीक के लिए प्रोत्साहित कर रहा है।

कृषि क्षेत्र में ओलावृष्टि, सूखे या बीमारी लगने से फसलों को नुकसान होता है तो ड्रोन से कम समय में इसका आकलन किया जाएगा। ड्रोन पर लगे कैमरों के जरिये से प्रभावित इलाकों में सर्वे कर स्थिति का जायजा लिया जाएगा। अभी तक लेखपाल व राजस्व कानूनगो के माध्यम से फसलों का आकलन किया जाता है, जिसमें लंबा समय लगता है।

खनन क्षेत्र में प्रदेश के नदी, नालों में अवैध खनन रोकने में ड्रोन का इस्तेमाल किया जाएगा। ड्रोन से यह पता लग सकेगा कि किस क्षेत्र में माफिया खनन कर रहे हैं। ड्रोन काफी ऊंचाई से खनन की तस्वीरें विभाग को उपलब्ध करा देगा, जिससे कार्रवाई में आसानी होगी।

स्वास्थ्य क्षेत्र में आपातकालीन स्थिति में किसी मरीज का ब्लड सैंपल या जरूरत दवाईयां भी ड्रोन के जरिये पहुंचाई जा सकेगी। ड्रोन में पांच किलोग्राम भार तक सामान ले सकते हैं। देहरादून और टिहरी में अभी हाल में स्वास्थ्य सेवाओं में ड्रोन तकनीक का प्रयोग सफल रहा।

आपदा प्रबंधन क्षेत्र में प्राकृतिक आपदा की दृष्टि से उत्तराखंड संवेदनशील है। आपदा घटने पर तत्काल प्रभावित क्षेत्र का सर्वे ड्रोन से किया जा सकेगा। क्योंकि आपदा में सड़क मार्ग, कनेक्टिविटी की सुविधा ठप होने से कई बार बचाव दल को मौके पर पहुंचने पर समय लगता है। ऐसे में प्रभावित क्षेत्रों में हालात का पता ड्रोन से कुछ ही समय में लगेगा।

सीएनजी स्टेशनों की स्थापना से सीएनजी वाहनों की संख्या में होगी बढ़ोतरी

मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने शुक्रवार को गेल इंडिया लिमिटेड के अधिकारियों के साथ नेचुरल गैस पाइप लाईन व सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन प्रोजक्ट की जानकारी ली। उन्होंने अधिकारियों से कहा कि नेचुरल गैस पाइप लाईन के विस्तार में यह ध्यान रखा जाए कि इससे देहरादून, हरिद्वार व ऋषिकेश के शहर व उसके आस पास के गांव भी पूर्ण रूप से कवर हो जाए। उन्होंने कहा कि इससे लोगों को रोजगार सृजन हो सकता इसका भी पूरा आकलन किया जाए। मुख्यमंत्री ने कहा कि इस परियोजना की प्रत्येक तीन माह में समीक्षा की जायेगी।

मुख्यमंत्री ने कहा कि गैस पाइप लाईन से लोगों को काफी सुविधा होगी जबकि सीएनजी स्टेशनों की स्थापना से सीएनजी वाहनों की संख्या भी बढ़ेगी तथा इससे वाहनों से होने वाले प्रदूषण से भी दूनवासियों का छुटकारा मिल सकेगा। मुख्यमंत्री ने कहा कि देहरादून में वाहनों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। राज्य के मैदानी क्षेत्रों में आबादी का दबाव निरन्तर बढ़ रहा है। उसी क्रम में आगे भी वाहनों एवं आबादी का दबाव बना रहेगा, इसका बेहतर रास्ता सीएनजी ही है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रदेश में हरिद्वार, ऊधम सिंह नगर तथा देहरादून के बाद नैनीताल के साथ ही अन्य स्थानों में भी गैस पाइप लाइन का कार्य आरम्भ किया जाए। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री ने देश को गैस ईंधन के रूप में इस्तेमाल करने पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि गैस ईंधन कम खर्चीला तथा इको फ्रेन्डली है।

बैठक में अधिकारियों द्वारा मुख्यमंत्री को अवगत कराया गया कि हरिद्वार-ऋषिकेश-देहरादून पाइपलाईन प्रोजेक्ट (एचआरडीपीएल) के तहत 1500 करोड़ रूपये की लागत से 3 लाख पीएनजी कनेकक्शन दिये जायेंगे व 50 सीएनजी स्टेशन बनाये जायेंगे। इससे मुख्यतः ऋषिकेश, डोईवाला, विकासनगर, देहरादून, चकराता कालसी व त्यूनी क्षेत्र लाभान्वित होंगे। एचआरडीपीएल प्रोजेक्ट के तहत टेंडर व जियोटेक्निकल, टोपोग्राफिकल एवं हाइड्रोलॉजिकल का कार्य गतिमान है।

देहरादून सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन गैस प्रोजक्ट के तहत चकराता, देहरादून, डोईवाला, कालसी, ऋषिकेश, त्यूनी व विकासनगर का लगभग 3088 वर्ग किमी क्षेत्र आच्छादित किया जायेगा, जिसकी लागत 1696 करोड़ रूपये है। इसकी डीपीआर स्वीकृत की जा चुकी है। इसके लिये अधिकारियों की नियुक्ति भी की गई है। शीघ्र ही इस योजना का कार्य आरम्भ कर दिया जाएगा।

वनों को ग्रामीण आर्थिकी से जोङने की बङी पहल

मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने बुधवार को मुख्यमंत्री आवास में पिरूल (चीड़ की पत्तियों) तथा अन्य प्रकार के बायोमास से विद्युत उत्पादन तथा ब्रिकेट इकाइयों की स्थापना हेतु 21 चयनित विकासकर्ताओं को परियोजना आवंटन पत्र प्रदान किये। उन्होंने नवोन्मेषी उद्यमियों का स्वागत करते हुए इसे पर्यावरण संरक्षण के लिये भी नई शुरूआत बताया। उन्होंने कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों से पलायन रोकना हमारी सबसे बड़ी चिन्ता है। राज्य निर्माण के बाद भी गांवों से हो रहा पलायन चिन्ता का विषय है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि पिरूल प्रकृति की देन है इसे व्यवस्थित कर ग्रीन एनर्जी में परिवर्तित करना हमारा उदेश्य है। पिरूल से ऊर्जा उत्पादन हेतु आज 21 उद्यमी आगे आए है। उन्हें भरोसा है कि इनकी संख्या शीघ्र ही 121 होगी। उन्होंने कहा कि इसमें राज्य को एनर्जी इंधन के साथ ही वनाग्नि को रोकने में मदद मिलेगी, जगंलों में हरियाली होगी तथा जैव विविधता की सुरक्षा होगी। उन्होंने कहा कि चीड़ से निकलने वाले लीसा से भी 43 प्रकार के उत्पाद बनाये जा सकते है। इसके लिए इंडोनेशिया से तकनीकि की जानकारी प्राप्त की जाएगी। इसका एक प्रोजेक्ट बैजनाथ में लगाया गया है। इससे भी वनाग्नि को रोकने में मदद मिलने के साथ ही हजारों लोगों को रोजगार उपलब्ध हो सकेगा।

उन्होंने कहा कि उत्तराखंड के वनों से हर साल 6 लाख मीट्रिक टन पिरूल निकलता है। इसके अतिरिक्त अन्य बायोमास भी निकलता है। इस तरह पिरूल व अन्य बायोमास से बिजली उत्पादन का जो लक्ष्य हमने रखा है उसकी शुभ शुरुआत होने जा रही है। पिरूल से बिजली उत्पादन के लिए उरेडा एवं वन विभाग को नोडल एजेंसी बनाया गया है। राज्य में विक्रिटिंग और बायो ऑयल संयंत्र स्थापित किए जाने हैं। इन संयंत्रों के स्थापित होने से पिरूल को प्रोसेस किया जाएगा व बिजली उत्पादन किया जा सकेगा। उरेडा द्वारा इसके लिए प्रस्ताव आमन्त्रित किए गए थे। अभी तक 21 प्रस्ताव जिसमें प्राप्त हुए जिनमें 20 प्रस्ताव पिरूल से विद्युत उत्पादन एवं एक प्रस्ताव पिरूल से ब्रिकेट बनाने के लिए शामिल है।

एक रूपया प्रति किलो से होगा भुगतान
पिरूल के जो सेंटर स्थापित किए जा रहे हैं उन तक पिरूल की सप्लाई सुनिश्चित करने के लिए महिला समूहों को रोजगार से जोड़ा जा रहा है। जंगलों से पिरूल कलेक्शन करने के लिए महिला समूहों को एक रूपया प्रति किलो की दर से भुगतान किया जाएगा।

आधी रात बछड़े को निवाला बना गया गुलदार

ऋषिकेश में गुलदार ने एक ओर घटना को अंजाम दे दिया। मंगलवार की आधी रात शिवाजी नगर क्षेत्र में गुलदार ने एक गाय के बछड़े पर हमला कर उसे मार डाला। बुधवार सुबह क्षतविक्षत बछड़े के शव को देखकर स्थानीय लोगों में दहशत फैल गई। उन्होंने घटना की सूचना वन विभाग को दी। स्थानीय निवासियों ने क्षेत्र में पिंजरा लगाने की मांग की है।

जानकारी के मुताबिक शिवाजी नगर की गली नंबर 28 के पास मॉर्निंग वॉक पर जाने वाले लोगों ने क्षत-विक्षत हालत में एक गाय के बछड़े को पड़ा हुआ देखा। इसकी सूचना पार्षद जयेश राणा सहित वन विभाग को दी गई। जिस स्थान पर गुलदार ने बछड़े पर हमला किया वहां काली कमली का बगीचा पास में ही है। सड़क पर रोशनी की कोई व्यवस्था नहीं। लोगों गुलदार के आवासीय क्षेत्र में घुसने से डरे हुए हैं। पार्षद जयेश राणा के मुताबिक वन विभाग के कर्मचारियों ने उनके साथ मिलकर मौका मुआयना किया है। वन विभाग ने क्षेत्र में गश्त करने का भरोसा दिलाया है।

वहीं, वन क्षेत्राधिकारी ऋषिकेश रेंज आरपीएस नेगी का कहना है कि स्थानीय लोग यदि लिखित रूप से पिंजरा लगाने की मांग करेंगे तो इस संबंध में अग्रिम कार्रवाई की जाएगी। इस क्षेत्र में स्टर्डिया फैक्ट्री के पीछे झाड़ियां हैं। यहां गुलदार सक्रिय रहता है। पहले भी लोगों से झाड़ियां कटवाने की अपील की थी। मगर, इस ओर कोई कदम नहीं उठाया गया।

बिना महक, सूखे फूलों से भगवान की हो रही पूजा अर्चना

क्या वेस्ट हो चुके फूलों से कोई भगवान को प्रसन्न कर सकता है, क्या ऐसे फूल जिसकी महक चली गई हो, भगवान को चढ़ाए जा सकते है। आप सभी का जवाब न में होगा। मगर, यह सच है। ऋषिकेश में वेस्ट हो चुके फूलों से अगरबत्तीयां बनाने के काम आ रही हैं। फिर यही अगरबत्तीयां भगवान की पूजा अर्चना में प्रयोग हो रही है।

फरीदाबाद हरियाणा के रहने वाले रोहित प्रताप ने बताया कि उन्होंने करीब साढ़े तीन लाख रुपये की लागत से अगरबत्ती बनाने का काम शुरू किया था। यह पूरी तरह से हस्तनिर्मित है। शाम के समय नगर निगम की गाड़ी से ऋषिकेश के प्रत्येक मंदिर से बासी फूलों को उठाया जाता है। जिन्हें सुखाकर उसका पाउडर बनाया जाता है। इसके बाद इसकी अगरबत्ती तैयार की जाती है। नभ अगरबत्ती के नाम से अगरबत्ती को मार्केट में उतारा गया है। पूरे निर्माण कार्य में कहीं भी कोयला और चारकोल का प्रयोग नहीं होता है। फिलहाल चारधाम यात्रा जाने वाले यात्रियों के लिए बीटीसी में अगरबत्ती का स्टॉल लगाया गया है।

महिलाओं को भी मिला रोजगार
अगरबत्ती बनाने के लिए वर्तमान में करीब 10 महिलाएं काम करती हैं। शाम के समय शिवाजी नगर क्षेत्र में करीब 20 महिलाओं को अगरबत्ती बनाने की ट्रेनिंग दी जा रही है।

प्रत्येक मंदिर में लगाए हैं फूल डालने के लिए डस्टबीन
बेकार फूलों को डालने के लिए उनकी ओर से ऋषिकेश के सभी मंदिरों में कूड़ेदान लगाए हुए हैं। सभी कूड़ेदानों पर आकर्षक ढंग से लिखा है कि रास्ते में पड़े फूलों को कूड़ेदान में डालें।