मुख्यमंत्री महालक्ष्मी योजना का लाभ दिलाये अधिकारी- रेखा आर्य

उन मातृ शक्तियों को मेरा अभिनंदन जिन्होंने एक बेटी को जन्म दिया। आप बेटियों को भी समान अधिकार दे रही है। ये प्रदेश के लिए गर्व की बात है। आपके इस सार्थक प्रयास की बदौलत एक दिन उत्तराखंड देवी की भूमि के रूप में जाना जाएगा। यह बात महिला सशक्तिकरण एवं बाल विकास मंत्री रेखा आर्य ने कही।

शनिवार को नई टिहरी के बहु उद्देशीय भवन में मुख्यमंत्री महालक्ष्मी किट वितरण कार्यक्रम आयोजित किया गया इस मौके पर करीब 30 महिलाओं को महालक्ष्मी किट वितरित की गई। भाजपा जिला अध्यक्ष नई टिहरी विनोद रतूड़ी ने कहा कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सोच और मंत्री रेखा आर्य के सार्थक प्रयासों की बदौलत आज महिलाओ को इस योजना का लाभ मिल रहा है।

इस दौरान मंत्री रेखा आर्य ने अपने संबोधन की शुरुआत मातृ शक्तियों की जयकार से की। उन्होंने कहा कि आप की गोद मे जो महालक्ष्मी हैं। यही आगे चलकर उत्तराखंड संभालेंगी। कहा कि एक माँ की थकान अपनी बेटी की मुस्कान से दूर होती है, जबकि पुरुषों में ऐसा देखने को नहीं मिलता। कहा कि इन्हें समान अवसर दीजिये, ये भी हर क्षेत्र में बेहतर कर सकती हैं, ऐसी शक्ति ईश्वर ने इन्हें दी हैं।

उन्होंने कहा कि प्रसव के बाद हर माँ को जिस जिस सामान की जरूरत पड़ती है, वह सभी इस महालक्ष्मी किट में दिया जा रहा है। उन्होंने मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी जी का इस योजना को स्वीकृति देने के लिए आभार जताया। इस मौके पर जिलाधिकारी टिहरी ईवा, आशीष श्रीवास्तव, भाजपा जिलाध्यक्ष टिहरी विनोद रतूड़ी, जिला कार्यक्रम अधिकारी बबिता शाह, पूर्व दायित्व धारी बेबी असवाल, ब्लाक प्रमुख जाखणीधार श्रीमति सुनीता, ब्लाक प्रमुख चम्बा शिवानी बिष्ट, सीडीओ नमामि बंसल, जिलाध्यक्ष महिला मोर्चा रेखा राणा आदि मौजूद रहे।

मेहडकल काॅलेजों के सभी निर्माण कार्य 30 अक्टूबर तक पूर्ण करने के निर्देश

चिकित्सा शिक्षा विभाग के अंतर्गत राज्य के मेडिकल कॉलेजों में चल रहे निर्माण कार्यों में तेजी लाने के निर्देश देते हुए विभागीय मंत्री डा. धन सिंह रावत ने विभागीय अधिकारियों को सभी निर्माण कार्यों को 30 अक्टूबर तक पूर्ण करने को कहा। उन्होंने मेडिकल कॉलेजों में कार्य कर रही कार्यदायी संस्थाओं को भी चेतावनी देते हुए कहा कि जिन संस्थाओं का कार्य गुणवत्तापूर्वक व अनुबंध के अनुसार समय पर पूरा नहीं होगा उन्हें बदल दिया जायेगा।

विधानसभा स्थिति सभागार में आयोजित स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग की बैठक में राज्य के आधा दर्जन मेडिकल कॉलेजों में चल रहे निर्माण कार्यों की विस्तारपूर्वक समीक्षा की गई। जिसमें संबंधित मेडिकल कॉलेजों के प्राचार्यों एवं कार्यदायी संस्थाओं के अधिकारियों द्वारा विभिन्न निर्माण कार्यों की प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत की गई। समीक्षा के उपरांत विभागीय मंत्री डा. धन िंसह रावत ने कहा कि जिन कॉलेजों में निर्माण कार्य पूर्ण हो चुके हैं कार्यदायी संस्था उन योजनाओं को शीघ्र विभाग को हस्तांतरण करें ताकि माननीय मुख्यमंत्री के द्वारा उन योजनाओं का लोकार्पण करवा कर कार्य शुरू किया जा सके। जो निर्माण कार्य गतिमान है उनको 30 अक्टूबर तक पूर्ण करने की डेडलाइन नियत की गई है।

डा. रावत ने कहा कि 30 अक्टूबर को माननीय मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी दून मेडिकल कॉलेज के अंतर्गत निर्मित नई बिल्डिंग का लोकार्पण करेंगे। उन्होंने विभागीय अधिकारियों एवं कार्यदायी संस्था के पदाधिकारियों को कॉलेज में अधूरे पड़े निर्माण कार्यों को जल्द पूरा करने के निर्देश दिये। सोबन सिंह जीना राजकीय आयुर्विज्ञान शोध संस्थान में चले 331 करोड़ के विभिन्न निर्माण कार्यों को जल्द पूरा कर दो अक्टूबर को इसके लोकार्पण करने के निर्देश विभागीय मंत्री ने अधिकारियों को दिये। इसके साथ ही उन्होंने राजकीय मेडिकल कॉलेज रूद्रपुर में 5926 लाख धनराशि से पूरी हो चुकी विभिन्न परियोजना के शीघ्र हस्तांतरण के निर्देश भी अधिकारियों को दिये। मेडिकल कॉलेज हरिद्वार के जल्द शिलान्यास के निर्देश देते हुए डा. रावत ने कहा कि कॉलेज के निर्माण कार्यों के लिए शासन ने 75 करोड़ की धनराशि अवमुक्त कर दी है। उन्होंने राजकीय मेडिकल कॉलेज हल्द्वानी में 2459 करोड़ की धनराशि से बनने वाले 1000 सीट की क्षमता के ऑडिटोरियम का निर्माण 31 दिसम्बर से पहले करने का निर्देश अधिकारियों को दिये साथ ही उन्होंने कॉलेज में 207 लाख से निर्मित बर्न यूनिट को अगस्त माह तक पूरा करने को कहा।

बैठक में अपर सचिव स्वास्थ्य एवं मिशन निदेशक एनएचएम सोनिका, अपर मिशन निदेशक डा. अभिषेक त्रिपाठी, स्वास्थ्य महानिदेशक डा. तृप्ति बहुगुणा, निदेशक स्वास्थ्य डा. विनीता शाह, प्राचार्य दून मेडिकल कॉलेल डा. आशुतोष सयाना, प्राचार्य मेडिकल कॉलेज श्रीनगर डा. सी.एम.एस. रावत, प्राचार्य मेडिकल कॉलेज अल्मोड़ा डा. चन्द्र प्रकाश भैसोड़ा, प्राचार्य मेडिकल कॉलेज हल्द्वानी डा. अरूण जोशी, प्राचार्य मेडिकल कॉलेज रूद्रपुर प्रो.के.सी. पंत, प्राचार्य मेडिकल कॉलेज हरिद्वार डा. प्रदीप भारती गुप्ता, डा. बी.एस.नेगी, डा. मयंक बडोला, डा. अमित, सीजीएम पेयजल निगम सुभाष चैहान, जीएम पेयजल निगम सी.एस. रजवार, जीएम ब्रिडकुल आर.पी.उनियाल, ईई आर.के. नेगी, नवनीत, एस.एच. जोशी, नवीन चन्द्रा, वी.वी. रावत, विनोद कुमार, अजय वशिष्ठ, सतीश चन्द्र सक्सेना सहित विभागीय अधिकारी तथा कार्यदायी संस्थाओं के प्रतिनिधि उपस्थित रहे।

आखिर किसे कहा, स्वास्थ्य मंत्री ने-नही सुधरे तो एक माह में अनुबंध खत्म

राज्यभर में पीपीपी मोड़ में संचालित अस्पतालों की समीक्षा बैठक में विभागीय मंत्री डा. धन सिंह रावत ने कार्यप्रणाली में सुधार लाने के निर्देश दिये। उन्होंने कहा कि यदि संबंधित अस्पतालों ने एक माह के भीतर जन अपेक्षाओं के अनुरूप अपनी कार्यप्रणाली में सुधार नहीं किया तो सरकार ऐसे अस्पतालों के विरूद्ध कार्यवाही करते हुए अनुबंध समाप्त करने की कार्यवाही सुनिश्चित करेगी। बैठक में कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज सहित आधा दर्जन विधायकों ने प्रतिभाग करते हुए अपने विधानसभा क्षेत्रों में संचालित पीपीपी मोड़ अस्पतालों में क्षेत्रीय जनता को आ रही समस्याएं गिनाई। जिस पर विभागीय मंत्री ने स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों को ऐसे अस्पतालों की लगातार निगरानी करने तथा शासन को मासिक रिपोर्ट भेजने को कहा।

सूबे के स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा मंत्री डा. धन सिंह रावत ने विधानसभा स्थित सभागार में प्रदेश भर में पीपीपी मोड़ में संचालित अस्पतालों के संचालकों एवं विभागीय अधिकारियों की बैठक ली। जिसमें कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज सहित संबंधित क्षेत्रों के आधा दर्जन विधायकों ने प्रतिभाग किया। बैठक में विधायकों ने अपने-अपने क्षेत्र में संचालित पीपीपी मोड़ अस्पतालों की समस्याएं रखी। विधायकों ने पीपीपी मोड़ में चल रहे अस्पतालों के गैरजिम्मेदाराना रवैये, डाक्टरों की कमी जैसे अन्य कई गंभीर मुद्दे बैठक में रखे। जिस पर विभागीय मंत्री डा. रावत ने पीपीपी मोड़ अस्पताल संचालकों को कार्यप्रणाली में सुधार लाने के निर्देश दिये। उन्होंने कहा कि यदि संबंधित अस्पतालों ने एक माह के भीतर अपनी कार्यप्रणाली में जन अपेक्षाओं के अनुरूप सुधार नहीं लाया तो सरकार ऐसे अस्पतालों के विरूद्ध अनुबंध समाप्त करने की कार्यवाही से गुरेज नहीं करेगी। डा. रावत ने बताया कि सरकार का मकसद पीपीपी मोड़ के माध्यम से स्थानीय स्तर पर जनता को स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराना है। अस्पताल संचालकों की जिम्मेदारी है कि वह अस्पताल में विशेषज्ञ डाक्टरों की उपलब्धता सुनिश्चित कर लोगों की स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतों को दूर करें। विधायकों एवं स्थानीय जनता के साथ समन्वय स्थापित करने के लिए उन्होंने अस्पताल संचालकों को संपर्क अधिकारी नियुक्ति करने के निर्देश दिये। डा. रावत ने विभागीय अधिकारियों को निर्देशित करते हुए कहा वह पीपीपी मोड़ में संचालित अस्पतालों की लगातार निगरानी कर प्रत्येक माह रिपोर्ट शासन को भेजें। कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज ने बताया कि क्षेत्र भ्रमण के दौरान क्षेत्रवासियों ने पीपीपी मोड़ में संचालित अस्पताल बीरोंखाल में अव्यवस्था की शिकायतें की तथा स्वयं उन्होंने पाया कि अस्पताल में विशेषज्ञ डाक्टर व टेक्निशियन गायब मिले। यही नहीं क्षेत्रवासियों ने बताया कि काफी दिनों तक अस्पताल की ओपीडी भी बंद रही जिस कारण क्षेत्रवासियों को स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ा।

बैठक में कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज, विधायक टिहरी धन सिंह नेगी, विधायक सल्ट महेश जीना, विधायक रामनगर दिवान सिंह बिष्ट, घनसाली विधायक शक्ति लाल शाह, पूर्व विधायक एवं नगर पालिका अध्यक्ष पौड़ी यशपाल बेनाम, सचिव स्वास्थ्य अमित नेगी, अपर सचिव स्वास्थ्य एवं मिशन निदेशक एनएचएम सोनिका, स्वास्थ्य महानिदेशक डा. तृप्ति बहुगुणा, सीएमओ टिहरी संजय जैन, डा. ए.एस. चैहान, डा. रमेश कुमार, डा. शैलेन्द्र सिंह, डा. रमेश सिंह राणा, डा. आशीष गुसांई, डा. एमबी पंत, डा. पीयूष, डा. संतोष कुंवर, डा. गौरव रतूड़ी, डा. प्रतिभा कोहली, दीपक गोयल, अभिषेक दुबे, अम्बेश बाजपेय सहित विभागीय अधिकारी एवं पीपीपी मोड़ अस्पतालों के प्रतिनिधि उपस्थिति रहे।

विभाग की बेहत्तरी के लिए स्वास्थ्य मंत्री ने पूर्व महानिदेशकों से लिये सुझाव

प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं को बेहत्तर बनाने एवं आम जनमानस तक विभाग की पहुंच बनाने के उद्देश्य से सूबे के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री डा. धन सिंह रावत ने आज विधानसभा में सूबे के पूर्व स्वास्थ्य महानिदेशकों की बैठक बुलाई। डा. रावत ने कहा कि सूबे की स्वास्थ्य सुविधाओं को और सुदृढ़ बनाने के लिए इस क्षेत्र में कार्य कर रहे विशेषज्ञों से सुझाव एवं सलाह ली जायेगी। जिसके लिए उन्होंने 150 दिनों का लक्ष्य विभागीय अधिकारियों को दिया है। इस क्रम आज उत्तराखंड के प्रथम महानिदेशक स्वास्थ्य डा. आई.एस.पाल सहित आधा दर्जन पूर्व स्वास्थ्य महानिदेशकों ने बैठक में प्रतिभाग कर अपने सुझाव रखे।

बैठक में अपने अनुभवों को साझा करते हुए डा. पाल ने कहा कि राज्य के स्वास्थ्य केन्द्रों के बेहत्तर संचालन के लिए मेडिकल उपकरणों के रख-रखाव के साथ ही पैरामेडिकल स्टॉफ एवं टेक्निशियन्स को समय-समय पर प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए ताकि अस्पताल में आने वाले मरीजों का बेहत्तर उपचार किया जा सकेगा। डा. आर.पी. भट्ट ने कहा कि प्रदेशभर के अस्पतालों में फिजिशियन एवं स्त्री रोग विशेषज्ञों की तैनाती अति आवश्यक है। डा. डी.एस. रावत ने ब्लॉक एवं जिला अस्पतालों में आपसी समन्वय को जरूरी बताया। उन्होंने बच्चों में होने वाले गम्भीर रोगों की पहचान हेतु ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सकों को विशेष प्रशिक्षण दिये जाने पर बल दिया। डा. अमिता उप्रेति ने कहा कि आशा वर्कर्स को विशेष प्रशिक्षण देकर गर्भवती महिलाओं एवं बच्चों के स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता अभियान में लगाया जा सकता है। डा. आशा माथुर ने कहा कि गर्भवती महिलाओं पर विशेष ध्यान देने के साथ ही चिकित्सालयों में प्रसव की सुविधाए बढ़ाई जानी चाहिए। इस मौके पर डा. आर.सी.एस. सयाना एवं डा. आर.सी. आर्य ने भी अपने सुझाव रखे।

एम्स में भर्ती ब्लड कैंसर से पीड़ित महिला के पति को सीएम ने दिया पांच लाख रूपए का चेक


मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने एम्स ऋषिकेश में ब्लड कैंसर से पीड़ित अनु धामी के इलाज के लिए मुख्यमंत्री विवेकाधीन कोष से 05 लाख रुपए का चेक उनके पति मदन धामी को सौंपा। मुख्यमंत्री ने कहा कि अनु धामी के इलाज के लिए सरकार की ओर से हर संभव मदद दी जाएगी।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को अनु धामी की बीमारी का पता चलते ही उन्होंने जिलाधिकारी देहरादून आर राजेश कुमार को उनकी स्वास्थ्य की जानकारी लेने के लिए एम्स ऋषिकेश भेजा। परिवार की आर्थिक स्थिति खराब होने की जानकारी मिलते ही मुख्यमंत्री ने अनु धामी के इलाज के लिए मुख्यमंत्री विवेकाधीन कोष से धनराशि स्वीकृत की।

इस अवसर पर एम्स ऋषिकेश के निदेशक प्रो. रविकांत एवं जिलाधिकारी देहरादून आर. राजेश कुमार मौजूद थे।

रिकंस्ट्रक्टिव एवं कॉस्मेटिक गायनेकोलॉजी की ओपीडी एम्स ऋषिकेश में शुरू

विश्व की पहली रिकंस्ट्रक्टिव एवं कॉस्मेटिक गायनेकोलॉजी की डिवीजन जो कि एम्स ऋषिकेश में स्थापित है ने हर सप्ताह सोमवार, बुधवार और शुक्रवार को सुबह 8.30 बजे से दोपहर 1 बजे तक अपनी ओपीडी शुरू की है। पूर्व में विभाग की ओपीडी सेवाएं कोविड-19 वैश्विक महामारी के कारण भारत सरकार के नियमानुसार स्थगित की गई थी।
रिकंस्ट्रक्टिव एवं कॉस्मेटिक गायनेकोलॉजी डिवीजन के प्रमुख डा. नवनीत मग्गो ने बताया कि अपनी ओपीडी सेवाओं के माध्यम से नारी सेवा करना उनके लिए बहुत गौरव की बात है। गौरतलब है कि डा. मग्गो एक सुप्रसिद्ध अंतराष्ट्रीय कॉस्मेटिक शल्य चिकित्सक हैं, जो कि अमेरिका और यूरोप से इस चिकित्सा में प्रशिक्षित हैं, लिहाजा उन्होंने अपना जीवन महिलाओं की निजी चिकित्सकीय समस्याओं के मद्देनजर नारी कल्याण के लिए समर्पित किया है।
उन्होंने जुलाई सन 2019 में निदेशक प्रो. रविकांत के मागर्दशन में संस्थान में रिकंस्ट्रक्टिव एवं कॉस्मेटिक गायनेकोलॉजी डिवीजन की स्थापना की थी। यह डिवीजन एक सुपर स्पेशलिटी डिवीजन है, जिसका उद्देश्य महिलाओं की निजी स्वास्थ्य समस्याओं का निवारण करना है। ऐसी समस्याओं में स्ट्रेस यूरिनरी इनकंटीनेंस, संबंध बनाने में परेशानी, योनि के रास्ते से शरीर के हिस्से का बाहर आना, फीमेल जेनिटल म्यूटिलेशन आदि मुख्यरूप से शामिल हैं।

निदेशक ने बताया कि रिकंस्ट्रक्टिव एवं कॉस्मेटिक गायनेकोलॉजी डिवीजन की ओपीडी सेवाएं महिलाओं के लिए अत्यंत लाभदायक सिद्ध होंगी। उन्होंने उम्मीद जताई कि ऋषिकेश एम्स में दुनियाभर में अपनी तरह की इस पहली चिकित्सा ओपीडी में इस तरह की समस्याओं से पीड़ित महिलाएं आएंगी और विशेषज्ञों को अपनी निजी परेशानियों से अवगत कराकर इन सुपर स्पेशलिटी सेवाओं का लाभ लेंगी। यह सेवाएं ग्रसित महिलाओं को नवजीवन प्रदान करेंगी।
जानें, कब कौन सी ओपीडी होगी संचालित

इस सुपरस्पेशलिटी विभाग की पेल्विक ऑर्गन प्रोलैप्स क्लिनिक सोमवार को दोपहर 2 बजे से 4 बजे तक चलेगा। बताया गया कि उत्तराखंड में बहुत सी महिलाएं बच्चेदानी के बाहर निकलने की समस्या से पीड़ित हैं, क्योंकि यह पहाड़ी क्षेत्र है। लिहाजा इस तकलीफ का सबसे आधुनिक उपचार उत्तराखंड में पहली बार एम्स ऋषिकेश द्वारा स्थापित रिकंस्ट्रक्टिव एवं कॉस्मेटिक गायनेकोलॉजी डिवीजन में उपलब्ध कराया गया है, जिसे साइट स्पेसिफिक रिपेयर कहते हैं, इसमें चिकित्सा विशेषज्ञों द्वारा अमेरिका से दक्षता हासिल की गई है।
फीमेल जेनिटल म्यूटिलेशन क्लिनिक, मंगलवार दोपहर 2 बजे से 4 बजे तक चलेगा। बताया गया कि समाज के कुछ समुदाय इस समस्या से ग्रसित हैं, जिसमें एक महिला के बाहरी यौन अंग नष्ट करके उसका जीवन नष्ट कर दिया जाता है। डॉक्टर नवनीत मग्गो अंतराष्ट्रीय स्तर पर इस समस्या का उपचार करने के लिए दक्षता हासिल हैं, जो कि इस तरह की समस्या से पीड़ित महिलाओं के लिए वरदान है।

फीमेल सेक्सुअल डिस्फंक्शन क्लिनिक, बुधवार को दोपहर 2 बजे से 4 बजे तक रिकंस्ट्रक्टिव एवं कॉस्मेटिक गायनेकोलॉजी विभाग की ओपीडी में संचालित किया जाएगा। बताया गया है कि समाज में लगभग 40 प्रतिशत महिलाएं वैवाहिक परस्पर संबंध बनाने की परेशानी से ग्रस्त हैं, मगर वह चुप्पी साधे रहती हैं। जिसका दुष्प्रभाव अमूमन पारिवारिक ढांचे पर पड़ता है और परिवार टूट जाते हैं। विभाग के चिकित्सकों का इस समस्या से ग्रसित महिलाओं से अनुरोध किया है कि वह अपनी समस्या का समय रहते संपूर्ण इलाज कराएं।

वजाइनल रिजूवनेशन क्लिनिक, शनिवार सुबह 10 से 12 बजे तक संचालित होगा। जिन महिलाओं की योनि का रास्ता बच्चा होने या उम्र के साथ साथ ढीला हो जाता है, वह रिकंस्ट्रक्टिव एवं कॉस्मेटिक गायनेकोलॉजी के इस क्लिनिक का लाभ उठा सकती हैं। बताया गया कि विभाग के विशेषज्ञों द्वारा रेडियोफ्रीक्वेंसी और लेजर जैसी आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल करके महिलाओं की इस समस्या का स्थायी निवारण किया जाएगा।
स्ट्रेस यूरिनरी इनकंटिनेंस क्लिनिक, शुक्रवार दोपहर 2 से 4 बजे तक शुरू किया जा रहा है। चिकित्सकों ने बताया कि स्ट्रेस यूरिनरी इनकंटीनेंस की समस्या में महिलाओं के खांसने, छींकने, हंसने, वजन उठाने पर पेशाब स्वतरू छूट जाता है। उन्होंने बताया कि प्रत्येक तीन में से एक महिला इस परेशानी से पीड़ित है और विज्ञान के अनुसार, इसका सबसे आधुनिक इलाज रिकंस्ट्रक्टिव एवं कॉस्मेटिक गायनेकोलॉजी में उपलब्ध है। डॉ. नवनीत मग्गो के द्वारा इस विषय में लिखे गए विज्ञान पत्र अंतरराष्ट्रीय जर्नल्स और पुस्तकों में प्रकाशित हुए हैं।

ऋषिकेश एम्स में नया आक्सीजन प्लांट हो रहा स्थापित, मिलेगा लाभ

एम्स ऋषिकेश में हवा से ऑक्सीजन उत्पादन करने वाला ’पीएसए ऑक्सीजन प्लांट’ स्थापित किया जा रहा है। कोरोना की तीसरी लहर की आशंका के मद्देनजर यह प्लांट कोविड मरीजों के उपचार में विशेष लाभकारी साबित होगा। काफी हद तक संभावना है कि एक माह के भीतर प्लांट से ऑक्सीजन का उत्पादन होने लगेगा।

एम्स निदेशक प्रो. रविकांत की देखरेख में गंभीर किस्म के रोगियों के इलाज हेतु सुविधाओं में इजाफा करते हुए एम्स ऋषिकेश अब स्वयं ही मेडिकल ऑक्सीजन का उत्पादन करेगा। इस सुविधा को शुरू करने के लिए डीआरडीओ की मदद से संस्थान में ऑक्सीजन प्लांट स्थापित किया जा रहा है। पीएसए ( प्रेशर स्विंग एडसॉर्प्शन ) तकनीक आधारित इस प्लांट से चैबीस घंटे प्रति मिनट 1000 लीटर ऑक्सीजन गैस का उत्पादन होगा।

ऑक्सीजन प्लांट प्रोजेक्ट के नोडल ऑफिसर डॉक्टर अजय कुमार ने बताया कि कोरोना संक्रमण की संभावित तीसरी लहर की चुनौतियों से निपटने में यह प्लांट विशेष लाभकारी साबित होगा। अभी तक एम्स में भर्ती मरीजों के उपचार के लिए बाह्य क्षेत्र से लिक्विड ऑक्सीजन मंगाकर उसे स्टोर करने की व्यवस्था है और फिर उसे गैस में परिवर्तित कर पाइपलाइन के माध्यम से अस्पताल के विभिन्न वार्डों तक पहुंचाया जाता है। बताया कि पीएम केअर फंड से तैयार हो रहे इस प्लांट से एक महीने के भीतर ऑक्सीजन का उत्पादन शुरू हो जाएगा।

गौरतलब है कि एम्स ऋषिकेश में मौजूदा समय में 30 हजार लीटर क्षमता का लिक्विड ऑक्सीजन स्टोरेज प्लांट स्थापित है। अस्पताल में भर्ती मरीजों को यहीं से ऑक्सीजन की सप्लाई की जाती है। नए ऑक्सीजन प्लांट के स्थापित होने से 15 लीटर प्रति मिनट ऑक्सीजन सप्लाई पर एक ही समय में 64 वेन्टिलेटर अतिरिक्त तौर से संचालित किए जा सकेंगे और ऑक्सीजन सप्लाई की क्षमता पहले की अपेक्षा अब डेढ़ गुना तक बढ़ जाएगी।

सांसद बलूनी के प्रयासों से जल्द मिलेगी राज्य को सौगात, टाटा कैंसर इंस्टीट्यूट जल्द खुलने जा रहा

नई दिल्ली। उत्तराखंड से राज्यसभा सांसद और भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय मीडिया प्रमुख अनिल बलूनी ने कहा कि हम उत्तराखंड में शीघ्र ही ’टाटा कैंसर इंस्टीट्यूट’ की स्थापना की ओर बढ़ रहे हैं जो कि उत्तराखंड राज्य की स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में मील का पत्थर होगा। उन्होंने कहा उनका प्रयास है टाटा कैंसर इंस्टीट्यूट स्थापना के साथ ही तत्काल उपचार के स्तर पर भी कार्य प्रारंभ कर दे।

सांसद बलूनी ने कहा कि जब वे स्वयं कैंसर से जूझ रहे थे और अस्पताल के बिस्तर पर मुंबई में निरंतर सोचते रहते थे कि जिस स्तर का उपचार मिल रहा है क्या मेरे राज्य के एक आम आदमी को ऐसा उपचार मिल पाएगा। केंद्र में मोदी जी के नेतृत्व की मजबूत सरकार और आमजन के लिए तमाम योजनाओं के प्रति संवेदनशील नेतृत्व के प्रति अटूट विश्वास था। तभी से इस विचार को धरातल पर उतारने के लिए निरंतर प्रयास जारी थे।

सांसद बलूनी ने कहा कि टाटा कैंसर इंस्टीट्यूट एटॉमिक एनर्जी (परमाणु ऊर्जा) मंत्रालय के अधीन आता है, जिसके लिए उन्होंने प्रधानमंत्री कार्यालय, परमाणु ऊर्जा मंत्रालय के माननीय मंत्री जितेंद्र सिंह से कई चरणों में बैठक की। उन्हें राज्य के स्वास्थ्य ढांचे और विशेषकर कैंसर उपचार की वर्तमान स्थिति के बारे में बताया। वे जितेंद्र सिंह का आभार प्रकट करते हैं की उन्होंने प्राथमिकता के साथ इस विषय पर सहयोग किया। कल मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से भी मुलाकात के दौरान राज्य में कैंसर संस्थान के बारे में लंबी चर्चा हुई और उन्होंने कहां कि राज्य सरकार कि ओर से महत्वपूर्ण कार्य में प्राथमिकता से सहयोग किया जाएगा। सांसद बलूनी ने कहा कि अब विश्व स्तरीय कैंसर संस्थान कि उत्तराखंड में स्थापना अंतिम चरण में है। हम शीघ्र ही राज्य हेतु इस सौगात को प्राप्त करने के निकट हैं।

शुगर बढ़ने पर दोबारा हो सकता है म्यूकर माइकोसिसः एम्स ऋषिकेश

अस्पताल से डिस्चार्ज होने के बाद यदि म्यूकर मरीजों ने अपने शुगर लेवल को नियंत्रित रखने में लापरवाही बरती तो उन्हें फिर से म्यूकर माइकोसिस हो सकता है। जिससे उन्हें दोबारा अस्पताल में भर्ती करने की स्थिति आ सकती है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, एम्स ऋषिकेश ने ऐसे मरीजों को शुगर लेवल के प्रति सतर्क रहने की सलाह दी है।
म्यूकर ग्रसित मरीजों की संख्या में अब भले ही कमी आने लगी हो, लेकिन शुगर पर नियंत्रण नहीं रखने से ऐसे मरीजों की दिक्कतें फिर से बढ़ सकती हैं। इस बाबत एम्स ऋषिकेश ने सलाह दी है कि अस्पताल से डिस्चार्ज होने के बाद भी म्यूकर रोगियों को अपने शरीर में शुगर के स्तर को नियंत्रित रखना बेहद जरूरी है। गौरतलब है कि कोविड की दूसरी लहर के दौरान मई माह में म्यूकर माइकोसिस के मामले एकाएक बढ़ गए थे। तब से अभी तक एम्स ऋषिकेश में म्यूकर माइकोसिस के 348 रोगी आ चुके हैं। वर्तमान में यहां कुल 170 म्यूकर रोगियों का उपचार चल रहा है। इनमें से 108 म्यूकर मरीज एम्स अस्पताल में और 62 मरीज आईडीपीएल स्थित राइफलमैन जसवंत सिंह रावत कोविड केयर सेंटर में उपचाराधीन हैं।
एम्स निदेशक रविकांत ने बताया कि जिन लोगों को शुगर की समस्या है, उन्हें म्यूकर माइकोसिस का ज्यादा खतरा है। खासतौर से उन मरीजों को जिन्हें कोविड हुआ है, उन्हें अपने शुगर के प्रति बहुत गंभीरता बरतनी चाहिए। उनका कहना है कि न केवल म्यूकर माइकोसिस, कई अन्य गंभीर बीमारियां भी ब्लड शुगर बढ़ने से होती हैं। बताया कि यह कोई जरूरी नहीं कि जो लोग म्यूकर का उपचार करवाकर डिस्चार्ज हो रहे हैं, उनमें दोबारा म्यूकर नहीं हो सकता। यदि शरीर में शुगर की मात्रा बढ़ गई तो म्यूकर फंगस फिर से उन्हीं अंगों अथवा शरीर के अन्य अंगों को चपेट में ले सकता है और मरीज को फिर से अस्पताल में भर्ती करने की नौबत आ सकती है। लिहाजा ऐसे मरीजों के लिए अपना ब्लड शुगर नियंत्रित रखना बहुत जरूरी है।
म्यूकर ट्रीटमेंट टीम के हेड और ईएनटी सर्जन डॉ. अमित त्यागी ने इस बाबत बताया कि म्यूकर माइकोसिस के रोगी को एम्फोटेरिसिन इंजेक्शन से इलाज के लिए सामान्यतौर पर न्यूनतम 3 से 6 सप्ताह तक अस्पताल में भर्ती रहना पड़ता है। उन्होंने बताया कि एम्स में अब तक म्यूकर के 126 रोगियों की एंडोस्कोपिक सर्जरी, 92 रोगियों की तालुका तथा जबड़े से संबंधित मैक्सिलेक्टॉमी सर्जरी और 64 रोगियों की आंख की सर्जरी की जा चुकी है।
डा. त्यागी ने बताया कि जो मरीज आईडीपीएल स्थित राइफलमैन जसवंत सिंह कोविड केयर सेंटर में भर्ती किए जा रहे हैं, उन्हें भोजन एवं उपचार आदि की सुविधा निःशुल्क उपलब्ध कराई जा रही है। उन्होंने बताया कि कोविड की दूसरी लहर के दौरान हम सभी को कई प्रकार के अनुभव प्राप्त हुए हैं। इन अनुभवों ने हमें सिखाया है कि म्यूकर माइकोसिस जैसी जानलेवा बीमारी से बचने के लिए शरीर में शुगर की मात्रा नियंत्रित रखना बेहद जरूरी है अन्यथा इस खतरनाक बीमारी से बचाव होना बहुत मुश्किल है।

कोविड नियमों की अनदेखी करने पर फिर बिगड़ सकते हैं हालात

कोविड गाइडलाइन के पालन को लेकर यदि लोग अब भी लापरवाह बने रहे तो कोरोना का ’डेल्टा वेरिएंट’ तीसरी लहर का कारण बन सकता है। इन हालातों में तीसरी लहर के खतरे को कम करने के लिए अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, एम्स ऋषिकेश ने नागरिकों को कोविड नियमों का पालन गंभीरता से सुनिश्चित करने की सलाह दी है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार डेल्टा वेरिएंट अभी तक विश्व के 100 देशों में पाया जा चुका है। डेल्टा वेरिएंट को बी. 1.617.2. स्ट्रेन भी कहते हैं। जबकि ’डेल्टा प्लस’ वेरिएंट बी. 1.617.2.1 है। कोरोना वायरस के स्वरूप में आ रहे बदलावों की वजह से ही डेल्टा वायरस बना है।
निदेशक प्रोफेसर रविकांत ने बताया कि कोरोना वायरस के अन्य सभी वेरिएंटों की तुलना में डेल्टा प्लस वेरिएंट की वजह से फेफड़ों में कोविड निमोनिया का संक्रमण ज्यादा हो सकता है। यह भी संभावना है कि कोरोना वायरस के डेल्टा प्लस वेरिएंट में एंटीबाॅडी काॅकटेल’ जैसी दवा का भी शत- प्रतिशत असर नहीं हो पाए। लेकिन इतना जरूर है कि वैक्सीन लगा चुके लोगों में इसकी वजह से गंभीर किस्म के संक्रमण का कोई मामला फिलहाल भारत में नहीं मिला है। उन्होंने बताया कि अब तक देश के 12 राज्यों में इसकी पुष्टि हो चुकी है। उन्होंने कहा कि तीसरी लहर डेल्टा प्लस वेरिएंट के कारण आएगी, यह कहना अभी संभव नहीं है। गत माह एम्स ऋषिकेश द्वारा आईसीएमआर को भेजे गए कोविड के 15 सैंपलों में से एक में भी डेल्टा प्लस वेरिएंट की पुष्टि नहीं हुई है। इन सैंपलों को रेन्डम के आधार पर एकत्रित किया गया था।

डेल्टा प्लस की विशेषता
संस्थान के माइक्रोबायोलॉजी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डाॅ. दीप ज्योति कलिता जी का कहना है कि कोरोना एक आरएनए वायरस है। आरएनए वायरस की पहचान है कि यह बार-बार उत्परिवर्तित होकर अपना रूप बदलता है। अभी तक कोरोना के अल्फा, बीटा, डेल्टा और डेल्टा प्लस आदि रूपों की पहचान हो चुकी है। डाॅ. कलिता ने बताया कि डेल्टा प्लस वेरिएंट निचली श्वसन प्रणाली में फेफड़ों की म्यूकोसल कोशिकाओं के लिए घातक हो सकता है।
पहचान और लक्षण
कोविड के नोडल ऑफिसर डाॅ. पी.के. पण्डा जी ने बताया कि कोरोना वायरस तेजी से रूप बदलने में माहिर है। ऐसे में डेल्टा प्लस के कई अन्य मामले और हो सकते हैं। उन्होंने बताया कि वैक्सीन लगने के बाद भी यदि किसी व्यक्ति में कोविड-19 के लक्षण नजर आ रहे हैं तो उसमें डेल्टा प्लस की संभावनाएं हो सकती हैं। इन हालातों में कोरोना के संदिग्ध वेरिएंट वाले मरीज का सैम्पल आईसीएमआर की प्रयोगशाला में भेजा जाता है। अब तक यह भी देखा गया है कि डेल्टा प्लस वेरिएंट के रोगी में कोविड वैक्सीन ज्यादा प्रभावकारी नहीं हुई है। उन्होंने बताया कि डेल्टा प्लस वैरिएंट महामारी को रोकने के लिए निम्न 4 चरणों के पालन करने की नितांत आवश्यकता है।
1)- सबसे पहले और सबसे महत्वपूर्ण यह है कि कोविड संदिग्ध व कोविड पाॅजिटिव रोगियों की पहचान की जाए। पहचान होने पर संबंधित व्यक्ति को न्यूनतम 7 दिनों के लिए क्वारन्टीन किया जाए। इनमें एचआईवी पाॅजिटिव रोगी, अनियंत्रित डायबिटीज, डायलिसिस कराने वाले क्रोनिक किडनी के रोगी, अंग प्रत्यारोपण वाले रोगी, कैंसर के रोगी, 3 सप्ताह से स्टेरॉयड लेने वाले रोगी और कम प्रतिरक्षा वाले रोगियों को उनकी आरटीपीसीआर रिपोर्ट नेगेटिव आने तक अलग रखा जाना चाहिए। ऐसे रोगियों में कोरोना वायरस लंबे समय तक रहने की प्रबल संभावना होती है।

2) कहीं भी और किसी को भी कोई सामुहिक सभा की अनुमति हरगिज नहीं दी जाए। विशेष परिस्थियों में यदि अनुमति देना जरुरी हो, तो ऐसी स्थिति में सभी लोग कम से कम 1 मीटर की शारीरिक दूरी बनाए रखें और मास्क अनिवार्यरूप से पहनें। ऐसे स्थानों में वेंटिलेशन और हाथ धोने की पर्याप्त सुविधा होनी चाहिए। हाथों को स्वच्छ रखना बहुत जरूरी है। इसके साथ ही सामुहिक सभा में प्रतिभाग करने वाले सभी प्रतिभागियों का पहले से टीकाकरण होना भी अनिवार्य है।

3) प्रत्येक व्यक्ति कोविड व्यवहार के 5 प्रमुख नियमों- शारीरिक दूरी बनाए रखना, हाथों की स्वच्छता, स्वच्छ मास्क पहनना, हवादार कमरे में रहना और कोविड टीकाकरण कराने का अनिवार्यरूप से पालन किया जाए।

४) यह जरूरी नहीं कि प्रत्येक कोविड रोगी का उपचार मल्टीपल काॅम्बिनेशन वाली दवाओं से ही किया जाए। पाॅलीफार्मेसी की आवश्यकता के बिना भी संबंधित दवा कोविड मरीज को ठीक कर सकती हैं।

एम्स में अंतर्राष्ट्रीय नशा निषेध दिवस के मौके पर नशावृत्ति के प्रति जागरूक किया

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में अंतर्राष्ट्रीय नशा निषेध दिवस (इंटरनेशनल डे अगेंस्ट ड्रग एब्यूज एंड इलिसिट ट्रैफकिंग) मनाया गया, इस अवसर पर संस्थान में मरीजों एवं उनके परिजनों, तीमारदारों को विभिन्न पब्लिक एरियाज में सोशल डिस्टेन्सिंग के नियमों का पालन करते हुए नशावृत्ति को लेकर जागरुक किया गया।

निदेशक प्रोफेसर रवि कांत ने बताया कि संस्थान में संचालित एटीएफ के तहत ओपीडी और एडमिशन, दोनों तरह से उपचार की सुविधाएं उपलब्ध हैं, जो कि मरीजों को निशुल्क दी जा रही हैं। लिहाजा सभी को अपने परिवार या आसपास रहने वाले नशाग्रस्त लोगों को संस्थान में उपलब्ध स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ दिलाना चाहिए और ऐसे लोगों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने में योगदान देना चाहिए।
एम्स ऋषिकेश में वर्ल्ड ड्रग दिवस पर आयोजित जनजागरुकता कार्यक्रम में एटीएफ (एडिक्शन ट्रीटमेंट फैसिलिटी) से डॉ. तन्मय जोशी ने विभिन्न तरह के नशीले पदार्थों व दृव्यों को लेकर कई तत्थ्य एवं मिथकों के बारे में लोगों को जानकारी दी। उन्होंने बताया कि वर्ल्ड ड्रग रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में कैनाबिस (यानी भांग, गांजा, चरस आदि ) के साथ साथ शामक दवाइयों का गैर चिकित्सकीय उपयोग बहुत अधिक बढ़ गया है। दक्षिण एशियाई देशों के आंकड़ों पर गौर करें तो वर्ष 2019 में हर 100 में से लगभग 3 व्यक्तियों ने कैनाबिस का उपयोग किया था। एटीएफ काउंसलर तेजस्वी ने मरीजों के परिजनों को बताया कि किशोर वर्ग में इन्हेलन्ट्स का प्रयोग पाया जाना बेहद चिंताजनक है।

संस्थान के मनोचिकित्सा विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर एवं ए.टी.एफ प्रोजेक्ट के नोडल ऑफिसर डॉ. विशाल धीमान ने बताया कि उत्तराखंड परिक्षेत्र में लगभग 38 फीसदी लोग शराब का सेवन कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि कोरोना महामारी के दौरान लोगों में बढ़ते तनाव व अन्य कारणों के चलते सभी नशीले पदार्थ का सेवन बढ़ा है, जिससे कई अन्य तरह की परेशानियों में भी इजाफा हुआ है।

मनोचिकित्सा विभागाध्यक्ष डा. रवि गुप्ता एवं फैकल्टी मेंबर डॉ. विक्रम रावत ने लोगों को बताया कि आमतौर पर नशा शराब से शुरू होता है और समय के साथ साथ निकोटीन और गांजा की ओर बढ़ता है, यह प्रवृत्ति व्यक्ति को धीरे धीरे हार्ड ड्रग्स की ओर ले जाती है। लिहाजा नशा मनुष्य शरीर के लिए बेहद खतरनाक है, इसीलिए वर्ल्ड ड्रग डे पर लोगों से नशे से जुड़े सभी तथ्यों को साझा करना जरुरी था,जिसे कई परिवारों का जीवन बचाने की ओर एक सार्थक कदम माना जा सकता है।

कार्यक्रम के माध्यम से लोगों को सभी नशीली वस्तुओं से होने वाले व्यस्न एवं व्यस्न उपचार संबंधी मिथकों के बाबत भी अवगत कराया गया।
उदाहरण- मिथक 1 – नशीली वस्तुओं का व्यस्न स्वैच्छिक होता है। तत्थ्य रू नशीली वस्तुओं का सेवन आमतौर पर मनोरंजन या नवीनता के अनुभव करने के साथ शुरू होता है, मगर यह पदार्थ दिमाग को निरंतर बदलता रहता है जो एक समय के बाद व्यक्ति को नशा लेने के लिए मजबूर कर देता है और उसके बाद कोई भी व्यक्ति उसे लिए बिना नहीं रह सकता। मिथक 2- नशीली वस्तुओं का व्यस्न चरिता या नैतिकता का दोष है। तत्थ्य रू हर नशीली वस्तु एक- दूसरे से अलग होते हुए भी कहीं न कहीं दिमाग के कुछ खास हिस्सों पर समान दुष्प्रभाव डालते हैं, जो उनके मूड अथवा चाल-ढाल में बदलाव ले आता है। यह उस एक या अनेक नशे का सेवन करने का सबसे बड़ा प्रेरक होता है और वह व्यक्ति को इस प्रेरणा के आगे बेबस और लाचार बना देता है।
मिथक 3- सब नशीली वस्तुओं से छुटकारा पाने की एक ही दवा होनी चाहिए। तत्थ्यः हर व्यक्ति अद्वितीय होता है। यदि किन्ही भी दो व्यक्तियों को एक ही बीमारी की वही दवा भी दी जाए जो पहले व्यक्ति को दी गई है, तब भी दोनों में एक सामान फर्क नहीं आता है। हर नशे की अपनी अलग पहचान होती है और इसलिए उसकी उपचार पद्धति भी अलग अलग ही होती है। हर दूसरे व्यक्ति को एक ही नशीली वस्तु अलग-अलग तरह की शारीरिक व मानसिक दिक्कतें देती है। लिहाजा एक ही तरह व दवाओं से सभी मरीजों का उपचार नहीं किया जाता। मिथक 4- व्यस्न का उपचार एक बार में हो जाना चाहिए। तत्थ्यः जब व्यस्न की बीमारी दीर्घकालीन है, तो उपचार में सततरूप से बने रहना उत्तम है। यदि ऐसा नही किया जाता है तो इलाज दोबारा से शुरू करना पड़ेगा। मिथक 5- महज उपचार शुरू कर देने से ही नशे से दूर हो जाएंगे । तत्थ्यः किसी भी नशा ग्रसित रोगी का इलाज शुरू करना पहली सीढ़ी है। मगर आपका और विशेषज्ञों का परस्पर साथ आना आवश्यक है। इलाज में बने रहना सबसे मुख्य बिंदु है, जिससे आप इलाज का अधिक से अधिक फायदा उठा पाएंगे। मिथक 6- शराब पीकर भी काबू में रहा जा सकता है । तत्थ्यः शराब का सेवन करते ही वह आपकी निर्णायक क्षमताओं में सेंध लगा देती है। इसके चलते आप कई ऐसे निर्णय ले सकते हैं, जिनका बाद में खेद हो। अक्सर यह निर्णय आपको गैरकानूनी गतिविधियों में भी सम्मिलित कर सकते हैं। मिथक 7 – गुटका, खैनी, जर्दा, चबाने वाला तम्बाकू शरीर को नुकसान नहीं देता। तत्थ्यः इन सभी वस्तुओं में मनुष्य के शरीर में कर्क रोग उत्पन्न करने वाले केमिकल मिले होते हैं । इनका सेवन करने से मुंह में होने वाली कई तरह की बीमारियां होने का खतरा बहुत अधिक बढ़ जाता है, जिनमें मुंह का कैंसर भी शामिल है।