एम्स में प्लाज्मा थैरेपी से 146 कोविड पाॅजिटिव मरीजों को किया जा चुका है स्वस्थ

यदि आप कोविड पाॅजिटिव हैं तो घबराएं नहीं। इसके लक्षण पता लगने पर पहले सप्ताह के दौरान यदि प्लाज्मा थैरेपी से उपचार किया जाए, तो कोविड संक्रमण में उपचार की यह तकनीक विशेष लाभकारी होती है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान एम्स ऋषिकेश में प्लाज्मा थैरेपी पद्धति से अब तक 146 कोविड संक्रमित मरीजों का इलाज किया जा चुका है।

एम्स निदेशक प्रो. रवि कान्त ने इस बाबत बताया कि कॉनवेल्सेंट प्लाज्मा एंटीबॉडी प्रदान करने का काम करता है। इसके उपयोग से संक्रमित व्यक्तियों में वायरस बेअसर हो जाता है। उन्होंने बताया कि जब कोई व्यक्ति किसी सूक्ष्म जीव से संक्रमित हो जाता है, तो उसके शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली इसके खिलाफ लड़ने के लिए एंटीबॉडी का उत्पादन करने का काम करती है। यह एंटीबॉडीज रक्त के प्लाज्मा में मौजूद होती है और बीमारी से उबरने की दिशा में अपनी संख्याओं में वृद्धि करती है। इससे वायरस जल्दी समाप्त होने लगते हैं। उन्होंने बताया कि इस प्रक्रिया से रिकवरी तेज होने पर पेशेंट जल्दी स्वस्थ हो जाता है। बताया कि संस्थान में प्लाज्मा थैरेपी की सभी सुविधाएं उपलब्ध हैं। लिहाजा कोरोना से स्वस्थ हो चुके लोगों को दूसरों का जीवन बचाने के लिए प्लाज्मा अवश्य डोनेट करना चाहिए।

ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन एंड ब्लड बैंक (एम्स) की विभागाध्यक्ष डा. गीता नेगी जी ने बताया कि एम्स में अब तक 146 कोविड मरीजों को प्लाज्मा थैरेपी दी जा चुकी है। उन्होंने बताया कि कोरोना संक्रमित व्यक्ति पूरी तरह ठीक होने के बाद प्लाज्मा दान कर सकता है। डोनर के शरीर से एफेरेसिस तकनीक से ब्लड निकालने के बाद प्लाज्मा एकत्रित किया जाता है। ऐफेरेसिस की सुविधा नहीं होने पर सामान्य रक्तदान से भी प्लाज्मा लिया जा सकता है। उन्होंने बताया कि प्लाज्मा थैरेपी एक ऑफ लेवल थैरेपी है। यदि कोरोना के लक्षण आने के 7 दिनों के दौरान ही इस थैरेपी का उपयोग किया जाए, तो इलाज उपयोगी होता है। उन्होेंने बताया कि स्वस्थ्य व्यक्ति के रक्त में 55 प्रतिशत प्लाज्मा मौजूद रहता है। एम्स ऋषिकेश में प्लाज्मा थैरेपी के लिए सभी संसाधन, उपकरण और प्रशिक्षित स्टाफ उपलब्ध है।

कौन कर सकता है प्लाज्मा दान

कोई भी 18 से 65 आयु वर्ग का कोरोना संक्रमित व्यक्ति संक्रमण के 28 दिन बाद प्लाज्मा डोनेट कर सकता है। इस प्रक्रिया में एंटीबॉडी टेस्ट कर एंटीबॉडी का लेवल देखा जाता है। ’ए बी’ ब्ल्ड ग्रुप वाला डोनर किसी को भी प्लाज्मा डोनेट कर सकता है। जबकि ’ओ’ ग्रुप वाला रोगी अन्य किसी भी ग्रुप वाले डोनर का प्लाज्मा ले सकता है। इस थैरेपी को इस्तेमाल करने से पहले डोनर का एंटीबाॅडी टेस्ट किया जाता है। ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन एंड ब्लड बैंक विभाग एम्स के डाॅ. आशीष जैन और डाॅ. दलजीत कौर ने बताया कि डोनर के रक्त में एंटीबाॅडी का पर्याप्त मात्रा में होना जरूरी है। उन्होंने बताया कि इस प्रक्रिया में लगभग 2 घंटे लगते हैं और यह तकनीक पूरी तरह से सुरक्षित है। इससे प्लाज्मा डोनेट करने वाले व्यक्ति के स्वास्थ्य पर कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ता है।

एम्स में भर्ती सुंदरलाल बहुगुणा के फेफड़ों में मिला संक्रमण

एम्स,ऋषिकेश के कोविड आईसीयू वार्ड में भर्ती पर्यावरणविद् सुन्दरलाल बहुगुणा के फेफड़ों में संक्रमण पाया गया है। एनआरबीएम मास्क के माध्यम से उन्हें 8 लीटर ऑक्सीजन सपोर्ट पर रखा गया है व संस्थान के चिकित्सकों की टीम उनके स्वास्थ्य की निगरानी व उपचार में जुटी है।

बीते मंगलवार को कॉर्डियोलाॅजी विभाग के चिकित्सकों की टीम ने पर्यावरणविद् सुन्दर लाल बहुगुणा की हृदय संबंधी विभिन्न जांचें की थी। इसके अलावा उनके दांएं पैर में सूजन आने की शिकायत पर उनकी डीवीटी स्क्रीनिंग भी की गई थी। उनके स्वास्थ्य के बाबत जानकारी देते हुए एम्स के जनसंपर्क अधिकारी हरीश मोहन थपलियाल ने बताया कि जांचोपरांत उनके फेफड़ों में संक्रमण पाया गया है। उनका ईको और एचआरसीटी टेस्ट भी किया गया। उन्होंने बताया कि चूंकि पिछले लम्बे समय से उनका घर में बिस्तर पर ही उपचार चल रहा था, ऐसे में उनके शरीर में बेड सोर उभर गए हैं। चिकित्सकों के अनुसार बहरहाल उन्हें एनआरबीएम मास्क द्वारा 8 लीटर ऑक्सीजन सपोर्ट पर रखा गया है और बुधवार को उनका सेचुरेशन लेवल 95 प्रतिशत पाया गया। उन्होंने बताया कि कोविड आईसीयू वार्ड में विशेषज्ञ चिकित्सकों की टीम की निगरानी में उनका आवश्यक उपचार जारी है।

स्वास्थ्य समाचारः वायरल फीवर के लक्षण समझ हल्के में न लें लोग, अधिक पढ़ें…

यदि आपको बुखार और गले में खराश की शिकायत है तो, सतर्क रहें। इस तरह के लक्षणों को वायरल फीवर समझकर इसे हल्के में लेना आपके लिए घातक हो सकता है। वजह यह है कि यह कोरोना संक्रमण के प्रमुख लक्षणों में शामिल है। ऐसे में आपको तत्काल बिना विलंब किए कोविड जांच कराने की आवश्यकता है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान एम्स ऋषिकेश ने 20 से 50 वर्ष आयुवर्ग के लोगों को खासतौर से यह सुझाव दिया है कि इन हालातों में वह ’वर्क फ्राॅम होम’ नीति को अपनाएं और सुरक्षित रहें।

कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर में कुछ लक्षण विशेषरूप से उभर कर आ रहे हैं। एम्स निदेशक प्रोफेसर रवि कांत ने बताया कि मरीज को स्वाद और गन्ध का पता नहीं चलने के अलावा बुखार, गले में खराश व दर्द होना भी कोविड के प्रमुख लक्षण हैं। उन्होंने बताया कि इस बार युवा वर्ग पर कोरोना का असर ज्यादा देखने को मिल रहा है। लिहाजा इससे बचने के लिए 20 से 50 वर्ष की उम्र के लोगों को खासतौर से सतर्क रहने की आवश्यकता है। सामुदायिक स्तर पर संक्रमण की दर कम करने के लिए जरूरी है कि लोग अपने घरों में ही रहें और बिना किसी ठोस वजह के घर से बाहर हरगिज नहीं निकलें।
एम्स निदेशक प्रो. रवि कांत ने बताया कि संक्रमण से बचाव के लिए कोविड वैक्सीन विशेष लाभकारी है। ​ऐसे में 45 वर्ष से अधिक उम्र के सभी लोग जल्द से जल्द व अनिवार्यरूप से कोविड वैक्सीन लगवाएं। उनका सुझाव है कि समय रहते वैक्सीन लग जाने से शरीर में वायरस का असर कम होगा और लोग सुरक्षित रहेंगे।

एम्स में कोविड स्क्रीनिंग ओपीडी के प्रभारी और सीएफएम विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डा. योगेश बहुरूपी का कहना है कि कोविड परीक्षण हेतु एम्स, ऋषिकेश पहुंचने वाले लोगों में बुखार और गले में खराश की शिकायत के मामले प्रमुखता से आ रहे हैं। इसके अलावा लोग यह भी शिकायत कर रहे हैं कि उन्हें स्वाद और गन्ध का पता नहीं चल रहा है। उन्होंने बताया कि मौसम बदलने के कारण कुछ लोग बुखार-खांसी को सामान्यरूप से ले रहे हैं। लेकिन कोविडकाल में ऐसा करना बिल्कुल सही नहीं है। लिहाजा ऐसे में इस तरह के मामलों को सामान्य रोग के लक्षण मानकर कोविड जांच न कराना घातक हो सकता है।
उन्होंने बताया कि इस प्रकार के कोई भी लक्षण होने पर मरीज को तत्काल कोविड जांच करानी चाहिए। उनके अनुसार अप्रैल महीने में एम्स की कोविड स्क्रीनिंग ओपीडी में 5,287 लोगों ने जांच हेतु कोविड सैंपल दिए थे। जिनमें अधिकांश लोग 20 से 50 आयुवर्ग के ही थे।

उन्होंने बताया कि कोविड के लक्षणों में इनके अलावा सांस लेने में तकलीफ, बुखार और खांसी के लक्षण वाले रोगी भी बड़ी संख्या में एम्स पहुंच रहे हैं। डा. योगेश बहुरूपी ने बताया कि 20 से 50 वर्ष की उम्र के ज्यादातर लोग नौकरी पेशा वाले हैं। जिन्हें आजीविका और रोजगार के लिए दैनिकरूप से घर से बाहर निकलना पड़ता है। उन्होंने सलाह दी है कि ऐसी स्थिति में बहुत जरूरी नहीं हो तो घर से बाहर नहीं निकला जाए।

20 से 50 आयुवर्ग के लोगों को नौकरी पेशे के लिए हररोज घर से बाहर निकलना पड़ता है। लिहाजा इस उम्र के लोगों में संक्रमण की ज्यादा शिकायत मिल रही है। इस मामले में एम्स ने सुझाव दिया है कि संक्रमण से बचाव के लिए इस उम्र के लोगों को ’वर्क फ्राॅम होम’ की नीति पर काम करने की आवश्यकता है। सीएफएम विभाग के डाॅ. योगेश बहुरूपी ने बताया कि कोरोना की दूसरी लहर का यह समय बेहद जोखिम वाला समय है। युवा वर्ग को उनकी सलाह दी कि बिना किसी ठोस वजह से घर से बाहर नहीं निकलें। जीवन को सुरक्षित रखने के लिए बहुत जरूरी है कि सब लोग घर में रहें और सुरक्षित रहें।

कोविड को देखते हुए एम्स ऋषिकेश ने आरक्षित किए 300 से अधिक बेड


कोविड-19 के तेजी से बढ़ते संक्रमण के मद्देनजर अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान ऋषिकेश ने सोमवार को ओपीडी सेवाओं को बंद करने का निर्णय लिया है। मरीजों की सुविधा के लिए संस्थान की ओर से टेलिमेडिसिन सेवाएं शुरू की गई हैं, लिहाजा अब सभी सामान्य रोगों से ग्रसित मरीज टेलिमेडिसिन ओपीडी के माध्यम से संबंधित चिकित्सकों से जरुरी परामर्श ले सकेंगे। इसके साथ ही कोविड संक्रमण से ग्रसित मरीजों के उपचार के लिए एम्स अस्पताल प्रशासन ने 300 से अधिक बेड आरक्षित किए हैं। बताया गया है कि आवश्कता पड़ने पर इनकी संख्या 500 तक की जाएगी।

कोरोना वायरस से ग्रसित मरीजों की लगातार में लगातार बढ़ोत्तरी दर्ज की जा रही है, जिसके चलते निदेशक प्रो. रवि कांत की देखरेख में एम्स अस्पताल प्रशासन ने कुछ व्यवस्थाओं में बदलाव किया है। जिनके तहत अस्पताल में जनरल ओपीडी को बंद कर, अब टेलिमेडिसिन ओपीडी के माध्यम से मरीजों को परामर्श दिया जाना शामिल है। इस बाबत एम्स के डीन हॉस्पिटल अफेयर्स प्रो. यूबी मिश्रा ने बताया कि तेजी से फैल रहे कोविड संक्रमण को देखते हुए संस्थान में जनरल ओपीडी सेवाएं स्थगित करने का निर्णय लिया गया है।
ऐसे में सामान्य रोगों से ग्रस्त सभी मरीज अब टेलिमेडिसिन ओपीडी के माध्यम से देखे जाएंगे। जबकि अस्पताल की इमरजेंसी सेवा पूर्व की भांति 24 घंटे जारी रहेगी। उन्होंने कहा कि लोगों को अनावश्यक परेशानी से बचने के लिए एम्स द्वारा संचालित की जा रही टेलिमेडिसिन ओपीडी सेवाओं का लाभ लेना चाहिए। इससे मरीजों को संबंधित बीमारी के लिए घर बैठे चिकित्सकीय परामर्श भी मिल सकेगा और वह अनावश्यकरूप से घर से बाहर निकलकर कोविड संक्रमण से भी सुरक्षित रह सकेंगे।

कोविड के तीब्र गति से बढ़ते संक्रमण के प्रति आगाह करते हुए कम्युनिटी और फेमिली मेडिसिन विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डा. योगेश बहुरूपी ने बताया कि कोविड की दूसरी लहर पहली लहर से कईगुना अधिक घातक है लिहाजा प्रत्येक व्यक्ति को इसकी गंभीरता को समझना होगा और भारत सरकार व राज्य सरकार द्वारा जारी कोविड गाइडलाइन का शब्दशरू पालन करना होगा।

इसके अलावा हम सभी को अधिकांश समय खासकर सार्वजनिक स्थानों पर हरहाल में मास्क के साथ रहने की आदत भी डालनी होगी। उनके अनुसार कोविड से बचाव का पहला उपाय मास्क का इस्तेमाल ही है। उन्होंने बताया कि आपस में दो गज की दूरी बनाए रखने और वैक्सीन लगवाने से कोविड संक्रमण को नियंत्रित किया जा सकता है। साथ ही सुझाव दिया कि शरीर में किसी भी प्रकार के असामान्य लक्षण नजर आने पर तत्काल चिकित्सक से परामर्श लें।

टेलीमेडिसिन ओपीडी में चित्र में उल्लेखित विभिन्न विभागों द्वारा सेवाएं दी जाएंगी। टेलीमेडिसिन हेल्पलाइन नंबर 1800 180 4278, 7454989545, 9621539863 जारी किए गए हैं।

सांस लेने में तकलीफ व फेफड़ों में संक्रमण की शिकायत पर एम्स भर्ती हुए बच्ची सिंह रावत

भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय राज्यमंत्री बच्ची सिंह रावत की तबियत बिगड़ने पर उन्हें उपचार हेतु एम्स ऋषिकेश में भर्ती किया गया है।

शनिवार अपराह्न में पूर्व मंत्री बच्ची सिंह रावत जी को हेली एम्बुलेंस के माध्यम से हल्द्वानी से एम्स ऋषिकेश लाया गया। उन्हें इमरजेंसी में भर्ती किया गया है जहां विशेषज्ञ चिकित्सक उनकी देखभाल कर रहे हैं। एम्स के जनसंपर्क अधिकारी हरीश मोहन थपलियाल जी ने बताया कि चिकित्सकों द्वारा की गई शुरुआती जांच में पाया गया कि पूर्व केंद्रीय राज्य मंत्री बच्ची सिंह रावत जी को सांस लेने में तकलीफ और उनके फेफड़ों में संक्रमण की शिकायत है। उन्होंने बताया कि विभिन्न परीक्षण पूर्ण होने के बाद उन्हें उचित उपचार हेतु शीघ्र ही आईपीडी में शिफ्ट कर दिया जाएगा।

एम्स ऋषिकेश में स्वच्छता जनजागरूकता पखवाड़े का हुआ समापन

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, एम्स ऋषिकेश में आयोजित स्वच्छता जनजागरुकता पखवाड़ा विधिवत संपन्न हो गया। पखवाड़े के दौरान सफाईकर्मियों को कूड़ा निस्तारण के उपाय और स्वच्छता से जनस्वास्थ्य की दृष्टि से होने वाले लाभ संबंधी विस्तृत जानकारियां दी गई। अभियान के अंतिम दिन विभिन्न विभागों के प्रतिनिधियों ने स्वच्छता जनजागरुकता कार्यक्रमों में प्रतिभाग किया।
गौरतलब है कि एम्स ऋषिकेश में निदेशक प्रो. रविकांत की देखरेख में ’स्वच्छता पखवाड़े’ की शुरुआत बीती 1 अप्रैल को की गई थी। इसके अंतर्गत दो सप्ताह तक आयोजित किए गए विभिन्न कार्यक्रमों के दौरान संस्थान के अलग अलग विभागों की टीमों द्वारा स्वच्छता संबंधी कार्यक्रमों के माध्यम से मरीजों और उनके तीमारदारों को साफ सफाई को लेकर प्रेरित किया और इससे जनस्वास्थ्य पर पड़ने वाले अच्छे प्रभावों से रूबरू कराया।
आयोजित कार्यक्रमों के तहत ओपीडी एरिया, आईपीडी एरिया, कैंटीन एरिया, वेटिंग एरिया, किचन एरिया और संस्थान के विभिन्न सार्वजनिक स्थानों पर नुक्कड़ नाटक, पोस्टर प्रदर्शनी, ट्राॅली रिले एक्टिविटी, ऑनलाइन वेबिनार, टीवी स्क्रीन पर डिस्पले प्रोग्राम आदि खासतौर से आयोजित किए गए।

आयोजित एक कार्यक्रम में संस्थान के सफाई कर्मियों को सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट का प्रशिक्षण दिया गया। साथ ही उन्हें अनुपयोगी ठोस अपशिष्ट पदाथों से होने वाले पर्यावरणीय नुकसान को लेकर आगाह किया गया। बताया गया कि अपशिष्ट कचरे का प्रबंधन से मृदा संरक्षण, जल संरक्षण और स्वच्छ पर्यावरण के लिए नितांत जरूरी है। लिहाजा अपशिष्ट कचरे का प्रबंधन व इसका समय रहते निस्तारण किया जाना आवश्यक है। उधर हाॅस्पिटल इन्फेक्शन टीम द्वारा संस्थान के नर्सिंग ऑफिसरों को हाथों को सही तरीके से धोने और स्वच्छ रखने का प्रशिक्षण दिया गया।

इस अवसर पर अपने संदेश में निदेशक प्रो. रविकांत ने कहा कि स्वच्छता ही स्वस्थ जीवन का मूल मंत्र है। लिहाजा इसे दैनिक जीवन में अपनाया जाना नितांत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि स्वच्छ समाज से ही स्वस्थ समाज की परिकल्पना संभव हो सकती है। इसके लिए आवश्यक है कि प्रत्येक व्यक्ति स्वच्छता के प्रति संकल्पित रहे और स्वच्छ भारत की परिकल्पना को साकाररूप देने में अपना योगदान सुनिश्चित करे।

डीन एकेडमिक प्रोफेसर मनोज गुप्ता ने बीमारियों के नियंत्रण में स्वच्छता के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि स्वच्छता की शुरुआत स्वयं से की जाए तो हमारे आसपास का वातावरण खुद ब खुद स्वच्छ हो जाएगा।

डीन हाॅस्पिटल अफेयर्स प्रो. यूबी मिश्रा ने कहा कि स्वच्छता एक सतत प्रक्रिया है। साफ-सफाई रखने से संक्रमण का खतरा काफी कम हो जाता है। स्वच्छता के नियमों का पालन करने से हम सभी का जीवन भी निरोगी रहता है।

आयोजन में मेडिकल सुपरिटेंडेंट प्रो. बीके बस्तिया, डा. अनुभा अग्रवाल, नर्सिंग सुपरिटेंडेंट मनीष शर्मा, डा. पूजा भदौरिया, डा. लेविन आदि मौजूद थे।

एम्स ऋषिकेशः नर्सिंग क्षेत्र के लिए प्रशिक्षण कार्यशाला का हुआ शुभारंभ


अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान ऋषिकेश में तीन दिवसीय रिसर्च मैथेडोलॉजी बायो स्टेटिसटिक्स और एविडेंस बेस्ड मेडिसिन विषय पर प्रशिक्षण कार्यशाला का आयोजन हुआ। जिसमें संस्थान के नर्सिंग ऑफिसरों, असिस्टेंड नर्सिंग सुपरिटेंडेंट व विभाग से जुड़े अन्य लोगों ने प्रतिभाग किया।

एडवासं सेंटर ऑफ कंटिन्यूअस प्रोफेशनल डेवलपमेंट सीपीडी विभाग व कॉलेज ऑफ नर्सिंग के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित कार्यशाला में एम्स निदेशक प्रो. रविकांत ने कहा कि यह प्रशिक्षण नर्सिंग के क्षेत्र में अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए बेहद जरुरी है। जिसका उद्देश्य नर्सेस को अधिक से अधिक रिसर्च के लिए प्रेरित करना है। बताया कि एम्स संस्थान द्वारा शुरू किया गया यह ट्रेनिंग प्रोग्राम नर्सिंग प्रैक्टिस, नर्सिंग एजुकेशन और नर्सिंग एडमिनिस्ट्रेशन में बहुत लाभकारी साबित होगा।

डीन एकेडमिक प्रो. मनोज गुप्ता ने कहा कि रिसर्च केवल चिकित्सकों के लिए ही नहीं बल्कि नर्सिंग ऑफिसरों के लिए भी जरुरी है। उन्होंने कहा कि नर्सेस मरीजों को अधिक समय देते हैं, ऐसे में वह ​अधिक समय तक उनके बीच काम करके पेशेंट को और बेहतर सेवाएं दे सकते हैं।
डीन रिसर्च प्रो. वर्तिका सक्सेना ने नर्सिंग ऑफिसर्स के लिए शुरू किए गए इस कोर्स को महत्वपूर्ण बताया और इस पहल के लिए आयोजकर्ता विभागों को बधाई भी दी। प्राचार्य कॉलेज ऑफ नर्सिंग डा. वसंथा कल्याणी ने कहा कि संस्थान नर्सिंग के क्षेत्र में बेहतर कार्य करने में जुटा हुआ है, जिससे मरीजों को और अच्छी नर्सिंग केयर मिल सके।

प्रशिक्षण कार्यशाला की समन्वयक रूपेंद्र देयोल ने उम्मीद जताई कि इस प्रशिक्षण कार्यशाला में शामिल होने वाले नर्सिंग ऑफसर्स जल्द ही अपना रिसर्च प्रोजेक्ट संस्थान के रिसर्च सेल में पंजीकृत कराएंगे। उन्होंने कहा कि यह अनुसंधान अनुभव तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसका उपयोग मरीजों की बेहतर सेवा के लिए भी किया जाना चाहिए।
उन्होंने बताया कि अनुसंधान को बढ़ावा देने वाले इस ट्रेनिंग प्रोग्राम के लिए अब तक एम्स संस्थान के 1000 नर्सिंग ऑफिसरों ने अपना पंजीकरण कराया है। जिन्हें प्रतिमाह 40-40 नर्सिंग ऑफिसर्स के बैच में रिसर्च ट्रेनिंग दी जाएगी। जो कि आने वाले समय में नियमिततौर पर जारी रहेगी।
कार्यशाला में प्रशिक्षक जेवियर बैल्सिआल, प्रसूना जैली, डा. राजेश कुमार, मलार कोडी, रूचिका रानी, राखी मिश्रा डा. राकेश शर्मा, कल्पना ठाकुर, नीतू कटारिया आदि ने प्रतिभागियों को प्रशिक्षण दिया। इस अवसर पर मेडिकल सुपरिटेंडेंट प्रो. बीके बस्तिया, नर्सिंग प्रभारी डा. प्रदीप अग्रवाल, नर्सिंग सुपरिटेंडेंट मनीष शर्मा समेत सभी नर्सिग फैकल्टी मौजूद थे।

एम्स निदेशक ने किया कुंभ के तहत बनाए गए सैक्टर चिकित्सालय में व्यवस्थाओं का निरीक्षण

महाकुंभ 2021 मेले में आने वाले श्रद्धालुओं को स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराने के लिए अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान ऋषिकेश की टीमें चैबीस घन्टे उपलब्ध रहेंगी। इसके अलावा मुख्य स्नान पर्वों पर किसी भी तरह की आपात स्थिति से निपटने के लिए एम्स ऋषिकेश में डिजास्टर वार्ड और आईसीयू बेड आरक्षित किए गए हैं। संस्थान द्वारा उपलब्ध कराई गई व्यवस्थाओं का एम्स निदेशक प्रो. रविकांत ने बृहस्पतिवार को हरिद्वार के सैक्टर चिकित्सालय पहुंचकर जायजा लिया और इस बाबत उन्होंने चिकित्सकों को आवश्यक दिशा-निर्देश दिए।

कुम्भ स्नान के लिए हरिद्वार आने वाले श्रद्धालुओं को एम्स ऋषिकेश द्वारा चिकित्सीय सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। इसके लिए हरिद्वार स्थित बैरागी कैम्प में बने सैक्टर चिकित्सालय में एम्स के चिकित्सकों की टीमें तैनात की गई हैं। व्यवस्थाओं को परखने और तैयारियों के मद्देनजर एम्स निदेशक प्रो. रवि कांत ने बृहस्पतिवार को बैरागी कैम्प में बने सैक्टर चिकित्सालय का निरीक्षण किया। उन्होंने अस्पताल में बनाए गए कोविड टेस्टिंग एरिया, ओपीडी, आईपीडी, रजिस्ट्रेशन काउंटर, डिस्पेंसरी, एमआई रूम आदि क्षेत्रों को सघन जायजा लिया और इस बाबत अधीनस्थों को आवश्यक दिशा-निर्देश दिए।

गौरतलब है कि कुम्भ के लिए विशेष तौर से तैयार किए गए 50 बेड वाले सैक्टर अस्पताल का संचालन एम्स ऋषिकेश द्वारा किया जा रहा है। इस बाबत जानकारी देते हुए निदेशक एम्स प्रो. रवि कांत ने बताया कि कुम्भ में किसी भी तरह की आपात स्थिति अथवा गंभीर किस्म के मरीजों के उपचार के लिए एम्स द्वारा एडवासं लाइफ सपोर्ट एएलएस और बेसिक लाइफ सपोर्ट बीएलएस सेवाएं भी उपलब्ध रहेंगी। उन्होंने बताया कि सैक्टर चिकित्सालय में एम्स द्वारा प्राथमिक चिकित्सा की सभी सुविधाएं संचालित की जा रही हैं। जरूरत पड़ने पर गंभीर किस्म के रोगियों को एम्स ऋषिकेश पहुंचाकर तत्काल इलाज शुरू किया जाएगा।

उन्होंने बताया कि यहां श्रद्धालुओं को हरसंभव स्वास्थ्य सुविधा देने के लिए 24 घन्टे चिकित्सकों की टीमें लगाई गई गई हैं। निदेशक एम्स प्रो. रवि कांत जी ने बताया कि संस्थान का उद्देश्य है कि महाकुम्भ में देश-दुनिया से आने वाले श्रद्धालुओं को मेडिकल सुविधा की कोई कमी नहीं हो।
मौके पर मौजूद एम्स के नोडल ऑफिसर सैक्टर चिकित्सालय डा. मधुर उनियाल ने बताया कि मुख्य स्नान पर्वों पर किसी भी प्रकार की आपात स्थिति से निपटने के लिए एम्स में आईसीयू बेड और ऑपरेशन थिएटर रिजर्व रखे जाएंगे। उन्होंने यह भी बताया कि एम्स में एहतियातन एक डिजास्टर वार्ड भी तैयार रखा गया है। इस अवसर पर संस्थान के डीन ऐकेडमिक प्रोफेसर मनोज गुप्ता और डीन अस्पताल प्रशासन प्रोफेसर यूबी मिश्रा भी मौजूद थे।

एम्स ऋषिकेश में हुआ बच्चे के दिल का सफल जटिल ऑपरेशन

हरिद्वार निवासी एक सात वर्षीय बच्चे की दिल की तीन जटिल बीमारियों की अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान ऋषिकेश के सीटीवीएस विभाग द्वारा सफलतापूर्वक सर्जरी को अंजाम दिया गया। चिकित्सकों के अनुसार ऐसे केस आमतौर पर दुर्लभ होते हैं। अत्यधिक जटिल ऑपरेशन को सफलता से करने पर एम्स निदेशक प्रो. रवि कांत ने कॉर्डियक सर्जन डा. अनीश गुप्ता व उनकी टीम की सराहना की व उन्हें प्रोत्साहित किया। बताया कि यह टैट्रालोजी ऑफ फैलोट, सिंगल कोरोनरी, पल्मोनरी एम्बोलिजम नामक दुर्लभ बीमारी थी,जिसमें जटिल ऑपरेशन किया गया जो कि सफल रहा।
गौरतलब है कि हरिद्वार के रुड़की लंढौंरा निवासी एक सात वर्षीय बच्चे को बचपन से ही दिल की गंभीर तकलीफ थी, जिसे पिछले कुछ वर्षों से सांस फूलनी भी शुरू हो गई थी। जिस वजह से गत वर्ष 2020 में बच्चे के परिजनों ने बच्चे का एम्स ऋषिकेश में स्वास्थ्य परीक्षण कराया।

जांच के दौरान इको व एंजियोग्राफी से पता चला कि उसके दिल में छेद है एवं उसके पल्मोनरी वाल्व में रुकावट (टैट्रालोजी ऑफ फैलो) है। साथ ही हृदय को रक्त पहुंचाने वाली सिंगल कोरोनरी आरटरी (एक ही धमनी) है, जबकि इन धमनियों की संख्या आमतौर पर दो होती है। लिहाजा सीटीवीएस विभाग के चिकित्सकों ने बच्चे की जटिल सर्जरी का परामर्श दिया। मगर बीते साल लॉकडाउन की वजह से बच्चे का ऑपरेशन टल गया।
इसी बीच बच्चे को लगातार बुखार आना शुरू हो गया था। लिहाजा उसकी दोबारा जांच कराई गई,जिसमें पता चला कि उसके फेफड़े की नलियों में पल्मोनरी इंबोलिजम (खून के थक्के) बन गए हैं। लिहाजा बच्चे को इस जानलेवा बीमारी के लिए अत्यंत जटिल ऑपरेशन की जरुरत थी। एम्स के सीटीवीएस विभाग के पीडियाट्रिक कॉर्डियक सर्जन डा. अनीश गुप्ता ने इस मेजर सर्जरी को सफलतापूर्वक बखूबी अंजाम दिया।

पीडियाट्रिक कॉर्डियक सर्जन डा. अनीश ने बच्चे के दिल के छेद को बंद कर उसके फेफड़ों से जमा खून के थक्के निकाले, साथ ही बड़ी सावधानी से उसके पल्मोनरी वाल्व को भी सुरक्षित बचा लिया। अन्यथा इस बच्चे को निकट भविष्य में इस समस्या से निजात पाने के लिए कई अन्य ऑपरेशन की आवश्यकता पड़ती। अत्यधिक जटिल सर्जरी के सफल होने के बाद बच्चा अब पूरी तरह से स्वस्थ है,जिसे एम्स अस्पताल से छुट्टी दे दी गई है।
एम्स निदेशक प्रो. रवि कांत ने बताया कि संस्थान में हृदय की जन्मजात बीमारियां जैसे एएसडी, वीएसडी, पीडीए, टीओएफ, पीएपीवीसी, सिंगल वेंट्रियल आदि का उपचार उपलब्ध कराया जा रहा है। उन्होंने बताया कि इन बीमारियों का इलाज भारत सरकार द्वारा आयुष्मान भारत योजना और राष्ट्रीय बाल सुरक्षा कार्यक्रम आरबीएसके स्कीम के अंतर्गत मुफ्त भी उपलब्ध है।

स्वच्छता के प्रति जागरूकता अभियान में मरीजों और तीमारदारों को मिली जानकारी

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान ऋषिकेश में बीती एक अप्रैल से मनाए जा रहे स्वच्छता पखवाड़े के तहत नुक्कड़ नाट्य प्रस्तुति के माध्यम से आईपीडी में भर्ती मरीजों व उनके तीमारदारों को स्वच्छता के प्रति जागरुक किया गया। बताया गया कि अपने आसपास के वातावरण को साफ-सुथरा रखकर ही हम स्वस्थ समाज की परिकल्पना को साकार कर सकते हैं।

स्वच्छता पखवाडे के तहत संस्थान में आयोजित दैनिक जन-जागरुकता कार्यक्रमों के तहत अस्पताल में भर्ती मरीजों व उनके तीमारदारों को स्वच्छता के प्रति जागरुक किया गया। एम्स निदेशक प्रो. रवि कांत की देखरेख में नर्सिंग विभाग की ओर से गायनोकोलॉजी वार्ड में भर्ती मरीजों व उनके तीमारदारों को स्वच्छता से संबंधित विभिन्न जानकारियां दी गई।
नर्सिंग विभाग की टीम ने इस दौरान ’एक कदम स्वच्छता की ओर’ विषय पर नुक्कड़ नाटक का प्रदर्शन कर मरीजों और उनके तीमारदारों को साफ-सफाई से होने वाले लाभ को लेकर जागरुक किया। बताया गया कि गंदगी से ही कई बीमारियों का जन्म होता है। लिहाजा हम अपने और अपने आस-पास के वातावरण को जितना स्वच्छ रखेंगे उतना ही हम और हमारा समाज स्वस्थ रहेगा। इस दौरान टीम ने मरीजों को यह भी समझाया कि कोविड19 से बचाव के लिए हमें बार-बार हाथ धोने और सेनिटाइजर का उपयोग करना बेहद जरूरी है। इसके साथ ही एक दूसरे से दो गज की दूरी बनाए रखने और मास्क का सही ढंग से इस्तेमाल को लेकर भी उन्हें जागरुक किया गया।

नर्सिंग स्टाफ ने नुक्कड़ नाटक द्वारा हाथों को सही ढंग से धोने की विधि भी बताई, बताया गया कि खुले मे शौच करने से बीमारियों को बढ़ावा मिलता है, इसलिए सभी लोगों को शौच के लिए अनिवार्यरूप से शौचालयों का इस्तेमाल करना चाहिए। इस दौरान टीम ने स्वास्थ्य चर्चा के माध्यम से भी रोगियों को स्वच्छता के प्रति विभिन्न लाभप्रद जानकारियां भी दीं।

कार्यक्रम में नर्सिंग सुपरिटेंडेंट मनीष शर्मा, असिस्टेंट नर्सिंग सुपरिटेंडेंट वंदना, जीनो जैकब, अज्जो उन्नीकृष्णन, प्रियंका आदि मौजूद थे।