अत्याधुनिक हीमोडायलिसिस यूनिट का केंद्रीय स्वास्थ्य राज्यमंत्री ने एम्स में किया लोकार्पण

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान ऋषिकेश में बृहस्पतिवार को केंद्रीय स्वास्थ्य राज्यमंत्री अश्विनी कुमार चैबे ने नवनिर्मित अत्याधुनिक हीमोडायलिसिस यूनिट व एडवांस यूरोलॉजी सेंटर का ​लोकार्पण किया। केंद्रीय स्वास्थ्य राज्यमंत्री ने कहा कि ऋषिकेश एम्स गंगा तट पर स्थित होने के कारण आम मरीजों के लिए पर्यावरण व स्वास्थ्य की दृष्टि से लाभदायक है व संस्थान बेहतर कार्य कर रहा है। इस दौरान उन्होंने एम्स अस्पताल प्रशासन की ओर से आयोजित स्वच्छता पखवाड़े का पौधरोपण कर ​विधिवत शुभारभ किया।
बृहस्पतिवार को एम्स ऋषिकेश पहुंचने पर केंद्रीय स्वास्थ्य राज्यमंत्री अश्विनी कुमार चैबे का निदेशक प्रोफेसर रवि कांत ने संस्थान के अधिकारियों व फैकल्टी मेंबर्स के साथ स्वागत किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि कोविड19 का खतरा अभी टला नहीं है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा कोविड महामारी से बचाव के लिए दिए गए मूलमंत्रों को दोहराया और कहा कि देश में जो कोविड महामारी की दूसरी लहर तेजी से आगे बढ़ रही है, उससे बचाव के लिए विशेष सावधानी बरतनी होगी। केंद्रीय राज्यमंत्री चैबे ने एम्स के 87 प्रतिशत हैल्थ केयर वर्करों का कोविड वैक्सीनेशन का कार्य पूर्ण होने पर प्रसन्न जताई।

केंद्रीय राज्यमंत्री अश्विनी कुमार चैबे ने यूरोलॉजी विभाग में एडवांस सेंटर व नैफ्रोलॉजी विभाग में अत्याधुनिक हीमोडायसिस कक्ष का लोकार्पण कहा कि एडवांस यूरोलॉजी सेंटर में लेटेस्ट तकनीकों की मशीनें आम मरीजों के उपचार में सुविधाजनक व लाभकारी सिद्ध होगी। जबकि हीमोडायसिस यूनिट किडनी के मरीजों के उपचार में कारगर सिद्ध होगा।

प्रो. रवि कांत ने बताया कि हीमोडायलिसिस सेंटर व एडवांस यूरोलॉजी सेंटर स्थापित होने से उत्तराखंड सहित वि​​ भिन्न प्रांतों के गरीब से गरीब व्यक्ति को भी उच्च तकनीक पर आधारित उपचार सुलभ कराया जाएगा। यूरोलॉजी विभागाध्यक्ष डा. अंकुर मित्तल ने बताया कि संस्थान में स्थापित एडवांस यूरोलॉजी सेंटर स्थापित होने से मरीजों को आधुनिक तकनीक बिना सर्जरी के पथरी के ऑपरेशन की सुविधा उपलब्ध हो सकेगी। इस केंद्र में कारपोरल शॉक वेब लीथोट्रिप्सी सुविधा भी मिल सकेगी। इस सुविधा द्वारा किडनी की अधिकतम डेढ़ सेमी आकार की पथरी को बिना ऑपरेशन के तोड़ा जा सकता है।

सेंटर में मूत्र पथ की बीमारियों की जांच के लिए यूरो डायनेमिक्स परीक्षण की सुविधा के अलावा एडवांस वीडियो और एंबुलैट्री यूरोडायमिक्स सुविधाएं भी उपलब्ध कराई गई हैं। साथ ही लैब में इमेजिंग उपकरण ट्रांसरैक्टल अल्ट्रासाउंड, मिक्यूरेटिंग सिस्टोयूरेथोग्राम मशीन तथा सीआर्म फ्लोरोस्कोपी मशीनें भी स्थापित की गई हैं।
उधर, नैफ्रोलॉजी विभाग के डा. गौरव शेखर शर्मा ने बताया कि डायलिसिस प्रक्रिया में शरीर के अंदर इकट्ठा हुए जहर को मशीन द्वारा बाहर निकाला जाता है। जरूरत के अनुसार मरीज को डायलिसिस के विभिन्न सत्रों की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। हीमोडायलिसिस प्रक्रिया का एक सत्र साधारणतरू 2-4 घंटे का होता है।

बताया कि संस्थान में यह इकाई पी.पी.पी मॉडल पर विकसित की गई है। जिसमें सभी अत्याधुनिक उपकरण लगाए गए हैं। इस इकाई के प्रारंभ होने से मरीजों को हीमोडायलिसिस प्रदान करने की क्षमता में कई गुना वृद्धि होगी। यह सुविधा 24 ’ 7 उपलब्ध रहेगी।उन्होंने बताया कि यह सुविधा आयुष्मान योजना के अंतर्गत आती है।

इस दौरान डीन एकेडमिक प्रो. मनोज गुप्ता, एमएस बीके बस्तिया, प्रो. बीना रवि, यूरोलॉजी विभाग के प्रो. एके मंडल, डा. विकास पंवार, प्रो. वर्तिका सक्सेना, प्रो. ब्रिजेंद्र सिंह, डा. बलरामजी ओमर, डा. अनुभा अग्रवाल आदि मौजूद थे।

एम्स के सीटीवीएस विभाग ने दिया सफल बीडी ग्लेन आपरेशन को अंजाम

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान एम्स ऋषिकेश के सीटीवीएस विभाग ने हाल ही में तीन बच्चों के ग्लेन ऑपरेशन को सफलतापूर्वक अंजाम देकर इन नौनिहालों के जीवन को बढ़ाया है। निदेशक प्रो. रवि कांत ने सीटीवीएस विभाग की इस उपलब्धि पर प्रसन्नता व्यक्त की, साथ ही उन्होंने जटिल शल्य चिकित्सा करने वाली टीम की सराहना की।

चिकित्सकों के अनुसार उत्तरकाशी निवासी एक डेढ़ वर्ष की बच्ची के दिल में जन्मजात छेद था, मगर उसके दिल का सीधा हिस्सा (राइट वेंट्रिकल) पूर्ण रूप से विकसित नहीं था,इसे सिंगल वेंट्रिकल कहते हैं। ऐसे में बच्चे के दिल में जन्म से बने छेद को बंद करना नामुमकिन होता है। साथ ही इससे बच्चे का शरीर कभी भी अत्यधिक नीला पड़ सकता है साथ ही उसका हार्ट फेल होने का खतरा बना रहता है। बच्ची के दिल का ऑपरेशन करने वाली टीम के प्रमुख व सीटीवीएस विभाग के पीडियाट्रिक कॉर्डियक सर्जन डा. अनीश गुप्ता ने बताया कि उन्होंने इस पेशेंट के सिर से अशुद्ध रक्त लाने वाली नस( एसवीसी) को काटकर उसके फेफड़े में सीधे जोड़ दिया, जिससे बच्ची की ऑक्सीजन की मात्रा 60 प्रतिशत से बढ़कर 90 प्रतिशत तक हो गई।

इस प्रक्रिया को पहली मर्तबा इस ऑपरेशन को करने वाले डॉक्टर ग्लेन के नाम से ग्लेन प्रोसिजर कहा जाता है। इस जटिल ऑपरेशन को अंजाम देने वाली टीम में डा. अनीश के अलावा डा. अजेय मिश्रा, पीडियाट्रिक कॉर्डियोलॉजिस्ट डा. यश श्रीवास्तव व डा. राहुल शर्मा शामिल थे। इसके अलावा चिकित्सकों की इसी टीम ने देहरादून निवासी दो-दो साल के दो अन्य बच्चों की भी बी.डी. ग्लेन ( बाई डायरेक्शनल ग्लेन) की सफलतापूर्वक सर्जरी को अंजाम दिया है। अब यह बच्चे पूरी तरह से स्वस्थ हैं। सफल शल्य चिकित्सा के बाद इन बच्चों के माता-पिता व अन्य परिजनों ने डा. अनीश व अन्य चिकित्सकों के अलावा उनकी टीम में सहयोग देने वाले नर्सिंग ऑफिसर व परफ्यूजनिस्ट का धन्यवाद ज्ञापित किया।

साथ ही इस उपलब्धि के लिए निदेशक प्रो. रवि कांत ने चिकित्सकीय टीम की प्रशंसा के साथ ही बच्चों को सुखी व दीर्घजीवन की शुभकामनाएं दी। टीम में तुहिन सुब्रा, कलई मणी, सबरीनाथन, केशव, गौरव, धर्मचंद, प्रियंका, अतुल, संजीव, अरविंद आदि शामिल थे।
क्या है सिंगल वेंट्रिकल- 1-इसमें विभिन्न प्रकार की हृदय संबंधी जन्मजात बीमारियां शामिल हैं। जिसमें हृदय अधूरा विकसित रहता है तथा दिल में छेद की वजह से ही मरीज जीवित रहता है। 2- छेद को बंद करके मरीज को पूर्णतया ठीक नहीं किया जा सकता। किंतु ऑपरेशन से उसकी दिक्कतों को कम किया जा सकता है तथा मरीज के जीवन की अवधि बढ़ाई जा सकती है। 3- इस बीमारी में मरीज का दो से तीन बार ऑपरेशन किया जाता है। जिसमें जीवन का खतरा अधिक होता है, मगर सर्जरी के सफल होने पर ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ जाती है। मरीज की सांस फूलनी कम हो जाती है और मौत का खतरा टल जाता है।
4-इस बीमारी में कई दशकों बाद हार्ट ट्रांसप्लांट भी संभव है, लिहाजा इस बीमारी से ग्रसित मरीजों को निराश होने की आवश्यकता नहीं है।
5-इस बीमारी का अन्य तरह से उपचार के लिए अनुसंधान (रिसर्च) कार्य जारी है।

शिक्षक कोविड 19 से बच्चों की सुरक्षा में निभा सकते हैं अहम भूमिका

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान ऋषिकेश की ओर से कोरोनाकाल में जनजागरुकता के उद्देश्य से निदेशक प्रो. रविकांत के निर्देशन में गठित कोविड19 कम्यूनिटी टास्क फोर्स सततरूप से कोरोना से प्रभावित एवं इसका दंश झेल चुके लोगों के लिए एक सहारा बना हुआ है। कोविड19 कम्यूनिटी टास्क फोर्स ने विभिन्न विद्यालयों का भ्रमण कर विद्यार्थियों से इस महामारी पर चर्चा की। इस दौरान बातचीत के दौरान पता चला है कि छात्र-छात्राएं अभी भी कोरोना के सदमे से उभर नहीं पाए हैं। बातचीत में यह भी सामने आया है कि इन दिनों बढ़ते हुए कोरानो के केस विद्यार्थियों के लिए चिंता का विषय बन गए हैं।

निदेशक प्रो. रवि कांत ने कहा कि इस महामारी से लड़ने के लिए कोविड 19 वैक्सीन कारगर साबित हो रही है, लिहाजा इसके संक्रमण से अब घबराने की आवश्यता नहीं है बल्कि सुरक्षा के लिहाज से सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने, मास्क पहनने व कम से कम 40 सेकंड तक साबुन से अच्छी तरह से हाथ धोने आदि से दिनचार्य को सामान्य बनाया जा सकता है। उनका मानना है कि अभी खतरा टला नहीं है, मगर ऐसी स्थिति में घबराने की बजाए सूझबूझ से काम लेने की जरुरत है।
अध्ययनों से ज्ञात हुआ है कि देश में विद्यार्थी तीन स्तर पर हैं स्कूल, कॉलेज व विश्वविद्यालय लेवल। इन तीनों ही स्तर के विद्यार्थियों पर कोविड19 की वजह से मानसिक, शारीरिक व आर्थिक स्तर पर दुष्प्रभाव पड़ा है। इसमें मानसिकरूप से प्रभावित होने वाले बच्चे चिड़चिड़ापन, डिप्रेशन आदि से ग्रसित हैं व सामाजिक दूरी बढ़ने से उन्हें अकेले रहने की आदत हो गई है,जिसका दुष्प्रभाव उनके एकेडमिक लेवल पर पड़ रहा है। साथ ही कोविड के दौर में मोबाईल के माध्यम से अधिक कार्य करने से आंखों में ज्यादा जोर पड़ना, आंखों की दूसरी तकलीफें व थकावट आदि की समस्याएं भी बढ़ृी हैं। ऐसी स्थिति में इस सबसे घबराने की बजाए सूझबूझ से काम लेने की जरुरत है। अभिभावकों से आग्रह है ​कि बच्चों को हरसमय मोबाईल नहीं दें व उन्हें खेल और अन्य रचनात्मक गतिविधियों में शामिल होने के लिए भी प्रोत्साहित करें।
इस बाबत एम्स ऋषिकेश कम्यूनिटी टास्क फोर्स के नोडल ऑफिसर डा. संतोष कुमार ने कहा कि शिक्षकों को कोविड19 के खौफ के मद्देनजर छात्र छात्राओं में हो रहे मनोविकार एवं उनमें किसी भी प्रकार के शारीरिक व मानसिक बदलाव लक्षणों को पहचानने का प्रयास करना चाहिए। यथासंभव उनके प्रति आत्मियता व सहानुभूति के साथ साथ कुशल व्यवहार रखना चाहिए।
मुहिम के दौरान विभिन्न विद्यालयों के शिक्षकों व छात्रों से बातचीत में यह तथ्य भी सामने आए हैं कि कुछ बच्चों में कोविड महामारी के बाद से कुछ लक्षण उभरकर सामने आए हैं, जिनमें डर लगना, चिड़चिड़ापन, नींद नहीं आना आदि प्रमुखरूप से शामिल हैं, उन्होंने बताया कि इस तरह के लक्षणों से घबराने की आवश्यकता नहीं है। बल्कि ऐसे समय में अभिभावकों व शिक्षकों को समानरूप से बच्चों के प्रति सद्व्यहार अपनाना चाहिए।

नींद पूरी होने पर न्यूरोलाॅजिकल बीमारियों का खतरा होने की संभावना कमः प्रो. रविकांत

नींद का हमारे शरीर के संतुलित व्यवहार और देखरेख के लिए अत्यधिक महत्व है। हालांकि यह एक रहस्य ही है कि नींद क्यों, कैसे और कहां से संचालित होती है और किस प्रकार उपरोक्त कार्य को निष्पादित करती है, मगर काफी हद तक इसमें मस्तिष्क के कुछ अहम हिस्सों जैसे हाइपोथालामस, पीनियल ग्रंथि और रेटिकूलर एक्टिवेटिंग सिस्टम और उनसे निकलने वाले न्यूरो केमिकल मैसेंजेर का जटिल सूचना तंत्र संलग्न है, लिहाजा जाहिर सी बात है कि न्यूरोलॉजिकल बीमारियों से नींद का गहरा संबंध है, जो कि दोतरफा है यानि कि एक तरफ जहां न्यूरोलॉजिकल बीमारियों में नींद प्रभावित होती है वहीं दूसरी ओर नींद की गड़बड़ी कई न्यूरोलॉजिकल बीमारियों को या तो जन्म देती है या उनकी गंभीरता को कई गुना बढ़ा देती है।
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान एम्स ऋषिकेश में निदेशक प्रो. रविकांत ने न्यूरोलॉजी विभाग एवं निद्रा रोग प्रभाग द्वारा इस दिशा में किए जा रहे कार्यों की सराहना की। उम्मीद जताई कि निद्रा रोग प्रभाग आने वाले वर्षों में उत्तराखंड एवं आसपास के राज्यों के निद्रा रोग से ग्रसित मरीजों के लिए एक वरदान साबित होगा।

आइए कुछ महत्वपूर्ण न्यूरोलॉजिकल रोगों से नींद के संबध को बिंदुवार एक-एक कर समझते हैं। एम्स ऋषिकेश के न्यूरोलॉजी विभागाध्यक्ष एवं निद्रा रोग प्रभाग के सदस्य डा. नीरज कुमार के अनुसार लगभग 50 प्रतिशत स्ट्रोक के मरीज नींद की समस्या से ग्रसित होते हैं. इतनी बड़ी संख्या क्यों? मोटापा, खून में वसा की मात्रा, निष्क्रिय दिनचर्या, धुम्रपान यह सब जिस प्रकार से धमनियों की बीमारियों को बढ़ाते हैं, वैसे ही ओब्सट्रकटिव स्लीप एपनिया की संभावना को भी बढ़ा देते हैं। करीब 20 फीसदी स्ट्रोक के मरीजों को शिकायत होती है कि उन्हें नींद का नहीं आने, नींद के जल्दी टूट जाने या दिन में भी सुस्ती आने आदि समस्याएं हैं। यानि कुल मिलाकर नींद की संपूर्ण प्रणाली का ही त्रुटिपूर्ण हो जाना। इसकी मूल वजह में स्ट्रोक के बाद होने वाले अवसाद या दवाइयों के साइड इफेक्ट हो सकते हैं। थैलामस और ब्रेन स्टेम में होने वाले स्ट्रोक भी नींद के नियंत्रण केंद्र को क्षति पहुंचाकर नींद के क्रम को बिगाड़ सकते हैं।
उन्होंने बताया कि स्ट्रोक के मरीजों में नींद की समस्या आम रहती है, मगर निदान या उपचार गिने चुने लोगों का ही हो पाता है, इसका कारण चाहे स्ट्रोक से ग्रसित मरीज के बोलने की शक्ति का कम होना हो या अपाहिज होकर बिस्तर पर पड़े रहने के चलते उनकी नींद से जुड़ी समस्या पर किसी का ध्यान नहीं जाना हो, मरीज का उपचार करने वाले चिकित्सक भी कई बार उसकी नींद से संबंधित समस्या से अन​भिज्ञ होते हैं या कभी- कभी उसे नजरअंदाज कर देते हैं, मगर ध्यान रहे कि नींद की गड़बड़ी दोबारा स्ट्रोक अटैक की आशंका को करीब 25 फीसदी तक बढ़ा देती है। विशेषज्ञ चिकित्सक डा. नीरज कुमार जी का कहना है कि मिर्गी या मूर्छा का भी नींद से सीधा- सीधा संबंध है। सुप्तावस्था में इलेक्ट्रो इनसेफलोग्राम में दौरों को दर्शाने वाले विद्युत तरंग ज्यादा दृष्टिगोचर होते हैं, करीब 50 फीसदी जेनेरलाइज्ड एपिलेप्सी के अटैक रात के समय ही ज्यादा आते हैं। इसकी वजह से भी मरीज पर्याप्त मात्रा में नींद नहीं ले पाता। किशोरावस्था से शुरू होने वाली मयोक्लोनिक एपिलेप्सी के अटैक बढ़ जाते हैं, वहीं दूसरी तरफ मिर्गी के मरीजों की नींद अक्सर प्रभावित हो जाती है, अब चाहे वह दवाइयों की वजह से हो या बीमारी से उपन्न होने वाले अवसाद, घबराहट या डर के कारण से अथवा फिर मिर्गी की बीमारी के मूल कारण इसकी प्रमुख वजह हो। कईबार तो निद्रा विकार जिनमें स्वप्न विकार भी शामिल हैं, इन विकारों व मिर्गी के दौरों से अंतर करना बहुत मुश्किल काम होता है, नतीजतन अक्सर मरीज जल्द स्वास्थ्य लाभ के लिए उपचार कराने की बजाए वर्षों तक झाड़-फूंक का सहारा लेते रहते हैं।

सर दर्द –
सर दर्द खासकर माइग्रेन का नींद से गहरा सम्बन्ध है। तेज सर दर्द के वक्त नींद नहीं आती और अक्सर नींद पूरी नहीं होने पर सर दर्द कईगुना अधिक बढ़ जाता है। कईदफा दवाइयों से भी ठीक नहीं होने वाले सर दर्द सिर्फ नींद के इलाज से ही ठीक हो जाते हैं। वैज्ञानिकों ने यह खोज निकाला है कि माइग्रेन और नींद के नियंत्रण केंद्र आसपास ही होते हैं। इस कारण से भी दोनों का परस्पर संबंध होता है। .
मल्टीपल स्क्लेरोसिस –
मल्टीप्ल स्क्लेरोसिस जैसे इम्युनिटी सिस्टम( प्रतिरक्षा तंत्र) के रोगों में रेस्टलेस लेग सिंड्रोम, सेंट्रल स्लीप एपनिया, दिनभर की थकान-सुस्ती, दिन में भी नींद की अधिकता और नींद के क्रम के टूटने जैसी बीमारियां आम हैं, कभी कभी नींद में चलने ,बोलने या चलते-चलते नींद के आगोश में चले जाना जिसे नार्कोलेपसी भी कहते हैं, इन लक्षणों से मल्टीप्ल स्क्लेरोसिस की पहचान होती है। आश्चर्यजनक बात यह है कि अबुझ पहेली से लगने वाले यह लक्षण सही समय पर इलाज लेने से पूरी तरह ठीक भी हो जाते हैं।
पार्किन्सन व डेमेंटिया – पार्किन्सन और डेमेंटिया जैसे रोग जिनमें मस्तिष्क धीरे- धीरे सूखने लगता है या समय से पहले वृद्ध होने लगता है, इनमे नींद की समस्या काफी अधिक मिलती हैं। इसका कारण कभी दवाइयों का दुष्प्रभाव होता है तो कभी अवसाद के कारण से ऐसी समस्या उत्पन्न होती है। मगर अक्सर यह बीमारियां खुद ही नींद की समस्या को साथ लाती हैं। रेस्टलेस लेग सिंड्रोम या नींद में बोलने लगना – हाथ पैर चलाना यह ऐसे लक्षण हैं जो, कई बार पार्किन्सन रोग के मुख्य लक्षण आने से वषों पहले से ही व्यक्ति में दिखने लगते हैं, ऐसे में सजग न्यूरोलॉजिस्ट इस तरह के रोगों की सटिक पहचान करके बीमारी को शुरुआती दौर में ही पहचान लेते हैं।
नसों और मांसपेशियों के मरीजों में फेफड़ों की शक्ति भी क्षीण हो जाती है। अक्सर यह मरीज नींद के दौरान जबकि श्वसन की सहायक मांसपेशियां शिथिल हो जाती है, ऐसे में वह अपने शरीर में ऑक्सीजन की सही मात्रा बनाए रखने में विफल होते हैं. कईबार इस अवस्था में मरीजों की मौत भी हो जाती है, पर अगर समय से इनकी पहचान हो जाए और सी-पैप जैसी साधारण मशीन जो कि सांस अंदर खींचने में मदद करती है, का प्रयोग किया जाए तो ऐसी अप्रिय घटनाओं को टाला जा सकता है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि नींद न सिर्फ खूबसूरत सपनों के लिए आवश्यक हैं बल्कि शरीर को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए भी उतनी ही जरुरी क्रिया है। न्यूरोलॉजिकल बीमारियों से ग्रसित लोगों के लिए तो न सिर्फ रोग की गंभीरता को रोकने के लिए बल्कि नए रोगों को उत्पन्न होने से रोकने व उनसे बचने के लिए साफ सुथरी, स्वस्थ निद्रा की और भी अधिक आवश्यक है।

एम्स में आयोजित स्त्री वरदान कार्यक्रम में पहुंची राज्यपाल, पहल की सराहना की

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के उपलक्ष्य में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान एम्स ऋषिकेश के रिकंस्ट्रक्टिव एवं कॉस्मेटिक गायनेकोलॉजी विभाग के तत्वावधान में स्त्री वरदान कार्यक्रम आयोजित हुआ। राज्यपाल बेबी रानी मौर्य ने एम्स ऋषिकेश की इस पहल की सराहना की। उन्होंने कहा कि अपने निजी स्वास्थ्य के प्रति गांव देहात की महिलाएं अभी भी जागरुक नहीं हैं। लिहाजा ऐसी महिलाओं को स्वस्थ समाज की परिकल्पना को साकार करने के लिए अपने निजी स्वास्थ्य के प्रति चुप्पी तोड़कर जागरुक होना होगा। इस दौरान एम्स ऋषिकेश की पहल पर आयोजित स्त्री वरदान चुप्पी तोड़ो, स्त्रीत्व से नाता जोड़ो अभियान में सहभागिता के लिए उपस्थित जनसमुदाय ने इस मुहिम को आगे बढ़ाने का सामुहिक संकल्प लिया।

राज्यपाल ने कहा कि महिलाओं के स्वस्थ होने से ही स्वस्थ समाज की परिकल्पना को साकार किया जा सकता है, लिहाजा अब समय आ गया है कि महिलाओं को अपने निजी स्वास्थ्य के प्रति चुप्पी तोड़ने के लिए आगे आना होगा। राज्यपाल ने एम्स की ओर से स्त्रियों के स्वास्थ्य को लेकर शुरू किए गए स्त्री वरदान चुप्पी तोड़ो स्त्रीत्व से नाता जोड़ो अभियान को राज्य व देश की महिलाओं के स्वास्थ्य की दृष्टि से नई पहल बताई और एम्स की इस पहल की सराहना की।

निदेशक प्रोफेसर रवि कांत ने बताया कि महिलाओं में होने वाली बीमारियां 15 फीसदी समस्याएं पुरुष जनित हैं। बताया कि महिलाओं की निजी स्वास्थ्य से जुड़ी बीमारियों को लेकर एम्स में रिकंस्ट्रेक्टिव एवं कॉस्मेटिक गाइनेकोलॉजी विभाग की स्थापना की गई है। जहां महिलाओं की निजी समस्याओं का विश्वस्तरीय उपचार सुलभ कराया गया है। जो कि भारत ही नहीं बल्कि विश्व में अपनी तरह का ऐसा पहला विभाग है। जूना अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरी महाराज ने देश में कुपोषण की वजह से महिलाओं के स्वास्थ्य पर चिंता जताई। ऐसी स्थिति में उन्होंने महिलाओं के स्वास्थ्य को लेकर की गई इस पहल की सराहना की और उम्मीद जताई कि एम्स ऋषिकेश की यह शुरुआत महिलाओं के लिए कल्याणकारी सिद्ध होगी।

यमकेश्वर विधायक ऋतु खंडूड़ी ने कहा कि महिलाओं को निजी समस्याओं से निजात पाने के लिए संकोच मिटाकर आगे आना होगा, तभी महिलाएं स्वस्थ रह सकती हैं। हंस फाउंडेशन की प्रमुख माता मंगला ने एम्स ऋषिकेश की इस पहल को काविलेगौर बताया, कहा कि घर की नारी के स्वस्थ रहने पर ही परिवार स्वस्थ रह सकता है। लिहाजा महिलाओं को एम्स की इस शुरुआत व शुरू की गई मुहिम से जुड़ना होगा। आई.बी.सी.सी. की प्रमुख वरिष्ठ शल्य चिकित्सक सीनियर प्रोफेसर बीना रवि ने कहा कि शिक्षित महिलाओं व युवतियों को ब्रेस्ट कैंसर तथा अन्य तरह की निजी स्वास्थ्य संबंधी बीमारियों को लेकर खुलकर चर्चा करनी चाहिए और अन्य महिलाओं को भी जागरुक करना चाहिए। उन्होंने कहा कि आम महिलाएं एम्स द्वारा शुरू किए गए इस अभियान से जुड़कर संपूर्ण समाज का भला कर सकती हैं।

संस्थान के रिकंस्ट्रेक्टिव एवं कॉस्मेटिक्स गाइनोकोलाजी विभाग के अध्यक्ष एवं स्त्री वरदान कार्यक्रम के निदेशक डा. नवनीत मग्गो ने एम्स के इस अभियान की विस्तृत जानकारी दी। डा. विनोद व डा. मानवी के संयुक्त संचालन में आयोजित कार्यक्रम को जूना अखाड़े के महासचिव स्वामी देवानंद सरस्वती महाराज, मानस कथावक्ता स्वामी विजय कौशल महाराज, दिव्य प्रेम सेवा मिशन के संस्थापक आशीष गौतम ने भी संबोधित किया। इस अवसर पर उपस्थित जनसमुदाय ने स्त्री वरदान कार्यक्रम को हर घर की महिला तक पहुंचाने का डॉक्टर नवनीत मग्गो के आवाहन में सामुहिक संकल्प लिया गया। समारोह में प्रो. रवि कांत ने महामहिम राज्यपाल बेबी रानी मौर्य सहित सभी अतिथियों को संस्थान की ओर से स्मृति चिह्न व अंगवस्त्र भेंटकर सम्मानित किया। जबकि एम्स की इस विश्वव्यापी पहल के लिए राज्यपाल बेबीरानी मौर्य व जूना अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरी महाराज की ओर से निदेशक एम्स प्रो. रवि कांत व स्त्री वरदान कार्यक्रम के संयोजक डा. नवनीत मग्गो को स्मृति चिह्न व अंगवस्त्र भेंटकर सम्मानित किया गया।

राज्यपाल ने, जूनापीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर पूज्यपाद अवधेशानंद गिरी महाराज ने, हंस फाउंडेशन की मंगला माता ने, विजय कौशल महाराज ने, स्वामी देवानंद सरस्वती महाराज ने, रितु खंडूरी और आशीष गैतम ने स्त्री वरदान कार्यक्रम के संस्थापक डॉक्टर नवनीत मग्गो की इस सोच की बहुत सराहना की।

स्वामी अवधेशानंद गिरी महाराज ने कहा कि आज वह दिन आ गया है जब डॉक्टर नवनीत मग्गो द्वारा देखा गया यह स्वप्न सच होने जा रहा है और मंच पर उपस्थित लोगो को और खचाखच भरे स्त्री वरदान कार्यकर्ताओं के विशाल जनसमुदाओ को देखकर ऐसा लगता है कि हर कोई इससे जुड़ना चाहता है।

कार्यक्रम में समाजसेवी प्रदीप मौर्य, डीन एकेडमिक प्रोफेसर मनोज गुप्ता, स्त्री रोग विभागाध्यक्ष डा. जया चतुर्वेदी, प्रो. शालिनी राव, प्रो. प्रशांत पाटिल, प्रो. वीके बस्तिया, प्रो. सत्यावती राना, डा. गौरव चिकारा, डा. पूर्वी कुलश्रेष्ठा, जनसंपर्क अधिकारी हरीश मोहन थपलियाल आदि मौजूद थे।

एम्स में स्थापित विश्व का पहला रिकंस्ट्रक्टिव एवं कॉस्मेटिक गायनेकोलॉजी विभाग चलाएगा स्त्री वरदान अभियान

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के उपलक्ष्य में एम्स ऋषिकेश के रिकंस्ट्रक्टिव एवं कॉस्मेटिक गायनेकोलॉजी विभाग की ओर से संस्थान में स्त्री वरदान अभियान के तहत कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। एम्स ऋषिकेश की पहल पर आयोजित विश्वव्यापी इस अभियान का ध्येय वाक्य है चुप्पी तोड़ो, स्त्रीत्व से नाता जोड़ो। ​

स्त्रियों की समस्याओं पर आधारित एम्स की इस पहल पर आयोजित कार्यक्रम में देश और उत्तराखंड राज्य की कई लब्ध प्रतिष्ठित हस्तियां प्रतिभाग करेंगी। एम्स निदेशक प्रोफेसर रवि कांत की देखरेख में आयोजित इस कार्यक्रम में राज्यपाल बेबी रानी मौर्य, आचार्य महामंडलेश्वर अवधेशानंद गिरी महाराज, स्वामी देवानंद सरस्वती महाराज, स्वामी विजय कौशल महाराज, हंस फाउंडेशन प्रमुख माता मंगला, राष्ट्रीय महिला आयोग, भारत सरकार की चेयरपर्सन रेखा शर्मा, यमकेश्वर क्षेत्र की विधायक ऋतु खंडूड़ी, देव संस्कृति विश्वविद्यालय के उपकुलपति डॉ. चिन्मय पांड्या, दिव्य प्रेम सेवा मिशन के संस्थापक आशीष गौतम प्रमुखरूप से शामिल होंगे।

गौरतलब है कि अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान एम्स ऋषिकेश की ओर से अपनी तरह के अनूठे स्त्री वरदान कार्यक्रम की शुरुआत गतवर्ष 31 अक्टूबर 2020 को रिकंस्ट्रक्टिव एवं कॉस्मेटिक गायनेकोलॉजी विभाग के डॉक्टर नवनीत मग्गो के मार्गदर्शन में की गई थी। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य महिलाओं की निजी समस्याओं का निवारण करना है।
ऋ​षिकेश एम्स के स्त्री वरदान कार्यक्रम के निदेशक डॉ. नवनीत मग्गो का कहना है कि यह कार्यक्रम उन अंतर्मुखी महिलाओं की आवाज बनेगा, जो अपनी निहायत निजी स्वास्थ्य समस्याओं को चुपचाप सहती रहती हैं।

एम्स में ओरिएंटेशन कार्यक्रमः हेल्थ केयर प्रोफेशनल बनने के लिए कड़ी मेहनत करें नर्सिंग छा़त्राएं

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान ऋषिकेश में बीएससी नर्सिंग छात्राओं का ओरिएंटेशन कार्यक्रम बृहस्पतिवार को शुरू हो गया। विद्यार्थियों को बेहतर हेल्थ केयर प्रोफेशनल बनने के लिए कड़ी मेहनत के लिए प्रेरित किया गया। साथ ही उन्हें मरीजों के प्रति कुशल व्यवहार अपनाने पर जोर दिया गया।
एम्स निदेशक प्रो. रविकांत ने कॉलेज ऑफ नर्सिंग में बीएससी नर्सिंग बैच-2020 के ओरिएंटेशन प्रोग्राम का विधिवत शुभारंभ किया। निदेशक एम्स ने कहा कि नर्सिंग की छात्राओं में नेतृत्व क्षमता के गुण होने चाहिए, साथ ही उनमें नर्सिंग प्रोफेशन को लेकर को जुनून होना चाहिए।

निदेशक ने बताया कि नर्सिंग विद्यार्थियों को संचार कौशल तथा ज्ञानपूर्वक होना चाहिए, ताकि वह मरीजों के साथ-साथ अपने सहकर्मियों को भी त्रुटियों से रोक सकें। डीन (एकेडमिक) प्रो. मनोज गुप्ता ने विद्याघ्र्थियों को पढाई में उत्पन्न होने वाले मानसिक तनाव को कम करने के लिए कैपस में होने वाली खेल गतिविधियों में हिस्सा लेने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने बताया कि नर्सेज मरीज के सबसे ज्यादा करीब होती हैं व उनकी देखरेख करती हैं लिहाजा उनके चेहरे पर हमेशा मुस्कुराहट होनी चाहिए, उनका रोगी के प्रति विनम्र व्यवहार होना चाहिए।

कॉलेज ऑफ नर्सिंग की प्राचार्य डा. वसंता कल्याणी ने ऋषिकेश एम्स के लिए चयनित नर्सिंग विद्यार्थियों को शुभकामनाएं दी। इस अवसर पर कॉलेज की गतिविधियों को लेकर वृत्तचित्र प्रस्तुति भी दी गई। साथ ही उन्होंने नर्सिंग विद्यार्थियों को हमेशा सीखने के लिए तत्पर रहने को कहा।

इस अवसर पर डीन एलुमिनाई प्रोफेसर बीना रवि, प्रोक्टर प्रो. बीके बस्तिया, डीन प्लानिंग प्रो.लतिका मोहन, डीन कॉरपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी (सीएसआर) प्रो.ब्रिजेंद्र सिंह, डीन स्टूडेंट्स वैलफेयर प्रो. नवनीत भट्ट, डीन एग्जामिनेशन प्रो. प्रशांत एम.पाटिल, डीन रिसर्च प्रो. वर्तिका सक्सेना, डीन हॉस्पिटल अफेयर्स प्रो. यूबी मिश्रा, विभागाध्यक्ष बायोकेमेस्ट्री डा. अनीसा आसिफ मिर्जा, रजिस्ट्रार राजीव चैधरी, नर्सिंग कॉलेज की असिस्टेंट प्रो. राखी मिश्रा, जेवियर बैल्सियाल, प्रसन्ना जैली, रूपिंदर देयोल, डा. राजेश कुमार, मलार कोडी, डा. राज राजेश्वरी, मनीष शर्मा, रुचिका रानी, डा. राकेश शर्मा, रश्मि रावत, हेमलता, लीसा, दिव्या, बेट्सी, विश्वास, सोनिया आदि मौजूद थे।

एम्स ऋषिकेश में रोगी को किया गया सीआरटी-डी मशीन का सफल प्रत्यारोपण

हार्ट फेलियर की समस्या से जूझ रहे नैनीताल निवासी एक व्यक्ति के उपचार में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान एम्स ऋषिकेश के चिकित्सकों ने मरीज को बिना बेहोश किए सफलतापूर्वक सीआरटी-डी मशीन प्रत्यारोपित की है। उत्तराखंड राज्य का यह पहला मामला है, जिसमें एम्स में हुए इलाज पर किसी गोल्डन कार्ड धारक को 6 लाख रुपए का लाभ मिला है। मरीज अब पूरी तरह से स्वस्थ है और उसे एम्स अस्पताल से छुट्टी दे दी गई है।

पुलिस लाइन, नैनीताल निवासी 62 वर्षीय मोहम्मद हासिम पिछले एक साल से हार्ट फेलियर की समस्या से ग्रसित थे। रोगी को सांस फूलने और हृदय की पम्पिंग एक समान नहीं होने से उसे अक्सर बेहोशी आने की शिकायत थी। यहां तक कि कभी-कभी उसके दिल की धड़कन भी कुछ समय के लिए रुक जाती थी।

मरीज का सफलतापूर्वक उपचार करने वाले एम्स के काॅर्डियोलाॅजी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डा. बरुण कुमार ने बताया कि रोगी का जीवन बचाने के लिए उसके शरीर में स्पेशल पेसमेकर की तरह कार्य करने वाली एक सीआरटी-डी डिवाइस लगाई जानी बेहद जरूरी थी। रोगी को लंबे समय से बार-बार सांस फूलने की तकलीफ भी थी। जांच में पाया गया कि उसका हार्ट फंक्शन सही ढंग से कार्य नहीं कर रहा है और हार्ट का साइज भी बड़ा हो चुका है। ऐसे में मरीज का जीवन बचाने के लिए सीआरटी-डी डिवाइस लगाने का निर्णय लिया गया। उन्होंने बताया कि सीआरटी-डी डिवाइस लगाने की प्रक्रिया में ढाई घंटे का समय लगा है।

डा. बरुण ने बताया कि डिवाइस लगाने की यह प्रक्रिया उच्च तकनीक के आधार पर मरीज को बिना बेहोश किए संपन्न कराई गई है। उन्होंने बताया कि पेशेंट के इलाज का खर्च गोल्डन कार्ड योजना द्वारा वहन किया गया है। उन्होंने बताया कि मरीज अब पूरी तरह से स्वस्थ है और उसे अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया गया है। सीआरटी-डी प्रत्यारोपित करने वाले चिकित्सकों की टीम में डा. बरुण के अलावा सीनियर रेजिडेंट डा. शिशिर, स्टाफ नर्सिंग ऑफिसर हंसराज, इन्दू, विपिन, हरिमोहन, अंकित आदि शामिल थे।

एम्स निदेशक प्रोफेसर रवि कांत ने मरीज को डिवाइस प्रत्यारोपण की जटिल प्रक्रिया को सकुशल अंजाम देने वाले चिकित्सकों की टीम के कार्य की सराहना की है। उन्होंने बताया कि संस्थान में मरीजों को वर्ल्ड क्लास स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान की जा रही हैं। निदेशक एम्स पद्मश्री प्रो. रवि कांत जी ने बताया कि जटिल से जटिल बीमारी के इलाज के लिए भी एम्स, ऋषिकेश में उच्च अनुभवी चिकित्सक और आधुनिक मेडिकल तकनीकें उपलब्ध कराई गई हैं। इस बाबत आयुष्मान भारत योजना के उत्तराखंड राज्य समन्वयक अतुल जोशी ने एम्स में हुए इस उपचार के बारे में बताया कि गोल्डन कार्ड धारक किसी भी व्यक्ति के उपचार में 5 लाख से अधिक धनराशि खर्च होने वाला यह राज्य में पहला मामला है।

क्या है हार्ट फेलियर
हार्ट फेलियर (दिल की विफलता) एक गंभीर बीमारी है। डा. बरुण ने बताया कि कुछ लोगों का हृदय शरीर के अन्य अंगों का सहयोग करने के लिए पर्याप्त स्तर पर पम्प नहीं करता है। ऐसे में हृदय की मांसपेशियां कठोर हो जाने के कारण हृदय से रक्त का प्रवाह कम या अवरुद्ध हो जाता है। यदि मरीज का समय पर इलाज नहीं हुआ तो उसके जीवन को क्षति पहुंच सकती है।

सीआरटी-डी
जिन लोगों को हार्ट फेलियर की समस्या होती है, उनके लिए सीआरटी-डी (कार्डियक रीसिंक्रोनाइजेशन थैरेपी डिफिब्रिलेटजिन) आधुनिक तकनीक आधारित यह विशेष पेसमेकर बहुत लाभकारी है। सीआरटी-डी एक विशेष प्रकार का पेसमेकर है, जिसे शरीर में हृदय और कंधे के मध्य भाग में प्रत्यारोपित किया जाता है। यह मशीन माचिस की डिब्बी के आकार की होती है। यह हार्ट की पम्पिंग को बढ़ाने का काम करती है।

एम्स के चिकित्सकों की टीम की सफलता, दो बच्चों की सफल सर्जरी को दिया अंजाम

अ​खिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान एम्स ऋषिकेश के कॉर्डियक थोरसिक सर्जरी विभाग ने हाल ही में दो बच्चों की जन्मजात टैट्रोलोजी ऑफ फैलोट (टीओएफ) बीमारी की सफलतापूर्वक सर्जरी को अंजाम दिया गया। बताया गया कि दोनों बच्चे तीन साल से इस बीमारी से ग्रसित थे। इस सफलता के लिए एम्स निदेशक प्रोफेसर रवि कांत ने चिकित्सकीय टीम की सराहना की है।
उन्होंने बताया कि संस्थान में पीडियाट्रिक कॉर्डियक सर्जरी प्रोग्राम सफलतापूर्वक संचालित की जा रही हैं। यह मेडिकल विभाग की सबसे जटिल ब्रांच है, जिसमें किसी भी केस को करते समय आधुनिक मशीनों के साथ साथ संपूर्ण टीम का सहयोग जरुरी होता है। इससे जुड़े ऑपरेशन काफी जटिल एवं नाजुक होते हैं तथा आपरेशन के दौरान पेशेंट की जान जाने का खतरा बना रहता है। बावजूद इसके दिल की अनेक जन्मजात बीमारियां हैं जो कि जानलेवा हैं, सर्जरी के बिना इनका इलाज असंभव होता है, मगर सर्जरी के पश्चात अच्छा जीवन संभव हो जाता है। सीटीवीएस विभाग के कॉर्डियक थोरेसिक सर्जन डा. अनीश गुप्ता के अनुसार एम्स में पिछले डेढ़ वर्ष में लगभग 100 से अधिक मरीज अपनी जन्मजात हृदय की बीमारियों से निजात पा चुके हैं,जिसमें शिशु, किशोर व युवा भी शामिल हैं। उन्होंने बताया कि टैट्रोलॉजी ऑफ फैलोट एक गंभीर बीमारी है,जिसमें धीरे धीरे हार्ट फेल हो जाता है। हाल में संस्थान में 3 साल के दो बच्चों का सफल टीओएफ रिपेयर किया गया है, जिसमें एक चकराता, देहरादून निवासी बच्ची व रुड़की हरिद्वार का एक बच्चा शामिल हैं।
डा. अनीश के मुताबिक कई बार इस ऑपरेशन में फेफड़े की नली का रास्ता खोलते वक्त पल्मोनी वाल्व काटना पड़ता है, जिससे ऑपरेशन की जटिलता बढ़ जाती है। साथ ही कुछ दशकों बाद मरीज को वाल्व बदलने की आवश्यकता प आवश्यकता पड़ती है। जटिलतम शल्य क्रिया को सफलतापूर्वक अंजाम देने पर दोनों बच्चों के परिजनों ने इसके लिए एम्स निदेशक प्रोफेसर रवि कांत का धन्यवाद ज्ञापित किया। साथ ही उन्होंने बतया कि संस्थान निदेशक प्रो. रवि कांत के सतत प्रयासों से ही उत्तराखंड में पीडियाट्रिक कॉर्डियक सर्जरी की सुविधा उपलब्ध हो पाई है, जिससे उनके बच्चों को नवजीवन मिल सका है।
क्या है टेट्रोलोजी ऑफ फैलोट (टीओएफ) 1- हृदय की जन्मजात बीमारी जिसमें दिल में छेद होने के साथ साथ फेफड़े में खून ले जाने वाला रास्ता सिकुड़ा होता है। 2-गंदा खून दिल के छेद से होते हुए साफ खून में मिल जाता है,जिससे मरीज का शरीर नीला पड़ जाता है। 3- इस जन्मजात बीमारी के कारण सांस फूलना, बलगम में खून आना, दिमाग में मवाद भरना, दौरा पड़ना, लकवा आदि भी हो सकता है।

एम्स में हैलीपैड मरीजों के लिए हो रहा मददगार साबित

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान एम्स ऋषिकेश का हैलीपैड ट्रामा एवं इमरजेंसी मरीजों की आपात चिकित्सा के के लिए वरदान साबित हो रहा है। बीते 5 महीने में एयर एम्बुलेंस के माध्यम से आपात उपचार के लिए 11 मरीजों को एम्स ऋषिकेश पहुंचाया जा चुका है। समय रहते अस्पताल पहुंचने से आपात स्थिति वाले इन मरीजों का जीवन बचाने में संस्थान द्वारा उपलब्ध कराई गई हैलीपैड की सुविधा मददगार सिद्ध हुई है।

विषम भौगोलिक परिस्थितियों वाले पहाड़ी राज्य में सबसे बड़ी समस्या आपदाओं व दुर्घटनाओं के दौरान गंभीर घायल होने वाले और अत्यधिक अस्वस्थ लोगों को समय पर अस्पताल पहुंचाने की रहती है, जिससे तत्काल चिकित्सा से उनका जीवन बचाया जा सके। ऐसे में एम्स ऋषिकेश का हैलीपैड हैली एम्बुलैंस के माध्यम से यहां पहुंचाए जाने वाले उत्तराखंड के मरीजों के लिए वरदान साबित हो रहा है।

गौरतलब है कि एम्स ऋषिकेश को एयर एम्बुलैंस की सुविधा से जोड़ने के उद्देश्य से उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने बीते वर्ष 11 अगस्त-2020 को एम्स के हैलीपैड का उद्घाटन किया था। उद्घाटन के बाद से ही पहाड़वासियों को इस सुविधा का लाभ मिलने लगा है।

इस सुविधा के शुरू होने से एयर एम्बुलैंस के माध्यम से उत्तराखंड के सुदूरवर्ती इलाकों से समय-समय पर गंभीर किस्म के मरीजों और दुर्घटनाओं में घायल होने वाले मरीजों को एम्स ऋषिकेश पहुंचाया जा रहा है।

निदेशक प्रोफेसर रविकांत ने कहा कि उत्तराखंड और देश के किसी भी कोने से एयर एम्बुलैंस द्वारा मरीज को आपात चिकित्सा के लिए एम्स ऋषिकेश लाया जा सकता है। स्वास्थ्य के क्षेत्र में चिकित्सा सुविधा की दृष्टि से उन्होंने इसे राज्य के लिए विशेष लाभकारी बताया। निदेशक प्रो. रवि कांत ने बताया कि प्रसव अवस्था, दुर्घटनाओं और आपदा के दौरान घायल लोगों के अलावा ब्रेन अटैक और कार्डियक अरेस्ट के मरीजों का जीवन बचाने के लिए यह सुविधा संजीवनी से कम लाभकारी नहीं है। उन्होंने बताया कि आपात स्थिति के दौरान एम्स ऋषिकेश के हैलीपैड में एक ही समय में 3 हैलीकाॅप्टर लैंड कर सकते हैं।

संस्थान के हैली एविएशन इंचार्ज और ट्रामा विशेषज्ञ डाॅ. मधुर उनियाल ने बताया कि एम्स में हैली एम्बुलैंस लैंडिंग की सुविधा शुरू होने से राज्य के दुर्गम क्षेत्रों से एम्स ऋषिकेश की दूरी कम हो गई है। उन्होंने बताया कि किसी भी आघात के दौरान जीवन बचाने के लिए मरीज को समय पर अस्पताल पहुंचाना बहुत जरूरी होता है। ऐसे में हवाई दूरी कम होने से अब पहाड़ के किसी भी कोने से मरीज को तत्काल एम्स लाया जा सकता है। डाॅ. उनियाल ने बताया कि नेशनल हेल्थ मिशन द्वारा भी योजना में रूचि ली जा रही है। उन्होंने उम्मीद जताई कि विषम भौगोलिक परिस्थितियों वाले इस पहाड़ी राज्य में आपदाओं के दौरान गंभीररूप से घायल होने वाले लोगों के तत्काल उपचार में इस सुविधा से विशेष लाभ होगा और अधिकाधिक लोगों का जीवन बचाया जा सकेगा।

2 अक्टूबर 2020 से 20 फरवरी 2021 तक हैली एम्बुलैंस से एम्स पहुंचे मरीज

1- 2 अक्टूबर- पौड़ी से 55 वर्षीय ब्रेन स्ट्रोक का 1 रोगी
2- 15 अक्टूबर- पौड़ी से वाया देहरादून 44 वर्षीय पेन्क्रियाज का 1 रोगी
3- 9 दिसंबर- चमोली से कोविड पाॅजिटिव 3 रोगी
4- 10 दिसंबर – कर्णप्रयाग से 1 कोविड मरीज
5- 4 जनवरी- सहस्त्रधारा, देहरादून से गले के टाॅन्सिल से ग्रसित 5 वर्षीय बालक
6- 29 जनवरी- पौड़ी से 55 वर्षीय मुहं में सूजन का रोगी
7- 19 फरवरी- टिहरी से 28 साल की 1 गर्भवती महिला
8- 20 फरवरी- देवाल चमोली से सड़क दुर्घटना के 2 घायल मरीज