कोविड-19 टीकाकरण हेतु किए जाएं पुख्ता इंतजामः मुख्यमंत्री

मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने कोविड-19 के टीकाकरण हेतु पुख्ता इंतजाम किए जाने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने कहा कि राज्य में अधिकारियों एवं स्वास्थ्य विभाग ने कोविड टीकाकरण की दृष्टि से अच्छी तैयारी की है। जो कार्य लगन, धैर्य एवं विश्वास से किया जाता है, उसमें सफलता जरूर मिलती है। मुख्यमंत्री ने कोविड-19 टीकाकरण की तैयारियों हेतु जिलाधिकारियों से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से बात की। उन्होंने कहा कि उत्तराखण्ड में जल्द टीकाकरण की शुरूआत होने की संभावना है। जिस तरह से इसके लिए स्वास्थ्य विभाग की टीम और अधिकारियों द्वारा पूर्वाभ्यास कराये गये हैं, इसके परिणाम अच्छे होंगे।

मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र ने कहा कि बेहतर तालमेल के साथ कार्य करने के अच्छे परिणाम मिलते हैं। उन्होंने कहा कि टीकाकरण के लिए किसी के मन में भ्रांतियां न रहे, इसका विशेष ध्यान रखा जाए। इसके लिए विभिन्न सामाजिक संगठनों, व्यापारी मण्डलों एवं समाज के बुद्धिजीवी वर्गों के साथ बैठकें आयोजित की जाएं। जिलों में मुख्य चिकित्साधिकारियों द्वारा कोविड टीकाकरण के बारे में जानकारी दी जाए एवं इसके लिए व्यापक स्तर पर जागरूकता अभियान चलाया जाए।

मुख्य सचिव ओमप्रकाश ने निर्देश दिए कि 12 जनवरी को प्रदेश कि सभी टीकाकरण स्थलों में ड्राई रन आयोजित किया जाएगा। उन्होंने कहा कि सभी जनपद अपने सभी सेशन साइट्स में ड्राई रन आयोजित कराए जाने हेतु सभी तैयारियां सुनिश्चित कर लें। सेशन साइट्स में ड्यूटी चार्ट्स अवश्य लगाएं जाएं, ताकि टीकाकरण अभियान में लगे सभी अधिकारियों-कर्मचारियों को अपने कार्यों और टाईमिंग की जानकारी रहे। उन्होंने कहा कि किसी भी प्रकार के रिएक्शन की स्थिति से निपटने के लिए सभी सेशन साइट्स पर ब्लॉक कंट्रोल रूम, डिस्ट्रिक्ट कंट्रोल रूम, पी.एच.सी. एवं सी.एच.सी. इंचार्ज-डॉक्टर का नाम और कॉन्टैक्ट नंबर जरूर प्रदर्शित किया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी निर्देश दिए कि वैक्सीनेसन का डाटा ऑनलाईन या ऑफलाईन उसी दिन पोर्टल पर अपलोड किया जाना सुनिश्चित किया जाए।

मुख्य सचिव ने कहा कि सेशन साइट्स में मास्क और सेनिटाइजर की व्यवस्था भी सुनिश्चित की जाए। उन्होंने कहा कि प्रदेश के लिए 140 और एम्बुलेंस की व्यवस्था कर ली गई हैं, जो शीघ्र ही जनपदों को भेजी जाएंगी। उन्होंने कहा कि सभी सेशन साइट के आसपास 108 और अन्य एम्बुलेंस की व्यवस्था रखी जानी चाहिए ताकि आवश्यकता पड़ने पर एम्बुलेंस उपलब्ध रहें। उन्होंने कहा कि ऐसे लोग, जो टीकाकरण स्थल पर अकेले नहीं आ सकते, उनके साथ आने वाले परिवार के सदस्य की उम्र 18 वर्ष से कम ना हो इसका भी ध्यान रखा जाना चाहिए। उन्होंने टीकाकरण की भ्रांतियों को दूर करने हेतु अखबार, सोशल मीडिया आदि के माध्यम से प्रचार प्रसार एवं समाज की बुद्धिजीवियों एवं गणमान्य लोगों के साथ बैठकें आयोजित करा कर इस टीकाकरण के प्रति जागरूकता फैलाए जाने पर बल दिया।

इस अवसर पर सचिव अमित नेगी, डॉ. पंकज कुमार पाण्डेय, महानिदेशक स्वास्थ्य अमिता उप्रेती आदि उपस्थित रहे।

मां आनंदमयी स्कूल में हुआ कोरोना वायरस टीकाकरण संगोष्ठी का आयोजन

एम्स ऋषिकेश की ओर से आज कोरोना वायरस टीकाकरण को लेकर जनजागरुकता के उद्देश्य से वृहद संगोष्ठी का आयोजन किया गया। बताया गया कि इसके साथ साथ संवाद का उद्देश्य कोविड एप्रोप्रियेट बिहेवियर के बाबत जानकारी देना था। मां आनंदमयी स्कूल रायवाला में आयोजित कार्यक्रम में क्षेत्र के ग्राम प्रधान व अन्य प्रतिनिधियों के साथ साथ आम नागरिकों ने एम्स संस्थान के चिकित्सकों से कोविड19 एवं कोरोना वायरस की रोकथाम को जल्द शुरू होने वाले टीकाकरण अभियान से जुड़े प्रश्नों को पूछा व उनकी शंकाओं का समाधान किया गया।
इस बाबत एम्स ऋषिकेश के द्वारा जनजागरुकता के लिए गठित कोविड-19 कम्युनिटी टास्क फोर्स के नोडल ऑफिसर डॉ. संतोष कुमार एवं उनकी टीम के सदस्यों ने संगोष्ठी में शिरकत कर रहे क्षेत्रवासियों, स्कूली बच्चों, शिक्षकों को कोविड19 वायरस के संक्रमण व इसके बचाव के जरुरी उपायों के साथ साथ कोविड19 की रोकथाम को लेकर शीघ्र शुरू होने वाले टीकाकरण अभियान की जानकारी दी। कार्यक्रम के तहत प्रश्नकाल में स्थानीय नागरिकों ने मुख्यरूप से कोरोना वायरस टीकाकरण के संबंध में सवाल पूछे। उनका प्रश्न था कि कोरोना वायरस सुरक्षा के लिए सबसे पहले स्वास्थ्य कर्मियों को टीकाकरण क्यों दिया जा रहा है, हैल्थ केयर वर्करों के साथ साथ आम जनता को भी पहले चरण में ही टीके क्यों नहीं लगाए जा रहे हैं। साथ ही नागरिकों की जिज्ञासा थी कि क्या यह टीका 18 साल से नीचे की आयुवर्ग के बच्चों व किशोरों को भी लगाया जाएगा।

संस्थान के चिकित्सकों ने उन्हें बताया कि कोविड की वैक्सीन भारत सरकार द्वारा सबसे पहले उन लोगों को दी जा रही है जो लोग कोविड-19 से सीधेतौर पर प्रभावित हो रहे हैं, जिसके तहत प्रथम चरण में हैल्थकेयर वर्करों यानि फ्रंटलाइन वर्करों को कोविड टीकाकरण के लिए चुना गया। लिहाजा कोविड टीकाकरण से कोई भी व्यक्ति आशंकित नहीं हो। उन्होंने बताया कि प्रथम चरण निपटने के बाद इसका दूसरा चरण शुरू किया जाएगा,जिसमें 50 वर्ष से ​अधिक आयुवर्ग के नागरिकों का टीकाकरण होगा।

नोडल ऑफिसर डा. संतोष ने उन्हें बताया कि मास्क का उपयोग टीके के साथ भी और टीके के बाद भी, लिहाजा कोई भी व्यक्ति मास्क को लेकर हरगिज लापरवाही नहीं बरते। इस अवसर पर स्वयंसेवी नवीन मोहन ने बताया कि एम्स ऋषिकेश द्वारा बनाए गए मास्क बैंक के तहत अब तक विभिन्न विद्यालयों, मलीन बस्तियों में छात्र-छात्राओं व आम नागरिकों को 25000 से अधिक मास्क वितरित किए जा चुके हैं साथ ही सभी स्वयंसेवक एम्स द्वारा गठित कोविड19 कम्युनिटी टास्क फोर्स का हरसंभव सहयोग कर रहे हैं। इस अवसर पर मां आनंदमयी स्कूल के निदेशक अर्पित, एम्स संस्थान डा. भीमदत्त सेमवाल, डा. नवीन, हिमांशु, पंकज आदि मौजूद थे।

एम्स ऋषिकेश की ओपीडी में कोविडकाल में पहुंचे ढाई लाख मरीज

कोविड19 के विश्वव्यापी संक्रमण के मद्देनजर गतवर्ष 2020 में लाॅकडाउन के बावजूद अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान म्स ऋषिकेश ने ढाई लाख से अधिक मरीजों को कोविड उपचार, आपात व ओपीडी सुविधाएं प्रदान की हैं। जबकि इतना ही नहीं इस दौरान 29 हजार से अधिक मरीजों को अस्पताल में भर्ती कर उनका समुचित उपचार किया गया।

वर्ष 2020 के मार्च महीने में देशभर लाॅकडाउन के बाद हर कोई कोरोना संक्रमित लोगों से दूर भाग रहा था। लोगों के जेहन में विश्वव्यापी महामारी कोविड19 के संक्रमण का खौफ इस कदर बन गया था कि राज्य के अधिकांश अस्पतालों में ओपीडी सेवाएं भी बंद कर दी गई थी। इन चुनौतियों के बावजूद एम्स ऋषिकेश ने अपनी ओपीडी और इमरजेंसी सेवाओं को मरीजों की सुविधा के लिए निर्बाधरूप से जारी रखा व आपातकाल में अपना फर्ज निभाते हुए संस्थान के चिकित्सकों व नर्सिंग व अन्य स्टाफ ने अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए मरीजों की सेवा की।

इस बाबत संस्थान के डीन हॉ​स्पिटल अफेयर्स प्रो. यूबी मिश्रा ने बताया कि कोविडकाल में उपचार की प्राथमिकता कोरोना के मरीजों के लिए निर्धारित की गई थी, साथ ही अनिवार्य और आपात स्थिति के मरीजों का इलाज भी एम्स में 24 घंटे जारी रखा गया। उन्होंने बताया कि गत वर्ष दिसंबर – 2020 तक ढाई लाख मरीज एम्स की ओपीडी में पहुंचे। इनमें से 29 हजार 299 मरीजों को अस्पताल में भर्ती कर उनका समुचित उपचार किया गया। जबकि कोरोनाकाल की इसी समयाव​धि में विभिन्न बीमारियों से ग्रसित 10 हजार मरीजों की मेजर सर्जनी भी सफलतापूर्वक की गई। 4500 मरीजों की डायलिसिस व 4000 रोगियों की कीमो थैरेपी दी गई।
गौरतलब है कि कोरोना संक्रमित मरीजों के इलाज के लिए एम्स ऋषिकेश को लेबल 3 श्रेणी में रिजर्व रखा गया था। इस श्रेणी में कोविड संक्रमित उन्हीं मरीजों का उपचार किया जाता है, जो गंभीर अवस्था के होते हैं व जिन्हें ऑक्सीजन, वेन्टिलेटर या आईसीयू में रखे जाने की जरुरत पड़ती है। डीएचए के अनुसार एम्स की लैब में अब तक 1 लाख 20 हजार कोविड सैंपलों की जांच व कोविड स्क्रीनिंग एरिया में अभी तक 46 हजार लोगों की स्क्रीनिंग की जा चुकी है। इनमें से ढाई हजार कोविड मरीजों का उपचार कर उन्हें स्वास्थ्य लाभ दिया गया। उन्होंने बताया कि वर्तमान में एम्स में कोरोना के 92 मरीजों का उपचार चल रहा है।

प्रतिवर्ष देश में बढ़ रहे स्तन कैंसर के मामले, डब्ल्यूएचओ ने भी जताई चिंता

महिलाओं की आम बीमारी में शामिल ब्रेस्ट कैंसर के मामले देश में साल दर साल बढ़ रहे हैं। जनजागरुकता की कमी से इस बीमारी की ओर शुरुआत में ध्यान नहीं देने के कारण यह गंभीर स्थिति में पहुंच जाता है। लिहाजा इस रोग के बढ़ते ग्राफ को लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी चिंता जाहिर की है। उपचार में देरी और बीमारी को छिपाने से यह बीमारी जानलेवा साबित होती है।

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, ऋषिकेश के निदेशक प्रो. रवि कांत का कहना है कि महिलाएं अक्सर इस बीमारी के प्रति जागरुक नहीं रहतीं। लिहाजा जागरुकता के अभाव के चलते प्रतिवर्ष देश में औसतन 30 में से एक महिला ब्रेस्ट कैंसर से ग्रसित हो जाती हैं। उनका कहना है कि सूचना और संचार के इस युग में महिलाओं को अपने स्वास्थ्य के प्रति सजग रहने की आवश्यकता है।
निदेशक प्रो. रवि कांत ने बताया कि एम्स ऋषिकेश में ब्रेस्ट कैंसर के इलाज की सभी विश्वस्तरीय आधुनिकतम सुविधाएं उपलब्ध हैं। संस्थान में इसके लिए विशेषतौर पर ’एकीकृत स्तन उपचार केंद्र’ की स्थापना की गई है। जिसमें महिलाओं से जुड़ी इस बीमारी से संबंधित सभी तरह के परीक्षण और उपचार अनुभवी विशेषज्ञ चिकित्सकों द्वारा एक ही स्थान पर किया जाता है।

संस्थान के इंटिग्रेडेड ब्रेस्ट कैंसर क्लिनिक ’एकीकृत स्तन उपचार केंद्र ’ की प्रमुख व वरिष्ठ शल्य चिकित्सक प्रोफेसद डाॅ. बीना रवि जी ने इस बाबत बताया कि ब्रेस्ट कैंसर की शिकायत अधिकांशतरू 40 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं में पाई जाती है। उन्होंने बताया कि 80 प्रतिशत महिलाओं में इन्वेसिव डक्टल काॅर्सिनोमा के कारण कैंसर होता है। यह कैंसर मिल्क डक्ट में विकसित होता है। शुरुआत में यदि इस पर ध्यान नहीं दिया तो धीरे-धीरे यह गंभीर स्थिति में पहुंचकर ब्रेन, लीवर और रीढ़ की हड्डी तक पहुंचकर पूरे शरीर में फैल जाता है।

आईबीसीसी प्रमुख प्रो. बीना रवि जी ने बताया कि संस्थान के ’एकीकृत स्तन उपचार केंद्र’ में इस बीमारी की सघनता से जांच कर बेहतर इलाज की सुविधा उपलब्ध है। जिसमें विस्तृत जांचों के आधार पर कैंसर के स्टेज का पता लगाया जाता है। साथ ही केंद्र में सर्जरी के माध्यम से गांठ को निकालने और रेडिएशन देने की सुविधा भी उपलब्ध है। उन्होंने बताया कि महिला का इलाज करने के दौरान ट्रिपल असिस्मेंट की विधि अपनाई जाती है। जिसमें चरणबद्ध तरीके से मेमोग्राफी, बायोस्पी और महिला की काउन्सिलिंग के 3 चरण शामिल हैं। उन्होंने कहा कि जिन महिलाओं की छाती में गांठ है अथवा उन्हें ब्रेस्ट कैंसर की शिकायत है, उन्हें इस तरह के लक्षणों को छिपाना नहीं चाहिए बल्कि समुचित उपचार के लिए तत्काल अस्पताल पहुंचकर अनुभवी चिकित्सकों से परामर्श लेना चाहिए।
ब्रेस्ट कैंसर के प्रारंभिक लक्षण- स्तन में या बांहों के नीचे गांठ का उभरना, स्तन का रंग लाल होना, स्तन से खून जैसा द्रव बहना, स्तन पर डिंपल बनना, स्तन का सिकुड़ जाना अथवा उसमें जलन पैदा होना, पीठ अथवा रीढ़ की हड्डी में दर्द की शिकायत रहना।

बचाव-
इस बीमारी के लक्षणों के प्रति जागरुक रहकर नियमिततौर पर छाती की स्वयं जांच करना जरूरी है। महिलाओं को चाहिए कि इस प्रकार के लक्षण नजर आते ही वह समय पर अपना इलाज शुरू करें, ताकि गंभीर स्थिति आने से पहले ही इस बीमारी का निदान किया जा सके।

कारण-
खराब खान-पान और अनियमित दिनचर्या, धूम्रपान और शराब के सेवन। इसके अलावा ब्रेस्ट कैंसर आनुवांशिक कारणों से भी हो सकता है।

दूध पिलाने से खतरा कम-
बच्चे को अपना स्तनपान कराने वाली महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर का खतरा कम होता है। आईबीसीसी की चेयरपर्सन प्रो. बीना रवि जी के अनुसार बच्चे को मां का दूध पिलाने से स्तन में गांठें नहीं बनती। साथ ही बच्चे को मां के दूध के माध्यम से संपूर्ण पौष्टिक तत्व भी प्राप्त हो जाते हैं। उनका सुझाव है कि सभी महिलाएं अपने बच्चे को कम से कम 2 साल की उम्र तक स्तनपान जरूर कराएं। बच्चे को अपना दूध पिलाने से महिला में एक विशिष्ट प्रकार के कैंसर की संभावना कम हो जाती है।

कोविड की स्वदेशी वैक्सीन के लिए सीएम ने किया पीएम का अभिनंदन

मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने कोविड-19 की स्वदेशी वैक्सीन के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और वैज्ञानिकों का अभिनंदन करते हुए कहा कि पीएम के मार्गदर्शन में कोरोना महामारी से लड़ने के लिए लंबे समय से कोविड-19 स्वदेशी वैक्सीन का इंतजार अब खत्म हो चुका है। कोरोना वैक्सीन विशेषज्ञ समिति की संस्तुति पर ड्रग कंट्रोलर ऑफ इंडिया ने भारत बायोटेक की ‘कोवैक्सीन’ और सीरम इंस्टीट्यूट की ’कोविशील्ड’ को आपातकालीन इस्तेमाल के लिए मंजूरी दे दी है। संपूर्ण देशवासियों के लिए गर्व की बात यह है कि ये दोनों ही वैक्सीन भारत में ही बनी हैं।

एमबीबीएस की कक्षाएं आज से एम्स ऋ़षिकेश में शुरू

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, ऋषिकेश में एक जनवरी 2021 (शुक्रवार) से एम्स ऋषिकेश व एम्स विजयपुर (जम्मू) की नए शैक्षणिक सत्र की एमबीबीएस प्रथम वर्ष की वर्चुअल क्लासेस शुरू हो गई हैं। कोविड19 के मद्देनजर शुरू की गई वर्चुअल क्लास में ऋषिकेश एम्स के 119 व एम्स जम्मू के 35 विद्यार्थियों ने प्रतिभाग किया।

एम्स निदेशक प्रो. रवि कांत ने कहा कि एम्स ऋषिकेश में शुक्रवार से एमबीबीएस प्रथम वर्ष की कक्षाएं विधिवत शुरू हो गई हैं, जिसमें संस्थान के साथ साथ जम्मू एम्स के विद्यार्थी भी शामिल होंगे। कहा कि हमारी चिकित्सा पद्धति में साइंस के साथ साथ आर्ट भी है। चिकित्सा के विद्यार्थियों को अपने चिकित्सकीय पेशे में सफलता अर्जित करने के लिए विज्ञान के साथ ही कला को भी अनिवार्यरूप से आत्मसात करना होगा, तभी वह मरीजों को बेहतर चिकित्सा सेवा दे सकते हैं।

उन्होंने बताया कि चिकित्सा प्रणाली में प्रत्येक पांच वर्ष के समयांतराल में दवा, उपचार विधि व परीक्षण के तौर तरीकों में बदलाव आ जाता है मगर इसके इस प्रणाली में अपनाई जाने वाली आर्ट में कोई बदलाव नहीं आता। लिहाजा चिकित्सक को पेशेंट के साथ कुशल व्यवहार व बेहतर संबंधों की कला में भी दक्ष होना होगा। उनका कहना है कि भारत में चिकित्सा विज्ञान में मौजूद कला के पक्ष की ओर गौर कम होने लगा है।

कहा कि चिकित्सा के विद्यार्थियों को मरीज के प्रति व्यवहारिक कुशलता के ज्ञान में दक्ष बनाने के लिए आर्ट ऑफ मेडिसिन को साफ्ट स्किल जैसे क्रिएटिव राइटिंग, संगीत, ड्रामा आदि माध्यमों को अपनाया जाएगा, जिसके लिए एम्स संस्थान में प्रोफेशनल डेवलपमेंट एंड हिमेनिटी विभाग स्थापित किया गया है। उन्होंने जोर दिया कि चिकित्सक में अपनी बात मरीज व उसके तीमारदारों तक ठीक से पहुंचाने की दक्षता का होना जरुरी है। साथ ही उसमें सामाजिक उत्तरदायित्व का बोध व अपने साथियों के साथ अच्छे व्यवहार का ज्ञान होना चाहिए।

उन्होंने बताया कि एक कुशल चिकित्सक में होलिस्टिक हैल्थ को प्राप्त करने के लिए इमोशनल, सोशल, स्प्रिच्वल, फिजिकल व मेंटल सभी प्रकार के गुणों से परिपूर्ण होना चाहिए। उन्होंने चिकित्सा विज्ञान में एविडेंस बेस्ड मेडिसिन पर जोर दिया और इसके लिए रेंडमाइज्ड कंट्रोल ट्रायल पर ध्यान देने की आवश्यकता बताई।

गौरतलब है कि एम्स विजयपुर (जम्मू) में संस्थान का निर्माण कार्य तेजी से चल रहा है। जम्मू एम्स में इस वर्ष से 50 सीटों के साथ एमबीबीएस की पढ़ाई शुरू कर दी गई है। यह छात्रों का प्रथम बैच है, चूंकि जम्मू का मेंटर इंस्टिट्यूट एम्स ऋषिकेश है, लिहाजा एम्स ऋषिकेश के छात्र छात्राओं के साथ ही एम्स जम्मू की एमबीबीएस की पढ़ाई अपने संस्थान के छात्रों के साथ शुरू की है।

इस अवसर पर संस्थान के डीन एकेडमिक प्रोफेसर मनोज गुप्ता, जम्मू एम्स के उप निदेशक कर्नल प्रभात शर्मा, फैकल्टी मेंबर्स डा. मनीषा नैथानी, डा. पूर्वी कुलश्रेष्ठा, फाउंडेशन कोर्स कमेटी की डा. गीता नेगी, डा. हरीश आदि मौजूद थे।

जरा सी लापरवाही जीवन को खतरे में डाल सकती हैं, घर से बाहर बेवजह न निकलें

इन दिनों लगातार बढ़ती सर्दी में अनावश्यकरूप से घर से बाहर निकलने से सावधान रहने की आवश्यकता है। उत्तराखंड में जिस तरह से कोरोना का ग्राफ फिर से बढ़ने लगा है, उससे जरा सी लापरवाही आपके जीवन को जोखिम में डाल सकती है। ऐसे में खासतौर से यदि आपको स्वाद और सुगंध का ठीक से पता नहीं चल पा रहा है, तो इन लक्षणों को कतई भी नजरअंदाज नहीं करें।
कोविड19 वायरस के संक्रमण के लिए शीत ऋतु का यह समय बेहद संवेदनशील है। लिहाजा ऐसे में सर्दी, जुकाम जैसी सामान्य बीमारी से ग्रसित होने वाले लोगों को इस मौसम में विशेष सावधानी बरतने की आवश्यकता है। मौसम में आ रहे बदलाव की वजह से लोगों को बुखार और खांसी की शिकायत होना सामान्य बात है। लेकिन जरूरी नहीं कि यह सामान्य वायरल ही हो। वजह, बुखार और खांसी की शिकायत कोरोना के लक्षण भी हो सकते हैं। कोरोना संक्रमण के इस दौर में इस तरह के अन्य सभी लक्षणों को छिपाने से स्वयं के साथ-साथ आपके परिवार की जान को भी खतरा हो सकता है।
एम्स निदेशक प्रो. रवि कांत ने बताया कि कोरोना से बचाव का एक ही मूल मंत्र है, सुरक्षित रहना व जरुरी सावधानियों को बरतना। उन्होंने आगाह किया कि जो लोग कोविड19 संक्रमण के इस भयावह दौर में लापरवाह होकर मास्क का उपयोग नहीं कर रहे हैं, वह अपने साथ-साथ दूसरे का जीवन भी खतरे में डाल रहे हैं। बताया कि उत्तराखंड में जिस प्रकार कोरोना संक्रमण के मामलों में फिर से इजाफा हो रहा है, इसके मद्देनजर लोगों को अब और अधिक सावधान रहने की जरुरत है।

निदेशक कहा कि बचाव ही इसका उपाय है। बुखार, खांसी व जुकाम के लक्षणों के साथ फैलने वाले इस वायरस जनित रोग से तभी बचा जा सकता है, जब हम जागरुक रहकर प्रत्येक व्यक्ति से दो गज की दूरी बनाकर रखें। इसके अलावा हमें हमेशा अनिवार्यरूप से मास्क का इस्तेमाल भी करना होगा। भीड़भाड़ वाले स्थानों पर कौन व्यक्ति पाॅजिटिव है और कौन नेगेटिव, इसका पता नहीं चल पाता है। लिहाजा बचाव के साथ सावधानी बरतना बेहद जरूरी है।

अखिल भारतीय आयुविज्ञान संस्थान एम्स ऋषिकेश की जनरल मेडिसिन विभागाध्यक्ष, एसोसिएट प्रोफेसर डाॅ. मीनाक्षी धर ने बताया कि दस्त लगना भी कोरोना का लक्षण है। कोरोना संक्रमित मरीजों में 10 प्रतिशत मरीज लूज मोशन की शिकायत के साथ एम्स की ओपीडी में आ रहे हैं। इसके अलावा बुखार, खांसी, जुकाम, सिरदर्द रहना कोविड के प्रमुख लक्षण हैं। उनका सुझाव है कि इनमें से कोई भी लक्षण नजर आने पर शीघ्र अस्पताल पहुंचकर कुशल चिकित्सक से जांच करानी चाहिए।

एम्स में कोविड मरीजों का उपचार कर रहे जनरल मेडिसिन विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डाॅ. मुकेश बैरवा जी का कहना है कि कोरोना अभी गया नहीं है। बल्कि अब यह वायरस कई अन्य लक्षणों के रूप में सामने आ रहा है। उन्होंने बताया कि बुखार, खांसी, गले में दर्द, सांस लेने में तकलीफ और हाथ-पैरों में दर्द होना इसके सामान्य लक्षण हैं। मगर जिन लोगों को स्वाद और सुगंध के बारे में पता नहीं चल पा रहा है, उन्हें भी इन लक्षणों को नजरअंदाज करने की बजाए शीघ्र अपना कोविड टेस्ट कराना चाहिए। वजह, स्वाद और सुगंध का पता नहीं चलना भी कोरोना के लक्षणों में शामिल है।
इसके अलावा जो लोग संक्रमित होने के बाद भी अपनी जांच नहीं करा रहे हैं, वह अपने साथ साथ अपने परिवार के अन्य सदस्यों के जीवन को भी खतरे में डाल रहे हैं। ऐसे में समय रहते जांच और उपचार नहीं कराने से उनके फेफड़े खराब हो सकते हैं और उनकी स्थिति गंभीर हो सकती है। उनका सुझाव है कि नए साल के जश्न में लापरवाही नहीं बरतें और अत्यधिक भीड़भाड़ वाले स्थानों पर जाने से बचें। बाहर निकलना अत्यधिक आवश्यक हो तो हमेशा मास्क पहनकर ही घर से बाहर निकलें। गर्म पानी का सेवन करने, विटामिन सी का उपयोग और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाली दवाओं के सेवन से इसमें लाभ मिलता है।

एम्स ऋषिकेश में हुई टैट्रोलॉजी ऑफ फैलो विद एबसेंट पल्मनरी वाल्व की सफल सर्जरी

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान ऋषिकश के पीडियाट्रिक कॉर्डियक सर्जरी विभाग ने एक 15 वर्षीय किशोरी की जटिल सर्जरी को सफलतापूर्वक अंजाम देकर उसे नया जीवनदान दिया है। उत्तरप्रदेश निवासी इस किशोरी को जन्म से शरीर में नीलेपन की शिकायत थी। चिकित्सकों के अनुसार इस तरह का जटिल ऑपरेशन अब तक उत्तराखंड में किसी सरकारी मेडिकल संस्थान में नहीं किया गया है।

जटिल सर्जरी को सफलतापूर्वक करने पर एम्स निदेशक प्रो. रविकांत ने संस्थान के सीटीवीएस व कॉर्डियोलॉजी विभाग की टीम की सराहना की और चिकित्सकों को प्रोत्साहित किया। निदेशक ने बताया कि संस्थान में मरीजों को वल्र्ड क्लास स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं, जिससे उत्तराखंड व समीपवर्ती अन्य राज्यों के मरीजों को किसी भी तरह के उपचार के लिए राज्य से बाहर के मेडिकल संस्थानों में नहीं जाना पड़े।

चिकित्सकों ने बताया कि घर के आसपास मुकम्मल स्वास्थ्य सेवा नहीं मिलने की वजह से किशोरी के परिजनों ने अन्यत्र उपचार कराना मुनासिव नहीं समझा। उपचार में अनावश्यक विलंब के चलते किशोरी को सांस फूलने की समस्या होने लगी थी,जिसके कारण वह अपने रोजमर्रा के कार्य करने में भी असमर्थ हो गई।

समस्या अधिक बढ़ने पर किशोरी के परिजन उसे लेकर एम्स ऋषिकेश पहुंचे, जहां कॉर्डियोलॉजी विभाग में उसकी जांच कराई गई,जिसमें पता चला कि किशोरी के दिल में जन्मजात छेद है और फेफड़े की नस सिकुड़ी हुई है। उसके दिल का एक वाल्व भी जन्म से ही अविकसित था,जिसे मेडिकल साइंस में टैट्रोलॉजी ऑफ फैलो विद एबसेंट पल्मनरी वाल्व कहते हैं। इस बीमारी में बहुत से बच्चों को पैदा होते ही सांस की धमनी में रुकावट हो जाती है। मगर संयोग से इस किशोरी को वह समस्या 15 वर्ष तक नहीं आई,मगर समय पर उपचार में विलंब होने से अब उसका दिल फेल होना शुरू हो गया था लिहाजा ऐसी स्थिति में ऑपरेशन के अलावा कोई और विकल्प नहीं बचा था।

सीटीवीएस विभाग के डा. अनीश गुप्ता के नेतृत्व में इस जटिल ऑपरेशन को सफलतापूर्वक अंजाम दिया गया, जिसमें किशोरी के दिल का छेद बंद करने के साथ ही फेफड़े का रास्ता बड़ा किया गया व पल्मोनरी वाल्व बदला गया। किशोरी को इस मेजर सर्जरी के अगले ही दिन वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया,जिसे अब अस्पताल से छुट्टी दे दी गई है। उन्होंने बताया कि किशोरी अब पूरी तरह से स्वस्थ है। जटिल ऑपरेशन को अंजाम देने वाली टीम में सीटीवीएस विभाग के डा. अनीश गुप्ता के अलावा डा. अजेय मिश्रा, डा. यश श्रीवास्तव व विभाग के अन्य सदस्य शामिल रहे।

दून अस्पताल में भर्ती हुए सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत

मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत दून मेडिकल कॉलेज चिकित्सालय में भर्ती। बीती 18 दिसंबर को सीएम की कोरोना जांच रिपोर्ट पॉजिटिव आई थी। जिसके बाद से वह होम आइसोलेशन में थे। विधानसभा के शीतकालीन सत्र में भी वह वर्चुअल शामिल हुए। इसके अलावा कई अन्य कार्यक्रमों में भी ऑनलाइन ही जुड़ रहे थे। शनिवार से उन्हें हल्का बुखार था। जिस पर रविवार को दून अस्पताल में उनकी खून की जांच व सीटी स्कैन कराया गया। सीटी स्कैन में फेफड़ों में हल्का इंफेक्शन पाया गया है। जिसके बाद उन्हें एहतियातन भर्ती कर दिया गया है। विशेषज्ञ चिकित्सकों की टीम उनके स्वास्थ्य की निगरानी कर रही है। मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. आशुतोष सयाना ने सीएम के अस्पताल में भर्ती होने की पुष्टि की।

बता दें कि सीएम के अलावा उनकी पत्नी सुनीता रावत व बेटी कृति रावत भी कोरोना पॉजिटिव पाए गए थे। सीएम के मीडिया कोऑरडिनेटर दर्शन सिंह रावत ने बताया कि उन दोनों का स्वास्थ एकदम ठीक है और वह होम आइसोलेशन में हैं। सीएम को भी एहतियातन भर्ती किया गया है।

प्रदेश के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत रविवार रात को दून मेडिकल कॉलेज चिकित्सालय में भर्ती हो गए हैं। बताया जा रहा है कि उन्हें इंफेक्शन की कुछ दिक्कत हुई है जिसके चलते वह अस्पताल में भर्ती हुए हैं। बता दें कि सीएम कुछ दिन पहले ही कोरोना संक्रमित मिले थे। उसके बाद वह होम आइसोलेशन पर रह रहे थे।

एंडोस्कोपी पर एम्स ऋषिकेश में हुई कार्यशाला आयोजित

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान ऋषिकेश के गैस्ट्रोएंट्रोलॉजी विभाग के तत्वावधान में एंडोस्कोपी पर आधारित कार्यशाला का आयोजन किया गया, जिसमें दिल्ली के सर गंगाराम हॉस्पिटल के विशेषज्ञ डा. विकास सिंघल ने एडवांस एंडोस्कोपी की तकनीक पर व्याख्यान प्रस्तुत किया। इस अवसर पर उन्होंने एडवांस एंडोस्कोपी तकनीक का लाइव डैमो भी किया। इस तकनीक की सुविधा एम्स ऋषिकेश में शुरू होने से अब मरीजों को इलाज के लिए दिल्ली, चंडीगढ़ आदि महानगरों के मेडिकल संस्थानों में नहीं जाना पड़ेगा।

गैस्ट्रोएंट्रोलाॅजी विभाग की ओर से आज एडवांस एंडोस्कोपी तकनीक आधारित डैमोस्ट्रेशन किया गया। निदेशक प्रो. रविकांत ने उत्तराखंड में पहली बार इस कार्यशाला के आयोजन पर प्रसन्नता व्यक्त की। बताया कि संस्थान में मरीजों को विश्वस्तरीय स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराई जा रही हैं।

डीन एकेडमिक प्रोफेसर मनोज गुप्ता ने बताया कि एम्स में इस तकनीक के आने से अब मरीजों को इससे संबंधित उपचार के लिए दिल्ली, चंडीगढ़ आदि महानगरों के अस्पतालों में जाने की जरुरत नहीं पड़ेगी। जिससे उन्हें समय पर उपचार मिलेगा और समय की बचत भी होगी।

संस्थान के गैस्ट्रोएंट्रोलॉजी विभागाध्यक्ष डा. रोहित गुप्ता ने बताया कि यह एडवांस तकनीक उत्तराखंड व पश्चिमी उत्तरप्रदेश के सरकारी अस्पतालों में अब तक उपलब्ध नहीं है।
उन्होंने बताया कि उत्तराखंड में एडवांस एंडोस्कोपी तकनीक का डैमोस्ट्रेशन पहली बार हुआ है। इस बीमारी जिसका नाम एकलेजिया है की स्थिति में मरीज की खाने की नली में रुकावट आ जाती है। लिहाजा इस तकनीक से बिना ऑपरेशन किए एंडोस्कोप के माध्यम से खाने की नली की उस रुकावट को दूर किया जाता है।
आयोजन सचिव डा. इतिश पटनायक ने बताया कि एम्स ऋषिकेश के गैस्ट्रोएंट्रोलॉजी विभाग में सुविधाओं के विस्तारीकरण के तहत इस प्रकार की कई अन्य नई एंडोस्कोपी तकनीकें भविष्य में आएंगी, जिससे मरीजों को उपचार में समुचित सुविधाएं मिल सकें।

इस अवसर पर संस्थान की मेडिकल सुपरिटेंडेंट प्रो. लतिका मोहन, एनाटॉमी विभागाध्यक्ष प्रो. ब्रिजेंद्र सिंह, डा. पुनीत धर, डा. अशोक, डा. आनंद आदि मौजूद थे।