एम्स ऋषिकेश ने लांच किया अपना यू-ट्यूब चैनल लॉन्च

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान एम्स ऋषिकेश में उपलब्ध होने वाली स्वास्थ्य सुविधाओं और उपचार की जानकारियां अब जनमानस को संस्थान के अपने यू ट्यूब चैनल एम्स ऋषिकेश ऑफिशियल के माध्यम से मिल सकेंगी। संस्थान ने शुक्रवार को अपना आधिकारिक यू ट्यूब चैनल लॉन्च कर दिया है, जिसमें विभिन्न उपचार व अन्य गतिविधियों की जानकारी वाले वीडियो अपलोड किए गए हैं।

आम नागरिकों को एम्स में मिलने वाली स्वास्थ्य सुविधाओं की समुचित जानकारियां उपलब्ध कराने के उद्देश्य से एम्स ऋषिकेश ने शुक्रवार को यू ट्यूब चैनल लॉन्च किया। ’एम्स ऋषिकेश ऑफिशियल’ नाम के इस चैनल का उद्घाटन करते हुए संस्थान के निदेशक प्रो. रविकांत ने कहा कि चैनल में संस्थान में संचालित स्वास्थ्य संबंधी तमाम गतिविधियों और मौजूदा सुविधाओं की जानकारी वाले वीडियो उपलब्ध रहेंगे। इस चैनल के माध्यम से देश और दुनिया के किसी भी कोने से अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, ऋषिकेश में संचालित स्वास्थ्य सुविधाओं की जानकारी प्राप्त की जा सकती है।

उन्होंने कहा कि एम्स का प्रयास है कि स्वास्थ्य सुविधाओं, मेडिकल तकनीकों, अस्पताल की व्यवस्थाओं के साथ साथ संस्थान की अन्य गतिविधियों को आम नागरिकों, मरीजों और उनके तीमारदारों तक सुलभता से पहुंचाने के लिए हर प्रकार के संचार माध्यमों का उपयोग किया जाए। जिससे खासकर गरीब व जरुरतमंद लोग इलाज से किसी भी तरह से वंचित नहीं रह सकें।

एम्स निदेशक प्रो. रवि कांत ने कहा कि वर्तमान समय में सूचनाओं और जानकारियों को हासिल करने के लिए यू ट्यूब जैसी संचार सुविधाएं एक सशक्त माध्यम हैं। एम्स में उपलब्ध स्वास्थ्य सुविधाओं की जानकारियां दूसरे लोगों तक भी पहुंचाएं जिससे जरुरतमंद लोगों को इलाज सुलभ हो सके ।
एम्स निदेशक के स्टाफ ऑफिसर डा. मधुर उनियाल के संचालन में आयोजित कार्यक्रम में संकायाध्यक्ष अकादमिक प्रोफेसर मनोज गुप्ता, डीन हाॅस्पिटल अफेयर्स प्रो. यूबी मिश्रा आदि मौजूद थे।

एम्स ऋषिकेश में डेंगू से बचाव व जागरूकता को लेकर पुस्तक हुई लोकार्पित

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान ऋषिकेश के सोशियल आउटरीच सेल की ओर से डेंगू की रोकथाम को लेकर कम्युनिटी में किए गए कार्यों पर आधारित “सेवन प्लस-आप सभी को डेंगू के बारे में जानने की जरूरत है” नामक पुस्तक का प्रकाशन किया गया है, जो कि जनभागीदारी से समुदाय से डेंगू मच्छरों की रोकथाम और उन्मूलन के लिए एक अभूतपूर्व समुदाय आधारित पहल है। बताया गया कि पुस्तक में डेंगू से मुक्ति के लिए दिए गए सुझावों से आमजन स्वास्थ्य की दृष्टि से इसका लाभ ले सकते हैं।

पुस्तक का लोकार्पण कर निदेशक और सीईओ प्रो. रविकांत ने सेवन प्लस पुस्तक के लेखक डा. संतोष कुमार के द्वारा सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यों पर तैयार किए गए उनके इस अभिनव प्रयास की सराहना की। कहा कि रोगों के फैलने व महामारी का स्वरूप धारण करने से पूर्व ही इस तरह के काम को सार्वजनिक स्वास्थ्य की चिंता करते हुए सामुदायिक स्तर पर करने का प्रयास किया जाना चाहिए।

आउटरीच सेल के नोडल ऑफिसर डॉ. संतोष कुमार ने बताया कि यह पुस्तक डेंगू के विभिन्न पहलुओं पर एक पूर्ण और व्यापक दस्तावेज है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि डेंगू और अन्य मच्छरजनित बीमारियां एक सामाजिक समस्या हैं। जिनके निवारण के लिए समुदाय और इसके लोगों को आगे आना होगा।

डेंगू बीमारी पर आधारित उक्त सेवन प्लस नाम की पुस्तक समुदाय के सदस्यों की इससे निपटने को आमजन की भूमिका व बहुतायत जनसहभागिता पर जोर देती है, जिसमें हमारे गांवों के आम नागरिकों से लेकर ग्राम प्रधान, पंचायत सदस्य, स्वयंसेवक, आध्यात्मिक व राजनीतिक क्षेत्र से जुड़े लोग, आशा कार्यकत्री, एएनएम, शिक्षण संस्थानों में कार्यरत प्राध्यापक व विद्यार्थी शामिल है।

डेंगू जैसी वेक्टर जनित बीमारी की रोकथाम के लिए स्वच्छता का वातावरण, स्वच्छता को लेकर हमारे आचार व्यवहार और दृष्टिकोण में बदलाव की आवश्यकता है। यह रोल मॉडल स्थानीय आबादी का हिस्सा है, जो कि स्वास्थ्य कर्मियों की तुलना में समुदाय पर बहुत अधिक प्रभाव डालते हैं। उन्होंने बताया कि स्थानीय स्तर पर लोगों को ऐसे रोगों से बचाव के लिए जागरुकता के साथ आगे आने के लिए प्रेरित करने और एक अभिनव सामुहिक पहल लोगों को मच्छर जनित रोगों से बचाव का मूल मंत्र है।

संकायाध्यक्ष अकादमिक प्रो. मनोज गुप्ता जी ने डेंगू के लिए इस सामुदायिक पहल की प्रशंसा की, साथ ही उन्होंने कैंसर और हृदय रोग जैसे गैर संचारी रोगों के लिए मजबूत सामुदायिक कार्यक्रमों की जरुरत पर जोर दिया।

कम्युनिटी एंड फैमिली मेडिसिन विभागाध्यक्ष प्रो. वर्तिका सक्सेना ने पुस्तक में उल्लिखित सटीक और सक्रिय टिप्पणी एवं सुझावों के साथ डेंगू के लिए आउटरीच कार्य की सराहना की। उन्होंने कहा कि पुस्तक के तौर पर आमजन के लिए यह एक आसान पठन सामग्री है और यह उन सभी के लिए अनुकूल है जो डेंगू के बारे में अधिक जिज्ञासा रखते हैं व इस जानलेवा बीमारी के विषय में जागरुकता बढ़ाना चाहते हैं।

पुस्तक को तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले संस्थान के सीनियर लाइब्रेरियन संदीप कुमार सिंह ने कहा कि यह निस्संदेह एक महत्वपूर्ण पुस्तक है, जो कि सामाजिक निहितार्थ के साथ मच्छरों के जन्म के खतरे के बारे में समग्र जानकारी प्रदान करती है। बताया गया है कि यह पुस्तक ऑनलाइन स्रोतों में उपलब्ध है। यह पहल उन कई प्रयासों के लिए एक आशाजनक उपक्रम है जिन्हें भारत के युवा प्राप्त करने का प्रयास कर सकते हैं।

एड्स के मरीजों के लिए एम्स में एआरटी सेंटर हुआ शुरू


अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान ऋषिकेश में विश्व एड्स दिवस पर एचआईवी वायरस से ग्रसित मरीजों की समग्र जांच एवं उपचार के लिए एंटी रिट्रोवायरल थैरेपी सेंटर (एआरटी सेंटर) का विधिवत शुरू हो गया। एम्स में खुले सेंटर में गढ़वाल मंडल के विभिन्न जिलों के पंजीकृत एड्स मरीजों को सरकार द्वारा प्रदत्त निशुल्क उपचार मिल सकेगा।

निदेशक प्रो. रविकांत ने संस्थान में एंटी रिट्रोवायरल थैरेपी एआरटी सेंटर का विधिवत शुभारंभ कर बताया कि 2019 में विश्वभर में लगभग 6 लाख 90 हजार लोगों की मौत हुई है। इस बीमारी का कोई शर्तिया इलाज नहीं है लिहाजा इसे सिर्फ जनजागरूकता से ही रोका जा सकता है।

बताया कि संस्थान में एमबीबीएस, टेक्निशियन व नर्सिंग के पाठ्यक्रम में इस बीमारी को आवश्यक सुधार के साथ सम्मिलित किया जाएगा तथा समय- समय पर एम्स की सोशियल आउटरीच सेल के द्वारा विभिन्न हाईरिस्क ग्रुप्स को इस बीमारी के बारे में जागरूक किया जाएगा।

जनरल मेडिसिन विभागाध्यक्ष डा. मीनाक्षी धर, एआरटी सेंटर प्रभारी डा. मीनाक्षी खापरे व फैकल्टी इंचार्ज डा.मुकेश बैरवा ने बताया कि हर साल 1 दिसंबर को विश्व एड्स दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दिवस पर जनसामान्य को एचआईवी संक्रमण से बचाव व जरुरी एहतियात के बारे में जागरुक किया जाता है। साथ ही उन्हें स्वयं व दूसरों को इस लाइलाज बीमारी से बचाव के बारे में आवश्यक जानकारियां उपलब्ध कराई जाती हैं।
उन्होंने बताया कि एम्स में स्थापित एआरटी सेंटर के अंतर्गत रजिस्टर्ड एचआईवी पेशेंट का ट्रीटमेंट निशुल्क किया जाएगा। जिसमें मरीजों को लैब इन्वेस्टीगेशन व दवाएं उपलब्ध कराई जाती हैं साथ ही उपचार के दौरान उनमें उत्पन्न होने वाली दूसरी बीमारियों का परीक्षण व दवा भी इसमें शामिल होती हैं। बताया गया कि एम्स ऋषिकेश में उत्तराखंड राज्य का चैथा एआरटी सेंटर स्थापित किया गया है। इस सेंटर में गढ़वाल मंडल के पौड़ी, टिहरी, रुद्रप्रयाग, हरिद्वार आदि जिलों के पंजीकृत एचआईवी ग्रसित मरीजों का परीक्षण एवं उपचार करा सकते हैं। एम्स में एआरटी सेंटर स्थापित होने से पर्वतीय जिलों के मरीजों को उपचार के लिए अब देहरादून नहीं जाना पड़ेगा। साथ ही एंटी रिट्रोवायल थैरपी सेंटर न सिर्फ मरीजों को मेडिसिन एवं परीक्षण सेवा देता है

इसके अलावा उन्हें केयर में सहयोग भी करता है और विभिन्न स्वयंसेवी संगठनों के माध्यम से मरीज व उनके परिवार को आर्थिक व अन्य तरह का सहयोग भी उपलब्ध कराया जाता है।

एम्स के जनरल मेडिसिन विभाग में स्थापित एआरटी सेंटर में मरीज सप्ताह में दो दिन (सोमवार व बुधवार को) निशुल्क परामर्श व उपचार प्राप्त कर सकते हैं।
इस दौरान डीन एकेडमिक प्रोफेसर मनोज गुप्ता, डीएचए प्रो.यूबी मिश्रा, प्रो. लतिका मोहन, प्रो. वर्तिका सक्सेना, डा. नैरिता हजारिका आदि मौजूद थे।

एम्स में भर्ती उत्तराखंड राज्यपाल के सभी परीक्षण सामान्य

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान ऋषिकेश में भर्ती उत्तराखंड की राज्यपाल बेबीरानी मौर्य का स्वास्थ्य स्थिर है। उनके सभी परीक्षण सामान्य पाए गए हैं।

कोविड पॉजिटिव पाए जाने के बाद उत्तराखंड की राज्यपाल को बीते सोमवार को एम्स ऋषिकेश में भर्ती किया गया था। भर्ती होने के बाद उनका सीटी स्केन, ब्लड और अन्य सभी आवश्यक परीक्षण किए गए। उनके स्वास्थ्य के संबंध में जानकारी देते हुए संस्थान के डीन हॉस्पिटल अफेयर्स प्रो. यू.बी. मिश्रा ने बताया कि राज्यपाल का स्वास्थ्य स्थिर है और वह रूम एयर पर सामान्य स्थिति में हैं। उनकी ब्लड और सीटी स्केन की रिपोर्ट भी सामान्य है। उन्होंने बताया कि एम्स के पांच विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम उनके स्वास्थ्य की नियमिततौर से मॉनिटरिंग कर रही है। इस टीम में कार्डियोलॉजी, पल्मोनरी, जनरल मेडिसिन सहित अन्य विभागों के चिकित्सक शामिल हैं।

बहुत जल्द ही हमारे विशेषज्ञ वैक्सीन बनाने में सफल होंगेः त्रिवेंद्र सिंह रावत

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वीडियो कांफ्रेंस के माध्यम से सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों से कोविड के प्रभावी नियंत्रण के संबंध में बैठक की। इस अवसर पर आठ राज्यों में जहां कोविड के मामले तेजी से बढ़े हैं। उन राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने इसको नियंत्रित करने के लिए किये जा रहे प्रयासों के बारे में जानकारी दी।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि केन्द्र सरकार एवं राज्य सरकारों के संगठित प्रयासों से देश में कोरोना काफी हद तक नियंत्रण में है। कोरोना से लड़ने के लिए समय-समय पर अगल-अलग चुनौतियों का सामना करना पड़ा। आज रिकवरी रेट एवं फर्टिलिटी रेट दोनों में भारत अधिकतर देशों से बहुत संभली हुई स्थिति में है। सभी के अथक प्रयासों से देश में टेस्टिंग से लेकर ट्रीटमेंट तक का एक बहुत बड़ा नेटवर्क आज कार्य कर रहा है। इसका लगातार विस्तार भी किया जा रहा है। कोरोना के मैनेजमेंट को लेकर सबके पास एक व्यापक अनुभव है। सभी मुख्यमंत्री अपने अनुभवों को जरूर साझा करें, ताकि कोरोना पर पूर्ण नियंत्रण के लिए ठोस रणनीति बन सके।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि भारत में कोरोना पर नियंत्रण हुआ है, लेकिन अभी भी पूरी सतर्कता बरतने की जरूरत है। हम आपदा के संमंदर से किनारे तक आ गये हैं, यह ध्यान रहे कि अब कोई भी लापरवाही न रहे। कोरोना से बचाव के लिए जागरूकता अभियान लगातार चलाये जाय। हमें पॉजिटिविटी रेट को 05 प्रतिशत से कम रखना होगा और आरटीपीसीआर टेस्ट पर विशेष ध्यान देना होगा। कोविड वैक्सीन की दिशा में विशेषज्ञों द्वारा लगातार प्रयास किये जा रहे हैं। वैक्सीन कब तक उपलब्ध होती है, और शुरूआती चरण में कितनी उपलब्ध होती है। इसके लिए लगातार प्रयास जारी है। वैक्सीन सभी को लगवाई जायेगी, लेकिन इसके लिए शुरूआती चरण में प्राथमिकताएं क्या होंगी। राज्य सरकारें भी इस पर अपना सुझाव जरूर दें। वैक्सिनेसन के लिए राज्यों द्वारा कोल्ड चेन स्टोरेज और विभिन्न मापदण्डों के आधार पर व्यवस्थाएं कर ली जाय। इसके लिए राज्य सरकारों द्वारा स्टेट लेबल पर एक स्टियरिंग कमेटी और स्टेट, डिस्ट्रिक व ब्लॉक लेबल पर टास्क फोर्स के गठन किया जाय। इन कमेटियों की रेगुलर बैठक व ट्रेनिंग मॉनिटरिंग हो।

मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने कहा कि हमें पूरी आशा और विश्वास है कि बहुत जल्द ही हमारे विशेषज्ञ वैक्सीन बनाने में सफल होंगे। राज्य सरकार के स्तर पर इसके लिए जो प्राथमिकताएं तय करनी है, उसके लिए सुनियोजित तरीके से रणनीति बनाई जा रही है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से अनुरोध किया कि जनवरी से अप्रैल 2021 तक हरिद्वार में कुम्भ का आयोजन होना है। जिसमें भारी संख्या में अधिकारी, कर्मचारी, पुलिस बल एवं हेल्थ वर्कर काम करेंगे। राज्य को वैक्सीन की उपलब्धता के लिए हरिद्वार कुंभ को भी ध्यान में रखना जरूरी है। मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र ने कहा कि वैक्सिनेसन के लिए राज्य स्तर पर स्टेयरिंग कमेटी बनाई गई है। जिला स्तर पर टास्क फोर्स का गठन किया गया है और इसकी लगातार बैठकें भी हो रही हैं।

इस अवसर पर वीडियो कांफ्रेंस के माध्यम से गृह मंत्री अमित शाह, स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण, सभी राज्यों के मुख्यमंत्री, उत्तराखण्ड से मुख्य सचिव ओम प्रकाश, डीजीपी लॉ एण्ड ऑर्डर अशोक कुमार, सचिव स्वास्थ्य अमित नेगी आदि उपस्थित थे।

सही एंटीबायोटिक नहीं ले पाने की स्थिति में प्रतिरोधन क्षमता हो सकती है कम

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान ऋषिकेश में वल्र्ड एंटीमाइक्रोबेल एवरनैस वीक के अंतर्गत आयोजित कार्यक्रम में विभिन्न विभागों के विशेषज्ञों ने व्याख्यानमाला प्रस्तुत किए।

निदेशक प्रो. रविकांत की देखरेख में आयोजित कार्यक्रम के तहत आज संस्थान के स्वांस रोग विभागाध्यक्ष प्रो. गिरीश सिंधवानी ने बताया कि आम जुकाम की स्थिति में 20 से 25 प्रतिशत तक वायरल होता है, मगर देखा गया है कि सामान्य वायरल की स्थिति में भी एंटीबायोटिक का प्रयोग किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि हमारे विभाग में भी एंटीबायोटिक का उपयोग होना स्वाभाविक है मगर उसे सही समय व सही मानक में देना जरुरी है।

ईएनटी विभाग के एडिशनल प्रोफेसर डा. मनु मल्होत्रा ने बताया कि आंख, नाक, गला विभाग में एंटीबायोटिक का सबसे अधिक इस्तेमाल होता है। बताया कि अस्पताल में खांसी, जुकाम, गले में दर्द की शिकायत वाले मरीज अपने मर्जी से ही एंटीबायोटिक का उपयोग कर लेते हैं, लिहाजा प्रतिरोधक स्थिति में उन्हें एंटीबायोटिक दवा का असर कम होने लगता है।
प्रिोफेसर श्रीपर्णा बासु ने नवजात शिशुओं की बढ़ती मृत्युदर के बाबत जानकारी दी। उन्होंने इसकी मुख्य वजह संक्रमण को बताया। साथ ही जनरल पब्लिक को संदेश दिया कि मां को अपने नवजात शिशुओं को अपना ही दूध देना चाहिए और अन्य तरह के किसी भी तरीके का उपयोग नहीं करें। उन्होंने बताया कि इन्फेक्शन के बाद बच्चों को कई तरह के एंटीबायोटिक देने पड़ते हैं जिसका उनके स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव पड़ता है लिहाजा कोशिश की जानी चाहिए कि संक्रमण को पैदा ही नहीं होने दिया जाए।

न्यूरोलॉजी विभागाध्यक्ष डा. नीरज कुमार ने बताया कि हमारे विभाग में प्राइमरी व सेकेंड्री संक्रमण के पेशेंट आते हैं। लिहाजा हमें प्राइमरी संक्रमण के समय में एंटीबायोटिक का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। उन्होंने स्ट्रोक के पेशेंट व कुछ अन्य सेकेंड्री इन्फेक्शन के बारे में विस्तृत जानकारी दी।
कॉर्डियो थोरसिक वस्कुलर सर्जरी विभाग (सीटीवीएस) के डा. अंशुमन दरबारी ने कहा कि हम एंटीबायोटिक के कम उपयोग पर अधिक ध्यान देते हैं, क्योंकि हम ऑपरेशन के दौरान इस्टीराइल वातावरण का ध्यान रखते हैं, लिहाजा इन्फेक्शन की चांस कम रहते हैं, लिहाजा एंटीबायोटिक के इस्तेमाल की जरुरत ही नहीं पड़ती है। उन्होंने कहा कि एंटीबायोटिक का इस्तेमाल ठीक तरह से नहीं होगा तो यह दवाइयां बेकार हो जाएंगी।

खांसी, जुकाम होने पर एंटीबायोटिक लेना गलत, इससे बाॅडी में पैदा हो सकते हैं रजिस्टेंस

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान ऋषिकेश में वल्र्ड एंटीमाइक्रोबेल एवरनैस वीक के अंतर्गत आयोजित कार्यक्रम में विभिन्न विभागों के विशेषज्ञ चिकित्सकों ने व्याख्यान प्रस्तुत किए। वक्ताओं ने बिना विशेषज्ञ चिकित्सकों के परामर्श के एंटीबायोटिक दवाओं के उपयोग से होने वाले नुकसान को लेकर लोगों को जागरुक किया।

निदेशक एम्स प्रो. रविकांत की देखरेख में आयोजित कार्यक्रम में बाल चिकित्सा सर्जरी विभाग की प्रमुख प्रो. बी. सत्याश्री ने बताया कि बच्चों में किसी भी दवाई या एंटीबायोटिक को देने में सतर्कता बरतना कितना जरूरी है। उनका कहना है कि वह अपने विभाग में हर वह कोशिश करती हैं जिससे बच्चों की देखभाल में कोई कमी नहीं रहे और कोई भी दवाई या एंटीबायोटिक देने से पहले कल्चर या सेंसटिविटी टेस्ट कराते हैं
उन्होंने बताया कि आजकल यह भी देखा जा रहा है कि घर पर यदि कोई बच्चा बीमार हो जाता है, तो उसके परिवार वाले बाहर से ही किसी केमिस्ट से उसे दवाई दे देते हैं या एंटीबायोटिक के इंजेक्शन भी लेते हैं, जो कि बहुत गलत है।

प्रसूति एवं स्त्री रोग विभागाध्यक्ष प्रोफेसर जया चतुर्वेदी ने मल्टीड्रग प्रतिरोधी बैक्टीरिया के विषय में जानकारी दी, उन्होंने कहा कि अगर हम हर छोटी बीमारी जुकाम, खांसी होने पर भी एंटीबायोटिक लेंगे, तो यह हमारे शरीर में रजिस्टेंस पैदा कर सकते हैं और यह बैक्टीरिया आगे चलकर बीमारी फैलाने का कारण बन सकता है, लिहाजा इसके लिए यह जानना बहुत जरूरी है कि हम दवाई का सही समय, सही अवधि तक उसका इस्तेमाल करें।

सर्जरी विभागाध्यक्ष प्रो. डा. सोम प्रकाश बासु ने बताया कि ऑपरेशन के बाद मरीज के लिए एंटीबायोटिक का इस्तेमाल कितना जरूरी है, उनका कहना है कि जरूरत से ज्यादा और आवश्यकता से कम एंटीबायोटिक दवाओं का इस्तेमाल मरीज के लिए कितना हानिकारक हो सकता है, जिसे समय पर समझना बहुत जरूरी है। डा. बासु के अनुसार बिना चिकित्सक की सलाह के इन एंटीबायोटिक्स का इस्तेमाल किया जाना बंद होना चाहिए और इसके लिए कड़ी नीतियों का बनना उतना ही आवश्यक है।

नेत्र विभागाध्यक्ष प्रो. संजीव कुमार मित्तल ने बताया कि अमूमन देखा गया है कि आंखों के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले एंटीबायोटिक का उपयोग सही तरीके से नहीं किया जाता है और लोग स्वयं ही केमिस्ट के पास जाकर कोई भी एंटीबायोटिक आंखों के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि कुछ एंटीबायोटिक जो आंखों के ऑपरेशन के बाद इस्तेमाल किए जाते हैं, उनमें कुछ मात्रा में स्टेरॉयड भी मौजूद होते हैं, लेकिन इनका एक साथ इस्तेमाल होना हानिकारक हो सकता है, ऐसे में यदि इसे सही अवधि तक नहीं लिया जाए लिहाजा इनका इस्तेमाल अलग-अलग होना चाहिए और कोई भी एंटीबायोटिक को धीरे-धीरे नहीं बल्कि डॉक्टर द्वारा निर्धारित अवधि खत्म होने पर बंद कर देना चाहिए।

एम्स में एंटीबायोटिक दवाओं के दुरूपयोग को रोकने संबंधि आनलाइन प्रोग्राम का हुआ शुभारंभ

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान ऋषिकेश में वल्र्ड एंटीमाइक्रोबेल एवरनैस वीक विधिवत शुरू हो गया। इसमें लोगों को विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से एंटीबायोटिक के दुरुपयोग से होने वाले शारीरिक नुकसान को लेकर जागरुक किया जाएगा।

एम्स ऋषिकेश में आज निदेशक प्रो. रविकांत ने एंटीबायोटिक दवाओं के दुरुपयोग को रोकने के लिए सप्ताहव्यापी जनजागरुकता पर आधारित ऑनलाइन प्रोग्राम का विधिवत शुभारंभ किया। उन्होंने बताया कि एंटीबायोटिक दवाओं के उचित उपयोग को समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि बिना किसी वैज्ञानिक आधार के इनका अत्यधिक उपयोग व दुरुपयोग हानिकारक परिणाम दे सकता है।
प्रो. रविकांत ने कहा कि स्वास्थ्यकर्मियों को संक्रमण की प्रगति को कम करने के लिए अस्पताल में की जाने वाली सभी प्रक्रियाओं के दौरान यूनिवर्सल प्रिकॉशन का पालन करना चाहिए। उन्होंने इस जनजागरुकता कार्यक्रम के आयोजन के लिए सामान्य चिकित्सा विभाग के डॉ. पीके पांडा, डीन कॉलेज ऑफ नर्सिंग प्रो. सुरेश कुमार शर्मा व उनकी टीम को बधाई दी।

अस्पताल में क्वालिटी इंप्रूवमेंट के विषय को लेकर डीन (हॉस्पिटल अफेयर्स) ब्रिगेडियर प्रो. यूबी मिश्रा ने “इंटीग्रेटेड एंटीमाइक्रोबियल्स स्टीवार्डशिप” पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि एंटीबायोटिक स्टीवर्डशिप प्रोग्राम, डायग्नोस्टिक स्टीवर्डशिप प्रोग्राम, इनफेक्शन प्रीवेंशन एंड कंट्रोल प्रोग्राम इसके मुख्य तत्व हैं। उन्होंने जोर दिया कि सभी मेडिकल संस्थानों को इस प्रोग्राम को सुचारू रूप से चलाने के लिए इन तत्वों पर काम करना चाहिए ताकि यह सकारात्मक रूप से काम कर सके और संक्रमण को रोकने में बड़ी सफलता बना सके।

डीन नर्सिंग प्रो. सुरेश कुमार शर्मा ने “एंटी माइक्रोबियल्स स्टीवार्डशिप प्रैक्टिसेज ” पर सभी नर्सेज को संदेश दिया कि वर्ष 2020 को नर्स और मिडवाइव्स का वर्ष घोषित किया गया है और सीडीसी ने स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली में नर्सों के महत्व पर भी जोर दिया है। एंटी माइक्रोबियल स्टीवर्डशिप प्रथाओं को बढ़ावा देने के लिए नर्सें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं क्योंकि नर्सिंग ऑफिसर्स रोगी की देखभाल में अधिकतम समय बिताते हैं। उन्होंने सभी नर्सों से शपथ लेने का अनुरोध किया कि हम निश्चितरूप से बिना चिकित्सक के परामर्श से दी गई एंटीमाइक्रोबॉयल दवाओं के उपयोग को हतोत्साहित करेंगे और हमेशा सही खुराक, सही माध्यम और सही अवधि तक देंगे।

डॉ. पीके पांडा ने कहा कि एंटी-माइक्रोबियल को संरक्षित करने के लिए संयुक्त चिकित्सक, फार्मासिस्ट और रोगी से सहयोगात्मक प्रयास आवश्यक हैं। साथ ही उन्होंने सभी चिकित्सकों को संदेश दिया कि उन्हें अनावश्यक प्रिसक्रिप्शन और बिना किसी संवैधानिक वैज्ञानिक सबूत के दवाई प्रिसक्राइब नहीं करनी चाहिए।

क्लिनिकल फार्माकॉलेजिस्ट प्रोफेसर शैलेंद्र शंकर हाण्डू ने एंटी माइक्रोबियल्स क्या है और इसे कब नहीं लेना चाहिए इस विषय पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि एंटी माइक्रोबियल्स संक्रमण से लड़ने के लिए हमारे हथियार हैं, लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि इन दवाओं के सही उपयोग नहीं होने से यह प्रतिरोध का कारण बन गया है।

एम्स ऋषिकेश में सर्विक्स कैंसर को लेकर 17 नवंबर को होगा वेबिनार आयोजित

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान ऋषिकेश में महिलाओं में होने वाले सर्विक्स कैंसर के मामलों को लेकर चिंतित है। जिसके मद्देनजर संस्थान की ओर से कोविडकाल में वेबिनार के माध्यम से महिला जनजागरुकता अभियान शुरू किया जा रहा है। जिसके मद्देनजर 17 नवंबर को अपराह्न 2 से 3 बजे पहला वेबिनार आयोजित किया जाएगा। जिसमें डब्ल्यूएचओ एक्सपर्ट डा. आर शंकरनारायणन समेत देश के प्रसिद्ध वैज्ञानिक, चिकित्सा विशेषज्ञ, एनएचएम के वरिष्ठ प्रतिनिधि व मेडिकल हेल्थ एंड फेमिली वैलफेयर उत्तराखंड के सदस्य शिरकत कर सामूहिक चर्चा करेंगे। चिकित्सकों का कहना है कि भारत में सर्विक्स कैंसर (बच्चेदानी के मुहं का कैंसर ) के मामले काफी अधिक हैं।

एम्स निदेशक प्रो. रविकांत ने बताया कि महिलाओं में बच्चेदानी के कैंसर (सर्विक्स कैंसर) पर शत-प्रतिशत नियंत्रण संभव है, बशर्ते बालिकाओं को 9 से 14 वर्ष की उम्र के बीच इस कैंसर की रोकथाम के लिए वेक्सीन अनिवार्यरूप से लगाई जाए। उन्होंने बताया कि महिलाओं में पाया जाने वाला सर्विक्स कैंसर ही एक ऐसा कैंसर है जिसका पूर्ण उपचार संभव है। बताया कि बालिकाओं व महिलाओं को अधिकतम 26 वर्ष की उम्र तक बच्चेदानी के कैंसर की रोकथाम के लिए वेक्सीन लगाई जा सकती है। मगर 14 वर्ष से अधिक उम्र में वेक्सिनेशन अपेक्षाकृत कम असरकारक होता है।

बताया कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने वर्ष 2030 तक महिलाओं में बच्चेदानी के कैंसर को समाप्त करने के लिए 90 प्रतिशत तक बालिकाओं में अनिवार्य वेक्सिनेशन और 70 प्रतिशत महिलाओं में इस कैंसर से बचाव के लिए जीवन में 35 से 45 वर्ष की उम्र के बीच कम से कम दो बार सर्विक्स कैंसर की विशेषज्ञ चिकित्सक से जांच का लक्ष्य निर्धारित किया है। उनका कहना है कि इस बीमारी की रोकथाम के लिए 9 से 14 वर्ष से कम उम्र की बालिकाओं में वेक्सीन की एक डोज ही पर्याप्त होती है।

एम्स के महिला रोग विभाग की कैंसर विशेषज्ञ डा. शालिनी राजाराम ने बताया कि भारत में प्रतिवर्ष सर्विक्स कैंसर के करीब एक लाख मामले सामने आते हैं। उन्होंने बताया कि करीब 10 वर्ष पूर्व देश में सर्वाधिक मामले महिलाओं की डिलीवरी के समय मृत्युदर के आते थे, जिसमें प्रतिवर्ष करीब 72 हजार का आंकड़ा था, मगर सरकार की ओर से इसे रोकने के लिए विघ्भिन्न स्तर पर जनजागरुकता मुहिम चलाई गई, जिससे इस तरह की मृत्युदर में काफी कमी आई है।

कार्यक्रम में इसके अलावा एनएचएम, उत्तराखंड की निदेशक डा. अंजलि नौटियाल व नेशनल प्रोग्राम मेडिकल हेल्थ एंड फेमिली वैलफेयर, उत्तराखंड की निदेशक डा. सरोज नैथानी भी प्रतिभाग करेंगी।
यह हैं महिलाओं में बच्चेदानी के कैंसर के लक्षण-
महिलाओं की बच्चेदानी से रक्तस्राव, महिलाओं में संभोग के बाद बच्चेदानी से खून आना, बच्चेदानी से बदबूदार पानी का निकलना आदि। ऐसे लक्षण पाए जाने पर महिलाओं को तत्काल अस्पताल में इसकी जांच करानी चाहिए व विशेषज्ञ चिकित्सका का परामर्श लेना चाहिए, साथ ही सर्विक्स कैंसर की रोकथाम के लिए वेक्सीन अनिवार्यरूप से लगानी चाहिए।

उत्तराखंड में बढ़ेगी कोविड टेस्टिंग, सीएम ने दिए निर्देश

मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने सचिवालय में कोविड के रोकथाम एवं बचाव कार्यों की समीक्षा करते हुए अधिकारियों को निर्देश दिये कि प्रदेश में कोविड टेस्टिंग और बढ़ाई जाय। देहरादून, हरिद्वार, उधमसिंह नगर एवं नैनीताल जनपद को इस दिशा में विशेष प्रयास करने होंगे। कोविड से बचाव के लिए नियमित रूप से विभिन्न माध्यमों से जन जागरण अभियान चलाये जाय। त्योहारों का समय चल रहा है, लोगों का आवागमन भी तेजी से बढ़ा है। भीड़-भाड़ वाले स्थानों एवं पर्यटक व धार्मिक स्थलों पर जन जागरण के साथ ही सोशल डिस्टेंसिंग और मास्क की अनिवार्यता का पूरा अनुपालन कराया जाय। व्यापारिक संगठनों एवं अन्य सामाजिक संस्थाओं के सहयोग से त्योहारों के सीजन में दुकानों में सेनिटाइजर एवं स्वच्छता प्रबंधन पर विशेष ध्यान दिया जाय।

मुख्यमंत्री श्री त्रिवेन्द्र ने कहा कि कोविड से बचाव के लिए मानव संसाधन की पूरी व्यवस्था हो, अगले 15 दिन विशेष सतर्कता बरतने की जरूरत है। यह सुनिश्चित किया जाय कि शहरी जनपदों में 24 घण्टे एवं ग्रामीण जनपदों में 48 घण्टे के अन्दर कोविड सैंपल की टेस्ट रिपोर्ट लोगों को मिल जाय। जिन लोगों का एंटिजन टेस्ट सिम्पटमैटिक है, उनका अनिवार्य रूप से आरटीपीसीआर टेस्ट हो। हाई रिस्क कॉन्टेक्ट का शत प्रतिशत टेस्टिंग कराई जाय। त्योहरों के सीजन में अधिकारी लगातार फील्ड विजिट करें। लेब टेक्निशियन, रेडियोलॉजिस्ट और आशा वर्कर बढ़ाये जाय। सभी जिलों में इनकी पर्याप्त उपलब्धता हो। मुख्यमंत्री ने कहा कि डॉक्टरों की बड़ी जिम्मेदारी है कि वे मनोवैज्ञानिक रूप से कोविड मरीजों को मजबूत करें एवं वरिष्ट चिकित्सक निरंतर मरीजों के सम्पर्क में रहें।

सचिव स्वास्थ्य अमित नेगी ने कहा कि इस सप्ताह प्रदेश में कोरोना के मामलों में वृद्धि हुई है। इसे नियंत्रित करने के लिए जिलाधिकारियों को और प्रयासों की जरूरत है। ट्रू-नॉट टेस्टिंग और बढ़ाई जाय। सभी जिलाधिकारी कोविड के दृष्टिगत आवश्यक सामग्रियों की पूर्ण उपलब्धता रखें। कोविड केयर सेंटर में रहने, खाने एवं स्वास्थ्य की व्यवस्थाओं की नियमित निगरानी रखी जाय।

पुलिस महानिदेशक लॉ एण्ड आर्डर अशोक कुमार ने कहा कि पुलिस विभाग द्वारा कोविड से बचाव हेतु पैदल मार्च, पोस्टर, वॉल पेंटिंग एवं अन्य माध्यमों से जागरूकता कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं। मास्क एवं सोशल डिस्टेंसिंग के पालन के लिए लोगों को जागरूक किया जा रहा है। गाइर्डलाईन का अनुपालन न करने वालों के चालान भी किये जा रहे हैं, लेकिन उन्हें निःशुल्क मास्क भी दिये जा रहे हैं।

बैठक शुरू होने से पूर्व सल्ट विधायक सुरेन्द्र सिंह जीना के निधन पर 02 मिनट का मौन रखा गया। मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र एवं सभी अधिकारियों ने मृत आत्मा की शांति के लिए ईश्वर से प्रार्थना की एवं शोक संतप्त परिवारजनों को दुःख की इस घड़ी में धैर्य प्रदान करने की कामना की।