जल नीति बनाने वाला देश के चुनिंदा राज्यों में शामिल हुआ उत्तराखंड

सांस्कृतिक नगरी के रुप में विख्यात अल्मोड़ा में राज्य बनने के बाद दूसरी बार कैबिनेट बैठक हुई है। इसमें लंबे समय से प्रतीक्षारत जल नीति-2019 को मंजूरी दे दी गई। इसमें राज्य में जल संरक्षण व जल दोहन को लेकर कड़े प्रावधान किए जाएंगे। जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण शोध एवं सतत विकास संस्थान कोसी कटारमल में बुधवार को मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत की अध्यक्षता में आयोजित मंत्रीमंडल की बैठक में 15 प्रस्तावों पर मुहर लगी।
बैठक के बाद सरकार के प्रवक्ता मदन कौशिक ने पत्रकारों को बताया कि उत्तराखंड, जल नीति लागू करने वाले देश के चुनिंदा राज्यों में शामिल हो गया है। इस नीति का लक्ष्य राज्य के सभी जल संसाधनों को संरक्षित करना, पर्यावरण को संतुलित करना, प्रभावी क्रियान्वयन के लिए ढांचा तैयार करना है। राज्य में सिचाई, उद्योग, पशुपालन आदि के लिए केवल तीन फीसद जल की आवश्यकता है। अगर हम पूरे उपलब्ध जल का तीन फीसद रोकने में सफल रहे तो विकास की ओर आगे बढ़ेंगे। जल आवंटन की प्राथामिकता, भूजल के उपयोग, सिचाई, ईको टूरिज्म, जल विद्युत विकास से लेकर किस तरह वाटर चार्ज लेंगे, इस पर मंत्रिमंडल में विस्तार से चर्चा की गई है। इस नीति को बनाने से पहले हमने 14 विभागों व संस्थानों से विचार-विमर्ष किया गया था। इसे मंजूरी मिलना बड़ी उपलब्धि है।
सरकारी प्रवक्ता कौशिक ने बताया कि कुमाऊं विश्वविद्यालय के सोबन सिंह जीना परिसर अल्मोड़ा में अब आवासीय विश्वविद्यालय अल्मोड़ा संचालित होगा। यहां पर नया विश्वविद्यालय को विस्तार मिलने से अल्मोड़ा, बागेश्वर, पिथौरागढ़ व चम्पावत के महाविद्यालय संबद्ध हो जाएंगे। इसके लिए विधानसभा में जल्द ही एक्ट के जरिये मंजूरी दी जाएगी। देहरादून सिटी मिशन को पीपीपी मोड में दिया गया है। इसकी सफलता के बाद इस प्रोजेक्ट को अन्य शहरों में भी लागू किया जाएगा। इसमें परिवहन मंत्री यशपाल आर्य, कृषि मंत्री सुबोध उनियाल, संस्कृति मंत्री सतपाल महाराज, उच्च शिक्षा राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार डॉ. धन सिंह रावत, राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार रेखा आर्य मौजूद रही।

कैबिनेट में इन प्रस्तावों को भी मिली मंजूरी
1. अल्मोड़ा में सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय को आवासीय विश्वविद्यालय बनाने को मंजूरी ।
2. उत्तराखण्ड की जल नीति 2019 को मंजूरी ।
3. प्रदेश सरकार द्वारा जनकल्याणकारी योजनाओं को पीपीपी मोड नीति-2012 में संशोधन।
4. राज्य की आइटीआइ में फीस वृद्धि को मंजूरी। प्रतिवर्ष 3900 रूपये शुल्क देना होगा। इस फीस का कुछ हिस्सा शासन को भेजा जाएगा।
5. प्रदेश में जंगली जानवरों व आपदा से फसल, जान-माल की हानि का मुआवजा अब वन विभाग के बजाय आपदा के फंड से मिलेगा ।
6. टिहरी झील के पास आइटीबीपी के एडवेंचर सेंटर को मंजूरी। सेंटर के लिए भूमि की व्यवस्था होने तक पर्यटन विभाग के भवनों का उपयोग किया जाएगा।
7. डॉ. आरएस टोलिया उत्तराखंड प्रशासन अकादमी नैनीताल की सेवा नियमावली को मंजूरी ।
8. प्रदेश सरकार के सभी मंत्री अपने आयकर का भुगतान स्वयं वहन करेंगे। अभी तक मंत्रियों के आयकर का भुगतान प्रदेश सरकार द्वारा किया जा रहा था।
9. राजभवन अधिष्ठान में नियमावली संशोधन पर सहमति। अब राज्यपाल सचिवालय और राजभवन की एक ही नियमावली होगी।
10. पंडित दीनदयाल उपाध्याय गृह आवास (होम-स्टे) नियमावली में संशोधन। अब पुराने घर के नवीनीकरण अथवा उसमें सुविधाएं बढ़ाने के लिए 143 कराने की जरूरत नहीं। बैंक से ऐसे होमस्टे को अब मिल सकेगा ऋण।
11. मोटरयान नियमावली में संशोधन, अब 30 दिन के भीतर संबंधित थाने को रिपोर्ट देनी अनिवार्य होगी।
12. उत्तराखंड डेयरी सहकारी फेडरेशन के तहत उच्च प्राथमिक व प्राथमिक स्कूलों के लगभग 6 लाख बच्चों को सप्ताह में 1 दिन पौष्टिक दूध मिलेगा। इसमें छह करोड़ शासन खर्च करेगा।
13. पशुपालन विभाग के तहत वैक्सीनेटर सेवा नियमावली को मंजूरी।
14. उत्तराखंड राजस्व अभिलेख 2019 का प्रख्यापन किया गया, इसके लिए प्रदेश में 10 सदस्य कमेटी बनेगी और जिलों में जिलाधिकारी की अध्यक्षता में कमेटी बनाई जाएगी।
15. उत्तराखण्ड राजस्व अभिलेख नियमावली 2019 की स्वीकृति।

पंचायत प्रतिनिधि कह रहे बहुत नाइंसाफी हुई, आखिर जानिए कैसे?

पंचायत राज संशोधन अधिनियम को लेकर हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ उत्तराखंड सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर की है जिस पर सोमवार को सुनवाई होनी है। गौरतलब है कि गुरुवार को हाई कोर्ट ने 25 जुलाई 2019 से पहले दो बच्चों से अधिक वाले ग्राम पंचायत प्रत्याशियों को चुनाव लडने के योग्य करार दिया था। इस फैसले को सरकार असहज होना पड़ा और सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दायर करने का निर्णय किया।
हाई कोर्ट ने दो से अधिक बच्चों वाले प्रत्याशियों के मामले में पारित आदेश पर साफ किया है कि कोर्ट के समक्ष जिला पंचायत व क्षेत्र पंचायत का मामला आया ही नहीं। सिर्फ ग्राम पंचायतों का ही मामला आया। अदालत ने 25 जुलाई 2019 के बाद वाले तीन बच्चों वाले प्रत्याशियों को अयोग्य घोषित किया है जबकि इस तिथि से पहले वालों को योग्य। पंचायती राज संशोधित नियमावली के नियम-8-1(आर) में ग्राम प्रधान, उप प्रधान व वार्ड मेंबर से संबंधित, नियम-53-1(आर) में जिला पंचायत तथा नियम 91-1 में क्षेत्र पंचायत सदस्यों के चुनाव लडने से संबंधित प्रावधान है। कोर्ट ने ग्राम पंचायत से संबंधित संशोधित प्रावधान पर रोक लगाई है, अन्य में हस्तक्षेप नहीं किया है। उधर पूर्व ब्लॉक प्रमुख व कांग्रेस प्रदेश उपाध्यक्ष जोत सिंह बिष्ट की ओर से बीडीसी व जिला पंचायत सदस्य पदों के लिए भी इस आदेश को लागू करने की मांग को लेकर याचिका दायर करने की तैयारी की जा चुकी है।

हिन्दू वकील की मुस्लिम पक्ष की पैरोकारी ने रौंगटे खड़े कर दिए, जानिए क्या कह रहे वकील साहब!

राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद मामले में मुस्लिम पक्ष का कहना है कि 1992 में बाबरी मस्जिद गिराने का मकसद हकीकत को मिटाकर वहां राम मंदिर का निर्माण करना था। मुस्लिम पक्षकारों ने दावा किया, ‘बाबरनामा’ के अनुवाद में कहा गया है कि बाबर ने अयोध्या में मस्जिद बनाने का आदेश दिया था। वहीं, शुक्रवार को सुनवाई मात्र करीब सवा घंटे चली। अब अगली सुनवाई सोमवार को होगी।
शुक्रवार को चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ के समझ 28वें दिन की सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्षकारों के वकील राजीव धवन ने कहा, बाबरनामा के अनुवाद वाली किताबों में दर्ज है कि बाबर ने मस्जिद बनवाई। हिंदू पक्षकार अपनी सुविधा अनुसार गजेटियर का हवाला दे रहे हैं। गजेटियर अलग-अलग वक्त पर अलग नजरिये से जारी हुए। लिहाजा सीधे नहीं कहा जा सकता कि बाबर ने मंदिर तोड़कर मस्जिद बनवाई।
वहीं, धवन ने तीन शिलालेखों का हवाला देते हुए कहा, इनमें लिखा गया था कि बाबर के कमांडर मीर बाकी ने मस्जिद बनाई। इन शिलालेखों पर हिंदू पक्षकारों को आपत्ति है। जब हिंदू पक्ष यात्रा वृतांत और गजेटियर की बात करते हैं तो वे इसे कैसे नकार सकते हैं। हाईकोर्ट ने इन शिलालेखों को नकार दिया, जो सही नहीं है। उन्होंने कहा कि मुस्लिम पक्ष के एक और वकील जफरयाब जिलानी का यह कहना बिल्कुल सही है कि 1855 से पहले किसी दावे को स्वीकार नहीं किया जा सकता। जस्टिस एसए बोबडे ने सवाल किया कि मस्जिद में संस्कृत में लिखे शिलालेख भी हैं। इस पर धवन ने कहा, मस्जिद, हिंदू और मुस्लिम मजदूरों ने मिलकर बनाई थी। संभव है कि काम खत्म होने के बाद मजदूर यादगार के तौर पर कुछ लिखकर जाते हों।
मुस्लिम पक्षकारों के वकील धवन ने बताया कि 1985 में राम जन्मभूमि न्यास बनाया गया। इसके बाद वाद दाखिल किया गया। वर्ष 1989 से विश्व हिंदू परिषद शिला लेकर पूरे देश में घूमने लगी। देश में माहौल बनाकर 1992 में मस्जिद ढहा दी गई। मस्जिद गिराने का मकसद हकीकत को खत्म करना और मंदिर बनाना था। उन्होंने कहा, राम जन्मभूमि को न्यायिक व्यक्ति मानने के पीछे मकसद यह है कि भूमि को कहीं और शिफ्ट न किया जाए और कोर्ट में दावा सही साबित किया जा सके। मुस्लिम पक्षकारों के वकील धवन ने यह भी कहा कि भगवान विष्णु स्वयंभू हैं और इसके सुबूत हैं। यहां भगवान राम के स्वयंभू होने की दलील पेश की जा रही है। दलील दी जा रही है कि भगवान राम सपने में आए थे और बताया कि उनका सही जन्मस्थान कहां पर है। धवन ने कहा कि क्या इस पर विश्वास किया जा सकता है।

नाराजगी जताकर अपना बचाव तो नही कर रहे यशपाल आर्य!

उत्तराखंड में समाज कल्याण और परिवहन विभाग के कैबिनेट मंत्री यशपाल आर्य के इस्तीफे के पेशकश की खबर चर्चा के केंद्र में है। निश्चित तौर पर यह खबर जिस तरह से सामने आई है वह साफ करती है कि यशपाल आर्य की जानकारी और मर्जी के बिना यह जनकरी बाहर आने की संभावना ना के बराबर है। क्योंकि मामला मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत और यशपाल आर्य के बीच का ही था। क्या इसके पीछे वही कारण है जो प्रचारित किया गया है या कुछ और। यह विचारणीय प्रश्न है।
कारण सरकारी सेवाओं में पदोन्नति में रोक लगाने और नया रोस्टर जारी किया गया है। यह फैसला उस कैबिनेट सब कमेटी की सिफारिशों पर किया गया जिसके अध्यक्ष खुद यशपाल आर्य थे और दो अन्य कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल व अरविंद पाण्डेय उसके सदस्य।
फिलहाल यशपाल आर्य ने अपनी चाल चल दी है। जरा अतीत में जाएं तो ये वही यशपाल आर्य हैं जिनको कांग्रेस से विधान सभा चुनाव के पहले अमित शाह बीजेपी में लेकर आए थे। फिर जब एनएच 74 घोटाले की जांच ने जोर पकड़ा तो उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया क्योंकि यह उस क्षेत्र का मामला है जहां यशपाल आर्य की राजनीति का गढ़ है। तो क्या यशपाल आर्य ने ये आरक्षित वर्ग को न्यायोचित हक का अस्त्र इसलिए इस्तेमाल किया क्योंकि उनको दिल्ली में पार्टी और सरकार से वह भाव मिलना बंद हो चुका था जो उत्तराखंड विधान सभा चुनाव के दौरान मिला था। जैसे जैसे उनके तमाम किस्से विरोधी दिल्ली पहुंचाते रहे उनकी पकड़ और साख बीजेपी हाई कमान की नजर में कम होती रही।
12 सितंबर को मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने चावल घोटाले का जिक्र कर दिया और बोले कि कुछ लोग अपनी जेब में चावल के कागज लेकर उत्तराखण्ड पहुंचते थे और असली चावल कहीं और चला जाता था। यह भी सीएम का कांग्रेस से बीजेपी में विधान सभा चुनाव के दौरान ही आए दूसरे कबिना मंत्री पर राजनीतिक प्रहार माना गया। कहीं ऐसा तो नहीं कि मुख्यमंत्री अपना दूसरा तीर कमान से छोड़ें उसके पहले ही यशपाल आर्य ने वह दांव लगा दिया जो वोट बैंक को पर असर डालता है इसलिए मुख्यमंत्री सकते में हैं और डैमेज कंट्रोल में जुट गए बताए जा रहे हैं।
अब सरकार एनएच 74 घोटाले पर आगे बढ़ने का साहस नहीं जुटा पाएगी। उधर, उधम सिंह नगर में हुए चावल घोटाले के समय 2012 से 2017 के काल में प्रीतम सिंह खाद्य आपूर्ति मंत्री थे, उनका वर्तमान मुख्यमंत्री के मुंह लगे वरिष्ठ नौकरशाह से 36 का आंकड़ा जग जाहिर है। माना जाता है कि उनके ही उपलब्ध कराए दस्तावेजों के आधार पर अगस्त 17 में त्रिवेंद्र रावत ने जांच शुरू कराई थी। उधर कांग्रेस की अंदरूनी लड़ाई के चलते हरीश रावत भी जांच के लिए मुख्यमंत्री के मददगार अंदरखाने बन रहे थे। अचानक प्रीतम सिंह ने जांच में दो और मुद्दों को शामिल करने की मांग कर डाली। बस मामला कृषि विभाग तक जा पहुंचा और धान पर आ गया। एक वर्तमान काबिना मंत्री तक जांच पहुंचती तो इसे भी एनएच 74 की तर्ज पर ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। इसके पहले प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना में हरिद्वार में हुवे घोटाले को भी ये सरकार ठंडे बस्ते में डाल चुकी है। यशपाल आर्य के इस्तीफे की खबर ने इन सभी मुद्दों को गरमा दिया है।
खास तौर पर 2014 से 2019 के दौर में हुवे प्रधान मंत्री कौशल विकास योजना में हुवे घोटाले की जांच को दबाने की जानकारी प्रधानमंत्री तक पहुंचाई जा रही है। इससे लगता है कि आने वाले दिनों में उत्तराखंड की राजनीति में गर्मी बनी रहेगी। इसका असर इन दिनों नजर भी आने लगा है सरकार की उपलब्धियों के इश्तेहारों से अखबारों और चैनलों को उपकृत किया जा रहा है। इस दौर में माध्यमों के लिए यह सकून का संदेश है। तो क्या कांग्रेस से बीजेपी में आया धड़ा सी एम के खिलाफ लाम बंदी कर मंदी के दौर में मोदी सरकार के लिए नया सिरदर्द पैदा करने की कोशिश कर रहा है।
(यह पोस्ट फेसबुक से ली गई है। लेखक निशीथ जोशी पंजाब केसरी उत्तराखंड के संपादक है।)

जानिए, तिहाड़ जाने से अच्छा है घर में नजर बंद रहुं, किसने कहा?

दिल्ली की शीर्ष अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार पूर्व वित्त मंत्री चिदंबरम की सीबीआई हिरासत पांच सितंबर तक बढ़ा दी है। चिदंबरम के वकील ने कहा कि वे फिलहाल अंतरिम जमानत पर जोर नहीं दे रहे हैं। उन्होंने इसकी सुनवाई पांच सितंबर को निर्धारित करने की मांग की। सीबीआई ने मामले में चिदंबरम की हिरासत में पूछताछ की अवधि दो दिन बढ़ाने की मांग की थी।
वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि आईएनएक्स मीडिया भ्रष्टाचार मामले में गिरफ्तार पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम पांच सितंबर तक सीबीआई की हिरासत में रहेंगे। शीर्ष अदालत ने चिदंबरम के वकील से कहा कि फिलहाल वह निचली अदालत में सोमवार को दायर अंतरिम जमानत याचिका पर पांच सितंबर तक जोर नहीं दें। न्यायमूर्ति आर भानुमति और न्यायमूर्ति ए एस बोपन्ना की पीठ ने कहा कि चिदंबरम के खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी करने और उन्हें सीबीआई की हिरासत में भेजने के निचली अदालत के आदेशों को चुनौती देने वाली याचिका पर पांच सितंबर को सुनवाई की जाएगी। पीठ ने इस मामले को पांच सितंबर के लिये सूचीबद्ध करते हुए कहा कि हम इस बात के प्रति सजग हैं कि हमें संबंधित निचली अदालत का अधिकार क्षेत्र नहीं छीनना चाहिए।
इससे पहले पूर्व वित्त मंत्री चिदंबरम ने न्यायालय से कहा कि उन्हें न्यायिक हिरासत में तिहाड़ जेल नहीं भेजा जाए बल्कि घर में ही नजरबंद कर दिया जाए। शीर्ष अदालत ने कहा था कि यदि निचली अदालत सोमवार को ही चिदंबरम के अंतरिम जमानत के अनुरोध पर विचार नहीं करती है तो उनकी सीबीआई हिरासत की अवधि और तीन दिन के लिए बढ़ा दी जाएगी। पीठ ने सीबीआई को निर्देश दिया कि वह निचली अदालत द्वारा चिदंबरम के खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी करने और बाद में उन्हें जांच ब्यूरो की हिरासत में देने के आदेश को चुनौती देने के मामले में अपना जवाब दाखिल करे।
सीबीआई की विशेष अदालत ने 30 अगस्त को पूर्व वित्त मंत्री को दो सितंबर तक सीबीआई की हिरासत में भेज दिया था। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पर आरोप है कि वित्त मंत्री रहते हुए उन्होंने रिश्वत लेकर आईएनएक्स मीडिया को 2007 में 305 करोड़ रुपये लेने के लिए विदेशी निवेश संवर्धन बोर्ड से मंजूरी दिलाई थी।

वन भूमि हस्तांतरण के अधिकार का दायरा बढ़ाने का अनुरोध

नई दिल्ली स्थित इंदिरा पर्यावरण भवन में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा आयोजित ”वन मंत्रियों की बैठक” में उत्तराखण्ड के वन एवं वन्य जीव, पर्यावरण एवं ठोस अपशिष्ट निवारण, श्रम, सेवायोजन, प्रशिक्षण, आयुष एवं आयुष शिक्षा मंत्री डा. हरक सिंह रावत ने प्रतिभाग किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने की।
बैठक में उत्तराखण्ड के वन मंत्री डाॅ. हरक सिंह ने बताया कि प्रधानमंत्री की आशा के अनुरूप राज्य में प्लास्टिक को पहले काफी हद तक बैन कर दिया गया है। वन क्षेत्र में सुधार एवं वन क्षेत्र को बढ़ावा देने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि राज्य का 29 प्रतिशत भू-भाग में ही कृषि और जनसंख्या रहती है बाकी पूरा क्षेत्र वन है उन्होंने कहा कि वन को संरक्षण किये जाने की जिम्मेदारी राज्य सरकार की है।

केन्द्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कैम्पा फण्ड के तहत रूपये 2675 करोड़ का बजट स्वीकृत करते हुये उत्तराखण्ड के वन एवं वन्य जीव मंत्री डा0 हरक सिंह रावत को क्रास चैक सौंपा। ज्ञातव्य है कि कैम्पा फण्ड का प्रयोग राज्यों के वन क्षेत्र में इजाफा करना, वन क्षेत्र में जल संरक्षण और वन क्षेत्र की खराब भूमि को उपजाऊ बनाने में किया जाता है। उन्होनें केन्द्रीय मंत्री से अनुरोध किया कि उत्तराखण्ड पहाड़ी एवं वन राज्य होने के कारण राज्य सरकार के पास एक हैक्टेयर वन भूमि हस्तांतरण का अधिकार है जिसको बढ़ाकर 5 हैक्टेयर कर दिया जाये ताकि राज्य के विकास कार्य सुचारू रूप से हो सके।
केन्द्रीय मंत्री से अनुरोध किया कि हिमाचल प्रदेश की तरह तकनीकी रिपोर्ट के आधार पर 1000 मीटर की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में अपनी उम्र पार कर चुके परिपक्व वृक्षों के पातन अनुज्ञा हेतु अनुरोध किया ताकि उनके स्थान पर नये वृक्ष लगाये जा सकेगें ।
डाॅ, हरक सिंह रावत ने केन्द्रीय मंत्री से अनुरोध किया कि वस्तुओं के बनाने पर पूरी तरह से रोक लगाने से ही इस प्रकार की वस्तुओं का प्रयोग बन्द किया जा सकता है। उक्त बैठक में केन्द्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन राज्य मंत्री बाबुल सुप्रियो व उत्तराखण्ड के अपर प्रमुख वन संरक्षक डाॅ. एस0डी0 सिंह एवं उत्तराखण्ड कैम्पा के सीईओ डॅा. समीर सिन्हा भी उपस्थित थे।

’’शगुन’’ से स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता में आयेगा बड़ा सुधारः निशंक

केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री डाॅ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ने स्कूली शिक्षा के क्षेत्र को मजबूती देने के मकसद से विश्व के सबसे बड़े ऑनलाइन जंक्शनों में शामिल एकीकृत ऑनलाइन जंक्शन ‘स्कूल एजुकेशन शगुन’ का शुभारंभ नई दिल्ली में किया। इस ऑनलाइन जंक्शन के जरिए स्कूली शिक्षा से जुड़े सभी ऑनलाइन पोर्टल्स और वेबसाइट को जोड़ने की पहल की गई है। इस मौके पर मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री संजय शामराव धोत्रे भी मौजूद रहे।
कार्यक्रम में केंद्रीय मंत्री रमेश पोखरियाल ने कहा कि बेहतर शिक्षा के बिना किसी राष्ट्र, समाज या परिवार की उन्नति नहीं हो सकती। शिक्षा तरक्की की नींव है और नींव जितनी मजबूत होगी, इमारत उतनी ज्यादा बेहतर होगी। ‘स्कूल एजुकेशन शगुन’ एक ऐसा ही प्लैटफॉर्म है, जिसके जरिए शिक्षा की नींव को मजबूती मिलेगी। ‘शगुन’ में श शब्द का आशय शाला से है, जिसका मतलब स्कूल से है और गुन से गुणवत्ता को दर्शाया गया है। केंद्रीय मंत्री ने आगे कहा कि 1200 केंद्रीय विद्यालयों, 600 नवोदय विद्यालयों, सीबीएससी से जुड़े 18000 स्कूलों, 30 एससीईआरटी और एनसीटीई से जुड़े 19000 संस्थानों की वेबसाइट्स को ‘स्कूल एजुकेशन शगुन’ पोर्टल से जोड़ा गया है। इस ऑनलाइन प्लैटफॉर्म के जरिए 15 लाख स्कूलों, 92 लाख शिक्षकों और करीब 26 करोड़ विद्यार्थियों की जानकारी ली जा सकती है। इसके जरिए योजनाओं की जानकारी लेने के साथ ही लोगों को स्कूलों से जुड़ी नई सूचनाएं भी मिलेंगी।

पोखरियाल ने कहा कि हम चाहते हैं कि किसी के मन में कोई सवाल है, तो वह सवाल हम तक पहुंच सके। इस एकीकृत ऑनलाइन जंक्शन के जरिए लोग स्कूल के बारे में अपनी प्रतिक्रिया हम तक पहुंचा सकेंगे। इसके साथ ही स्कूल शिक्षा से जुड़े समस्त आंकड़े एक जगह से प्राप्त कर सकेंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस नए भारत की कल्पना की है, जिसमें उन्होंने हमेशा कहा कि शिक्षा में तकनीक का बेहतर इस्तेमाल होना चाहिए। उसी दिशा में ‘स्कूल एजुकेशन शगुन’ स्कूली शिक्षा के स्तर को नई ऊंचाई पर ले जाने का काम करेगा।
‘स्कूल एजुकेशन शगुन’ के जरिए विद्यार्थियों को ऑनलाइन पढ़ने के लिए सामग्री मिलेगी, साथ ही उन्हें वीडियो आधारित शिक्षा का अवसर भी मिलेगा। वेबसाइट के जरिए यह भी जाना जा सकता है कि आपके क्षेत्र में कौन-कौन से स्कूल हैं और वह क्या-क्या सेवाएं उपलब्ध करा रहे हैं। इसके अलावा केंद्रीय मंत्री श्री पोखरियाल ने ‘एकीकृत राष्ट्रीय स्कूली शिक्षा निधि’ (INSET) बनाने की भी घोषणा की, जिसके जरिए विद्यार्थियों, शिक्षकों ओर स्कूलों से जुड़ी तमाम सूचनाएं एक मंच से मिल सकेंगी।
कार्यक्रम में मौजूद मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री संजय शामराव धोत्रे ने कहा कि ‘स्कूल एजुकेशन शगुन’ के जरिए स्कूलों से जुड़ी समस्त जानकारी एक साथ मिल सकेगी। स्कूलों की सुविधाओं के बारे में जानने के साथ ही उन्हें जांच कर उन पर अपने सुझाव भी दिए जा सकेंगे। धोत्रे ने कहा कि यह बहुत ही अच्छा कदम है, इससे बच्चों के सम्पूर्ण विकास में और मदद मिलेगी। इस मौके पर मानव संसाधन विकास मंत्रालय के विद्यालय शिक्षा विभाग की सचिव रीना रे समेत मंत्रालय के अन्य अधिकारी मौजूद रहे।
शगुन पोर्टल को इस लिंक पर क्लिक करके देखा जा सकता है : http://seshagun.gov.in

संकटमोचक को विदाई देने पहुंचे दिग्गज भाजपा नेता

पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली आज अपने अनंत सफर पर रवाना हो गए। पूरे राजकीय सम्मान के साथ उनके शव का अंतिम संस्कार किया गया। भाजपा के संकटमोचक को अंतिम विदाई देने के लिए उप राष्ट्रपति वेंकैया नायडू, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला, गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण सहित कई राज्यों के मुख्यमंत्री, योग गुरु बाबा रामदेव और विपक्ष के कई दिग्गज नेता भी पहुचे। सभी ने नम आंखों से जेटली को विदाई दी। विदेश यात्रा पर होने की वजह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अरुण जेटली के अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हो पाए। हालांकि उन्होंने शोकाकुल परिवार से फोन पर बात की थी। बहरीन में अपना दुख व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा था कि मैं यहां इतनी दूर हूं और मेरा दोस्त अरुण चला गया।
भाजपा मुख्यालय में दी श्रद्धांजलि
इससे पहले दिवंगत नेता अरुण जेटली का पार्थिव शरीर भाजपा मुख्यालय लाया गया जहां केंद्रीय मंत्री अमित शाह, राजनाथ सिंह और वरिष्ठ पार्टी नेताओं तथा कार्यकर्ताओं ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। भाजपा के कार्यकारी अध्यक्ष जेपी नड्डा, केंद्रीय मंत्री हर्षवर्धन, प्रकाश जावड़ेकर, पीयूष गोयल, अनुराग ठाकुर और आप के राज्यसभा सदस्य संजय सिंह ने भी जेटली को श्रद्धांजलि अर्पित की। जेटली के पार्थिव शरीर को तिरंगे में लपेटकर उनके कैलाश कॉलोनी स्थित आवास से दीन दयाल उपाध्याय स्थित भाजपा मुख्यालय लाया गया। भाजपा मुख्यालय के बाहर पार्टी कार्यकर्ता अपने नेता को अंतिम श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए कतार में खड़े थे और ‘जब तक सूरज चांद रहेगा जेटली तेरा नाम रहेगा’ तथा ‘जेटली जी अमर रहें’ जैसे नारे लगा रहे थे।

जेटली के परिवार से की बात
प्रधानमंत्री ने यूएई से ही जेटली की पत्नी संगीता और बेटे रोहन से बात की और उन्हें सांत्वना दी। इस दौरान जेटली के परिवार ने उनसे विदेश दौरा रद्द नहीं करने को कहा। दिल्ली विश्वविद्यालय से छात्र नेता के रूप में राजनीतिक कॅरियर की शुरुआत करने वाले जेटली सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील भी थे। वह अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में भी केंद्रीय मंत्री रहे थे। उनकी गिनती देश के बेहतरीन वकीलों के तौर पर होती रही। 80 के दशक में ही जेटली ने सुप्रीम कोर्ट और देश के कई हाई कोर्ट में महत्वपूर्ण केस लड़े। 1990 में उन्हें दिल्ली हाई कोर्ट ने सीनियर वकील का दर्जा दिया। वीपी सिंह सरकार में वह अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल का पद संभाला था।

विदेश में की घोटालों की पड़ताल
पिछले बीस वर्षों के दौरान जेटली ने वाणिज्य, सूचना प्रसारण, कानून, कंपनी मामले, वित्त, रक्षा जैसे कई महत्वपूर्ण मंत्रालय संभाले। चाहे 1989 में बोफोर्स घोटाले की विदेशों में जाकर पड़ताल करनी हो, 2002 में गुजरात दंगों के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का साथ देना हो या फिर 2009 से 2014 के दौरान राज्यसभा में बतौर नेता विपक्ष मनमोहन सिंह सरकार के भ्रष्टाचार के मामलों को उजागर करना, वे हर बार नई ऊर्जा और रणनीति के साथ भाजपा की राजनीति को नई धार प्रदान करते नजर आते। इस साल मई में जेटली ने पीएम मोदी को पत्र लिखकर स्वास्थ्य कारणों से नई सरकार में कोई जिम्मेदारी लेने से इनकार कर दिया था।

अरुण जेटली की मौत का सच
पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली लंबे समय से चली आ रही गंभीर बीमारियों को हर बार मात देते थे। मधुमेह, मोटापा, गुर्दा, कैंसर, पेट और फेफड़े से जुड़े रोगों का उन्होंने डटकर सामना किया। निधन से पहले 12 घंटे के भीतर दो बार हार्ट अटैक भी आया। आंतों में रक्तस्त्राव होने के बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। वर्ष 2014 में जेटली ने एम्स में गैस्ट्रो यानि पेट से जुड़ा एक ऑपरेशन कराया था। जिसके बाद उनका वजन भी काफी कम हुआ था। चूंकि वह मधुमेह रोग से लंबे समय से ग्रस्त थे।
ऑपरेशन के बाद से डॉक्टरों ने स्वास्थ्य को लेकर उन्हें खास सतर्कता बरतने की सलाह दी थी, जिसके बाद सुबह से लेकर रात तक जेटली संतुलित आहार का सेवन करते थे। सात्विक भोजन के लिए उनका टिफन बाकायदा घर से बनकर वित्त मंत्रालय और सदन तक आता था। हालांकि वर्ष 2017 में उन्हें किडनी (गुर्दे) से जुड़ी तकलीफ शुरू हो गई। कई बार डायलिसिस के बाद वर्ष 2018 में एम्स में किडनी प्रत्यारोपण कराया। प्रत्यारोपण के करीब छह माह तक जेटली काफी स्वस्थ्य रहे। हालांकि डॉक्टरों ने आइसोलेशन में ही रहने की सलाह दी थी लेकिन फिर भी वह जरूरतमंद लोगों को पूरा वक्त देते थे। दिसंबर 2018 में उनकी तबियत में गिरावट आई।
जांच करने पर फेफड़े में एक प्रकार के कैंसर की पुष्टि हुई। इसके बाद जनवरी में न्यूयॉर्क के डॉक्टरों से ऑपरेशन भी कराया। इस ऑपरेशन के बाद से जेटली का स्वास्थ्य लगातार गिरता चला गया। वे पहले से काफी कमजोर हो गए थे। बीते 9 अगस्त को उन्हें सांस लेने में तकलीफ और फेफड़ों में पानी भरने की शिकायत हुई थी जिसके बाद से एम्स में भर्ती थे।

रोबोटिक सर्जरी से ऑपरेशन की जटिलताओं में आती है कमीः एम्स निदेशक

एम्स ऋषिकेश में पहली मर्तबा आयोजित दो दिवसीय सम्मेलन में देश-दुनिया के विशेषज्ञों ने यूरो ओंकोलॉजी एवं यूरोगाइनीकोलॉजी से संबंधित सभी प्रकार की जटिल सर्जरियों पर विस्तृत चर्चा की और अपने अनुभवों को साझा किया।
इस अवसर पर एम्स निदेशक पद्मश्री प्रोफेसर रवि कांत ने बताया कि संस्थान के यूरोलॉजी विभाग की ओर से पहली अंतरराष्ट्रीय रोबोटिक यूरोलॉजी कांफ्रेंस आयोजित की गई। जिसमें देश के ही नहीं अपितु अन्य देशों के भी प्रसिद्ध रोबोटिक शल्य चिकित्सकों द्वारा अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि एम्स ऋषिकेश हमेशा बेहतर उपचार परिणामों के साथ रोगियों के चेहरे पर मुस्कान लाने के लिए समर्पित है, इस श्रंखला में यूरोलॉजी विभाग द्वारा आयोजित कांफ्रेंस में शनिवार का दिन गुर्दे के कैंसर के इलाज एवं महिला पैल्विक रोगों के उपचार व विचार विमर्श के लिए समर्पित रहा। निदेशक प्रो. रवि कांत बताया कि रोबोटिक सर्जरी से पारंपरिक सर्जरी की तुलना में बेहतर परिणाम मिलते हैं,इससे .शरीर से रक्त का बहाव कम होता है और छोटे छोटे चीरे लगने से कम निशान पड़ते हैं एवं घाव आसानी से भर जाते हैं। साथ ही बताया कि रोबोटिक सर्जरी से बेहतर सूचरिंग के कारण सर्जरी में आसानी होती है और ऑपरेशन से संबंधित जटिलताओं में कमी आती है। उन्होंने बताया कि कांफ्रेंस में खासतौर से आस्ट्रेलिया के प्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय रोबोटिक सर्जन डा. डेविड गिल्लाट ने प्रतिभागियों को रोबोटिक सर्जरी की बारिकियों से अवगत कराया। निदेशक प्रो. रवि कांत ने उम्मीद जताई कि यह अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में विशेषज्ञों द्वारा किए गए मंथन से आने वाले समय में मरीजों को लाभ मिलेगा।


एम्स के यूरोलॉजी विभागाध्यक्ष व आयोजन सचिव डा. अंकुर मित्तल ने बताया कि यूरोलॉजी विभाग द्वारा आयोजित दो दिवसीय इंटरनेशनल काफ्रेंस के दूसरे दिन शनिवार को डा. रवि मोहन ने एक मरीज के गुर्दे को बचाते हुए गुर्दे की गांठ की सर्जरी का प्रदर्शन किया। कांफ्रेंस के दौरान यूरोलॉजी विभागाध्यक्ष डा. अंकुर मित्तल ने वेसिको वेजाइनल फिस्टुला रिपेयर ऑपरेशन का प्रदर्शन किया। उन्होंने बताया कि ऑपरेशन के बाद दोनों मरीज पूरी तरह से स्वस्थ हैं। इस अवसर पर उन्होंने एम्स संस्थान की ओर से प्रतिभागियों का धन्यवाद ज्ञापित किया। यूरोलॉजी विभाग के डा. सुनिल कुमार ने प्रतिभागियों को रोबोट पर सिमुलेशन के द्वारा प्रशिक्षण दिया।
सम्मेलन के आयोजन में डा. किम जैकब मैमन, डा. सुनील कुमार, डा. विकास कुमार पंवार, डा. शिव चरण नावरिया, डा. तुषार नारायण आदित्य,डा. निशित के अलावा यूरोलॉजी व गाइनेकोलॉजी टीम ने सहयोग किया।

तो मोदी के समर्थन में हैं कांग्रेस के दिग्गज नेता, पार्टी फैसलों से जता रहे नाराजगी

पिछले कुछ समय से कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के द्वारा लगातार अपनी ही पार्टी के फैसलों से किनारा किया जा रहा है या तो फैसलों पर सवाल खड़े किए जा रहे है। अब कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अभिषेक मनु सिंघवी और जयराम रमेश का भी नाम इस लिस्ट में जुड़ गया है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अभिषेक मनु सिंघवी और जयराम रमेश ने कहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खलनायक की तरह पेश करना गलत है और ऐसा करके विपक्ष एक तरह से उनकी मदद करता है।
सिंघवी ने जयराम रमेश के एक बयान का हवाला देते हुए ट्वीट किया, मैंने हमेशा कहा है कि मोदी को खलनायक की तरह पेश करना गलत है। सिर्फ इसलिए नहीं कि वह देश के प्रधानमंत्री हैं, बल्कि ऐसा करके एक तरह से विपक्ष उनकी मदद करता है। उन्होंने कहा, काम हमेशा अच्छा, बुरा या मामूली होता है। काम का मूल्यांकन व्यक्ति नहीं बल्कि मुद्दों के आधार पर होना चाहिए। जैसे उज्ज्वला योजना कुछ अच्छे कामों में एक है। आपको बता दें कि इससे पहले जयराम रमेश ने राजनीतिक विश्लेषक कपिल सतीश कोमीरेड्डी की किताब मेलिवॉलेंट रिपब्लिकः ए शॉर्ट हिस्ट्री ऑफ द न्यू इंडिया का विमोचन करते हुए कहा था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शासन का मॉडल पूरी तरह नकारात्मक गाथा नहीं है और उनके काम के महत्व को स्वीकार नहीं करना तथा हर समय उन्हें खलनायक की तरह पेश करके कुछ हासिल नहीं होने वाला है। उन्होंने कहा था कि यह वक्त है कि हम मोदी के काम और 2014 से 2019 के बीच उन्होंने जो किया उसके महत्व को समझे, जिसके कारण वह सत्ता में दोबारा लौटे। इसी के कारण 30 प्रतिशत मतदाताओं ने उनकी सत्ता वापसी करवाई।