एम्स में अंतर्राष्ट्रीय नशा निषेध दिवस के मौके पर नशावृत्ति के प्रति जागरूक किया

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में अंतर्राष्ट्रीय नशा निषेध दिवस (इंटरनेशनल डे अगेंस्ट ड्रग एब्यूज एंड इलिसिट ट्रैफकिंग) मनाया गया, इस अवसर पर संस्थान में मरीजों एवं उनके परिजनों, तीमारदारों को विभिन्न पब्लिक एरियाज में सोशल डिस्टेन्सिंग के नियमों का पालन करते हुए नशावृत्ति को लेकर जागरुक किया गया।

निदेशक प्रोफेसर रवि कांत ने बताया कि संस्थान में संचालित एटीएफ के तहत ओपीडी और एडमिशन, दोनों तरह से उपचार की सुविधाएं उपलब्ध हैं, जो कि मरीजों को निशुल्क दी जा रही हैं। लिहाजा सभी को अपने परिवार या आसपास रहने वाले नशाग्रस्त लोगों को संस्थान में उपलब्ध स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ दिलाना चाहिए और ऐसे लोगों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने में योगदान देना चाहिए।
एम्स ऋषिकेश में वर्ल्ड ड्रग दिवस पर आयोजित जनजागरुकता कार्यक्रम में एटीएफ (एडिक्शन ट्रीटमेंट फैसिलिटी) से डॉ. तन्मय जोशी ने विभिन्न तरह के नशीले पदार्थों व दृव्यों को लेकर कई तत्थ्य एवं मिथकों के बारे में लोगों को जानकारी दी। उन्होंने बताया कि वर्ल्ड ड्रग रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में कैनाबिस (यानी भांग, गांजा, चरस आदि ) के साथ साथ शामक दवाइयों का गैर चिकित्सकीय उपयोग बहुत अधिक बढ़ गया है। दक्षिण एशियाई देशों के आंकड़ों पर गौर करें तो वर्ष 2019 में हर 100 में से लगभग 3 व्यक्तियों ने कैनाबिस का उपयोग किया था। एटीएफ काउंसलर तेजस्वी ने मरीजों के परिजनों को बताया कि किशोर वर्ग में इन्हेलन्ट्स का प्रयोग पाया जाना बेहद चिंताजनक है।

संस्थान के मनोचिकित्सा विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर एवं ए.टी.एफ प्रोजेक्ट के नोडल ऑफिसर डॉ. विशाल धीमान ने बताया कि उत्तराखंड परिक्षेत्र में लगभग 38 फीसदी लोग शराब का सेवन कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि कोरोना महामारी के दौरान लोगों में बढ़ते तनाव व अन्य कारणों के चलते सभी नशीले पदार्थ का सेवन बढ़ा है, जिससे कई अन्य तरह की परेशानियों में भी इजाफा हुआ है।

मनोचिकित्सा विभागाध्यक्ष डा. रवि गुप्ता एवं फैकल्टी मेंबर डॉ. विक्रम रावत ने लोगों को बताया कि आमतौर पर नशा शराब से शुरू होता है और समय के साथ साथ निकोटीन और गांजा की ओर बढ़ता है, यह प्रवृत्ति व्यक्ति को धीरे धीरे हार्ड ड्रग्स की ओर ले जाती है। लिहाजा नशा मनुष्य शरीर के लिए बेहद खतरनाक है, इसीलिए वर्ल्ड ड्रग डे पर लोगों से नशे से जुड़े सभी तथ्यों को साझा करना जरुरी था,जिसे कई परिवारों का जीवन बचाने की ओर एक सार्थक कदम माना जा सकता है।

कार्यक्रम के माध्यम से लोगों को सभी नशीली वस्तुओं से होने वाले व्यस्न एवं व्यस्न उपचार संबंधी मिथकों के बाबत भी अवगत कराया गया।
उदाहरण- मिथक 1 – नशीली वस्तुओं का व्यस्न स्वैच्छिक होता है। तत्थ्य रू नशीली वस्तुओं का सेवन आमतौर पर मनोरंजन या नवीनता के अनुभव करने के साथ शुरू होता है, मगर यह पदार्थ दिमाग को निरंतर बदलता रहता है जो एक समय के बाद व्यक्ति को नशा लेने के लिए मजबूर कर देता है और उसके बाद कोई भी व्यक्ति उसे लिए बिना नहीं रह सकता। मिथक 2- नशीली वस्तुओं का व्यस्न चरिता या नैतिकता का दोष है। तत्थ्य रू हर नशीली वस्तु एक- दूसरे से अलग होते हुए भी कहीं न कहीं दिमाग के कुछ खास हिस्सों पर समान दुष्प्रभाव डालते हैं, जो उनके मूड अथवा चाल-ढाल में बदलाव ले आता है। यह उस एक या अनेक नशे का सेवन करने का सबसे बड़ा प्रेरक होता है और वह व्यक्ति को इस प्रेरणा के आगे बेबस और लाचार बना देता है।
मिथक 3- सब नशीली वस्तुओं से छुटकारा पाने की एक ही दवा होनी चाहिए। तत्थ्यः हर व्यक्ति अद्वितीय होता है। यदि किन्ही भी दो व्यक्तियों को एक ही बीमारी की वही दवा भी दी जाए जो पहले व्यक्ति को दी गई है, तब भी दोनों में एक सामान फर्क नहीं आता है। हर नशे की अपनी अलग पहचान होती है और इसलिए उसकी उपचार पद्धति भी अलग अलग ही होती है। हर दूसरे व्यक्ति को एक ही नशीली वस्तु अलग-अलग तरह की शारीरिक व मानसिक दिक्कतें देती है। लिहाजा एक ही तरह व दवाओं से सभी मरीजों का उपचार नहीं किया जाता। मिथक 4- व्यस्न का उपचार एक बार में हो जाना चाहिए। तत्थ्यः जब व्यस्न की बीमारी दीर्घकालीन है, तो उपचार में सततरूप से बने रहना उत्तम है। यदि ऐसा नही किया जाता है तो इलाज दोबारा से शुरू करना पड़ेगा। मिथक 5- महज उपचार शुरू कर देने से ही नशे से दूर हो जाएंगे । तत्थ्यः किसी भी नशा ग्रसित रोगी का इलाज शुरू करना पहली सीढ़ी है। मगर आपका और विशेषज्ञों का परस्पर साथ आना आवश्यक है। इलाज में बने रहना सबसे मुख्य बिंदु है, जिससे आप इलाज का अधिक से अधिक फायदा उठा पाएंगे। मिथक 6- शराब पीकर भी काबू में रहा जा सकता है । तत्थ्यः शराब का सेवन करते ही वह आपकी निर्णायक क्षमताओं में सेंध लगा देती है। इसके चलते आप कई ऐसे निर्णय ले सकते हैं, जिनका बाद में खेद हो। अक्सर यह निर्णय आपको गैरकानूनी गतिविधियों में भी सम्मिलित कर सकते हैं। मिथक 7 – गुटका, खैनी, जर्दा, चबाने वाला तम्बाकू शरीर को नुकसान नहीं देता। तत्थ्यः इन सभी वस्तुओं में मनुष्य के शरीर में कर्क रोग उत्पन्न करने वाले केमिकल मिले होते हैं । इनका सेवन करने से मुंह में होने वाली कई तरह की बीमारियां होने का खतरा बहुत अधिक बढ़ जाता है, जिनमें मुंह का कैंसर भी शामिल है।

एम्स पहुंचे सांसद नरेश बंसल, वैक्सीनेशन को लेकर एम्स की चिकित्सकीय टीम की प्रशंसा की

राज्य सभा सांसद नरेश बंसल जी ने मंगलवार को एम्स ऋषिकेश स्थित कोविड टीकाकरण केंद्र का निरीक्षण किया। इस दौरान उन्होंने संस्थान द्वारा संचालित किए जा रहे कोविड टीकाकरण कार्यक्रम की विस्तृत जानकारी ली और अभियान में जुटे चिकित्सकों की टीम की सराहना की।
राज्य सभा सांसद नरेश बंसल अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के आयुष भवन में पहुंचे। उन्होंने यहां बनाए गए कोविड टीकाकरण केंद्र का निरीक्षण कर संचालित की जा रही व्यवस्थाओं को देखा। इस दौरान आयुष विभाग व कम्युनिटी एंड फेमिली मेडिसिन विभागाध्यक्ष प्रोफेसर वर्तिका सक्सैना जी ने उन्हें केंद्र में संचालित टीकाकरण कार्यक्रम की विस्तृत जानकारी दी। प्रो. वर्तिका सक्सैना जी ने बताया कि टीकाकरण के दौरान केंद्र में कोविड गाइडलाइन का विशेष ध्यान रखा जा रहा है। उन्होंने बताया कि वैक्सीनेशन अभियान की सफलता के लिए केंद्र में आयुष विभाग के अलावा कम्युनिटी एवं फेमिली मेडिसिन विभाग के चिकित्सकों व अन्य स्टाफ की टीम भी टीकाकरण कार्य में जुटी है।
सांसद ने इस दौरान केंद्र में बनाए गए वेटिंग एरिया, पंजीकरण कक्ष, टीकाकरण कक्ष और निगरानी कक्ष आदि की व्यवस्थाएं परखीं और संबंधित जानकारी हासिल की। इस मौके पर उन्होंने कहा कि एम्स ऋषिकेश, उत्तराखंड का न सिर्फ सबसे बड़ा स्वास्थ्य संस्थान है, बल्कि यहां उच्च प्रशिक्षित चिकित्सकों की टीम भी पर्याप्त संख्या में उपलब्ध है। ऐसे में केंद्र सरकार के इस अभियान को सफल बनाने में एम्स की भूमिका सराहनीय है। इस अवसर पर सीएफएम विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डाॅ. प्रदीप अग्रवाल, संस्थान के जनसंपर्क अधिकारी हरीश थपलियाल, नर्सिंग सुपरिटेंडेंट घेवर चंद, मनीष शर्मा, भाजपा की प्रदेश उपाध्यक्ष कुसुम कंडवाल, मंडल अध्यक्ष दिनेश सती, वीरभद्र मंडल अध्यक्ष अरविंद चैधरी, पार्षद सुंदरी कंडवाल, सुदेश कंडवाल आदि भाजपा कार्यकर्ता उपस्थित रहे।

स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों से सीएम ने ली वैक्सीनेशन की जानकारी

मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत ने कारगी चैक के समीप संत निरंकारी भवन में चल रहे कोविड वैक्सीनेशन सेंटर का निरीक्षण किया। मुख्यमंत्री ने स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों से वैक्सीनेशन की जानकारी ली। निरीक्षण के दौरान सभी व्यवस्थाएं सही पाये जाने पर मुख्यमंत्री ने संतोष व्यक्त किया।

स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने जानकारी दी कि इस वैक्सीनेशन केन्द्र में 45 वर्ष से अधिक आयु एवं 18 से 44 आयु वर्ग के लोगों का टीकाकरण हो रहा है। इस अवसर पर जिलाधिकारी देहरादून डॉ. आशीष कुमार श्रीवास्तव भी उपस्थित थे।

मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत ने तत्पश्चात दून अस्पताल में कोविड वैक्सीन की दूसरी डोज ली।

ऋषिकेशः नशे के रोगियों को मिल सकेगा उच्चस्तरीय उपचार, एम्स में शुरू हुआ एटीएफ

सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा वर्ष-2019 में किए गए एक शोध में यह पाया गया कि उत्तराखंड में तम्बाकू के अलावा सबसे ज्यादा इस्तेमाल किए जाने वाले नशे के प्रकारों में शराब, कैनाबिस उत्पाद (भांग/गांजा/चरस), ओपिऑइड्स (स्मैक/हेरोइन/कोकेन/ डोडा आदि ) व इन्हेलन्ट्स भी प्रमुखरूप से शामिल है।
इस सर्वे रिपोर्ट में बताया गया है कि उत्तराखंड में विभिन्न प्रकार का नशा करने वाले मौजूदा पुरुष उपभोगकर्ताओं की संख्या शराब से 38.1 प्रतिशत, कैनाबिस उत्पाद से 1.4 प्रतिशत, ओपिऑइड्स से 0.8 प्रतिशत और इन्हेलन्ट्स का इस्तेमाल करने वाले 10 से 17 वर्ष तक के बच्चों की संख्या 1.7 फीसदी है। देशभर में हर पांच में से एक व्यक्ति शराब और हर 11 में से एक व्यक्ति कैनाबिस नशे का रोगी है, जिन्हें तत्काल उपचार की नितांत आवश्यकता है।
इसके अलावा लगभग 77 लाख भारतियों को ओपिऑइड्स नशे के लिए शीघ्र इलाज शुरू करने की जरुरत है। आजकल देखा गया है कि वयस्क लोग ही नहीं बल्कि बच्चे भी नशे के रोगी बनते जा रहे हैं। इसकी एक अहम वजह है लोगों के जीवन में स्ट्रेस बहुत बढ़ गया है। कोरोना पान्डेमिक के चलते भी इस स्ट्रेस में बहुत बड़ा इजाफा हुआ है। ऐसे लोगों में आम धारणा बन गई है कि नशा करना स्ट्रेस से जूझने और निपटने का एक आसान तरीका है, मगर यह स्ट्रेस को कम अथवा समाप्त करने का सबसे गलत तरीका है।
नशे की शुरुआत आमतौर पर खुद व्यक्ति की इच्छा से, प्रयोग करने की उत्सुकता, दोस्तों के दबाव, पारिवारिक परेशानियों, काम का स्ट्रेस व अन्य परेशानियों से होने की वजह से होती है। मगर एक बार इससे ग्रसित होने पर यह नशे का रोग बन जाता है। नशे की बीमारी केवल एक आदत, इच्छाशक्ति में कमी या कमज़ोरी का कम होना नहीं बल्कि एक काम्प्लेक्स तरीके की दिमागी बीमारी है। नशे से व्यक्ति के दिमाग में अस्थायी एवं स्थायी बायोकैमिकल बदलाव आते हैं, जिसके लिए इलाज की जरुरत पड़ती है।

नशा ग्रस्त व्यक्ति का दिमाग उसका साथ नहीं दे पाता अथवा वह इस नशे की बीमारी से अपने आप कभी भी बाहर नहीं आ पाता। नशे के रोग से बहुत से लोगों का घर- परिवार खराब हो जाता है और प्रतिवर्ष लाखों लोग अपने जीवन से हाथ धो बैठते हैं। इसके साथ ही पीड़ित व्यक्ति के आर्थिक, सामाजिक जीवन व रोजमर्रा की जिंदगी पर भी इसका बहुत हद तक दुष्प्रभाव पड़ता है। निदेशक प्रोफेसर रवि कांत के निर्देशन में शुरू की गई एटीएफ सर्विस ऐसे लोगों के लिए वरदान साबित हो सकती है और वह फिर से मुख्यधारा से जुड़कर अपने अमूल्य जीवन को संवार सकते हैं।
एम्स निदेशक ने बताया कि रोगियों को नशे की समस्याओं से दूर करने के लिए एम्स ऋषिकेश ने एडिक्शन ट्रीटमेंट फैसिलिटी (ए.टी.एफ.) की शुरुआत की है, जिसमें नशावृत्ति के शिकार रोगियों को परामर्श व उपचार की सभी प्रकार उच्चस्तरीय सुविधाएं नि:शुल्क उपलब्ध कराई जाएंगी। उन्होंने बताया कि संस्थान में इस सुविधा को ए.टी.एफ. एन. डी. डी.टी.सी. एम्स दिल्ली द्वारा समन्वित तथा भारत सरकार के सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय की सहायता से शुरू किया गया है। इस सेवा के शुरू किए जाने का उद्देश्य प्रदेश में नशे से ग्रस्त रोगियों को मुफ्त एवं उच्चस्तरीय उपचार मुहैय्या कराना है। संस्थान के मनोचिकित्सा विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर एवं ए.टी.एफ. के नोडल ऑफिसर डा. विशाल धीमान ने बताया कि एम्स में संचालित ए.टी.एफ के तहत, ओपीडी OPD और एडमिशन (IPD) दोनों तरह से इलाज की सुविधाएं उपलब्ध हैं।
अस्पताल में सभी मरीजों के लिए बिस्तर की सुविधा, सभी प्रकार की आवश्यक दवाएं, अत्याधुनिक उपचार प्रणाली निशुल्क उपलब्ध कराने के साथ ही रोगियों की काउंसलिंग भी की जाएगी। जिसमें उन्हें नशे की तलब को कंट्रोल करने की अलग-अलग तकनीकें बताई जाएंगी, साथ ही रोगियों की मोटिवेशनल इंटरव्यूइंग भी की जाएगी।

नशा छोड़ने के इच्छुक लोग इस नंबर से लें सहायता
संस्थान के मनोचिकित्सा विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर एवं ए.टी.एफ. के नोडल ऑफिसर डा. विशाल धीमान जी ने बताया कि नशा छोड़ने के इच्छुक लोगों के लिए एम्स के मनोचिकित्सा विभाग द्वारा हेल्पलाइन नंबर 7456897874 (टेली-एडिक्शन सर्विस) भी जारी किया गया है, जिसमें सोमवार प्रातः 9:00 बजे से शुक्रवार शाम 4:00 बजे तक और शनिवार सुबह 9:00 बजे से दोपहर 1:00 बजे तक चिकित्सकीय परामर्श लिया जा सकता है। ए.टी.एफ प्रोजेक्ट का उद्देश्य उत्तराखंड और इसके आसपास के क्षेत्रों को नशखोरी के विरुद्ध लोगों को जागरुक करना और इससे ग्रसित रोगियों को मुफ्त इलाज उपलब्ध कराना है, जिससे वह समाज की मुख्यधारा से जुड़कर अपनी उन्नति के साथ सामान्य जीवन जी सकें।

एम्स के विशेषज्ञों की राय, लाॅकडाउन में स्वास्थ्य के प्रति नहीं बरतें लापरवाही

यदि आप कई दिनों तक एक ही मास्क का इस्तेमाल कर रहे हैं, तो सावधान हो जाइये। आपकी यह लापरवाही म्यूकर माइकोसिस से ग्रसित होने की वजह बन सकती है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान एम्स ऋषिकेश ने इस बाबत सलाह दी है कि कोविड19 से सुरक्षा के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले सूती कपड़े के मास्क को दोबारा पहनने से पहले दैनिकतौर से अवश्य धो लें, यह बेहद जरूरी है।

जून और जुलाई के महीने वातावरण में आर्द्रता बहुत कम हो जाती है। ऐसे में जब हम नाक से सांस लेते हैं तो उसके आगे मास्क लगे होने से मास्क के अन्दर की ओर नमी बनी रहती है। मास्क को लगातार पहने रहने से इस नमी में कीटाणु पनपने लगते हैं और जिससे फंगस के लिए अनुकूल वातावरण तैयार हो जाता है। फिर नाक और मुंह से होता हुआ यह फंगस धीरे-धीरे शरीर के अन्य अंगों को संक्रमित कर देता है।

एम्स निदेशक प्रोफेसर रवि कान्त ने बताया कि सूती मास्क हमेशा धुले हुए और साफ-सुथरे पहनने चाहिए। उन्होंने कहा कि यह कोई जरूरी नहीं है कि जिसे कोविड नहीं हुआ हो उसे म्यूकर माइकोसिस नहीं हो सकता। नाॅन डिस्पोजल मास्क को दैनिकतौर से साफ नहीं करने वाले लोगों को भी इस बीमारी का खतरा हो सकता है। उन्होंने बताया कि कोविड और म्यूकर माइकोसिस दोनों ही बीमारियों से तभी बचाव संभव है, जब कोविड गाइडलाइनों का पूर्ण पालन करने के साथ साथ मास्क का सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए। खासतौर से जिन लोगों की इम्युनिटी कमजोर है उन्हें अतिरिक्त सावधानी बरतने की नितांत आवश्यकता है।

कोविड के नोडल अधिकारी डाॅ. पीके पण्डा ने बताया कि लाॅकडाउन के कारण अधिकांश नाॅन कोविड रोगी अपने स्वास्थ्य संबंधी जांचों के प्रति लापरवाह बने हुए हैं। ऐसे में नियमित जांच नहीं कराए जाने से उन्हें अपनी इम्युनिटी और ब्लड में शुगर लेवल की मात्रा का पता नहीं चल पाता। उन्होंने कहा कि म्यूकर माइकोसिस से बचाव के लिए ब्लड में शुगर की मात्रा की रेगुलर जांच कराना जरुरी है। म्यूकर रोगियों के उपचार की सुविधा के बारे में उन्होंने बताया कि ऐसे रोगियों के लिए एम्स में 7 वार्ड बनाए गए हैं। इनमें कुल 185 बेड हैं, जिनमें 65 आईसीयू सुविधा वाले बेड हैं।

म्यूकर माइकोसिस फंगस अक्सर कोविड के लक्षण उभरने के 3 सप्ताह बाद से पनपना शुरू होता है। कमजोर इम्युनिटी और शुगर पेशेंट के लिए यह फंगस सबसे अधिक घातक है। म्यूकर माइकोसिस ट्रीटमेंट टीम के हेड और ईएनटी सर्जन डाॅ. अमित त्यागी का कहना है कि कोविड की दूसरी लहर का पीक टाईम मई का दूसरा सप्ताह था। इस लिहाज से मई अंतिम सप्ताह और जून के पहले सप्ताह तक म्यूकर के मरीजों का ग्राफ तेज गति से बढ़ा था। लेकिन अब इसमें कमी आनी शुरू हो गई है। मई महीने में एम्स में दैनिकतौर पर म्यूकर ग्रसित 7 से 12 पेशेंट आ रहे थे। जबकि अब यह संख्या 4 से 7 प्रतिदिन हो गई है। उन्होंने बताया कि एम्स में अभी तक म्यूकर के कुल 208 पेशेंट आ चुके हैं।

एम्स में आयोजित वेबिनार में बच्चों के बढ़ते मोटापे पर चिंता व्यक्त की गई

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में आयोजित राष्ट्रीय वेबिनार में बच्चों में बढ़ते मोटापे की वृद्धि को रोकने के लिए जंक फूड पैकेजों में चीनी, नमक व वसा के चेतावनी लेवल को दर्शाने की आवश्यकता पर जोर दिया गया।

निदेशक प्रोफेसर रविकांत ने कहा कि इस मामले में ठोस नीति बनाने की नितांत आवश्यकता है। एम्स ऋषिकेश ने वेबिनार के माध्यम से पैकेज फूड्स में चीनी, नमक और वसा के चेतावनी लेवल को दर्शाने के लिए जनजागरुकता मुहिम की शुरुआत की है। विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों में होने वाली मोटापे की वृद्धि स्वास्थ्य की दृष्टि से खतरनाक है। राष्ट्रीय स्तर के इस वेबीनार में देश के विभिन्न मेडिकल संस्थानों के स्वास्थ्य विशेषज्ञों और चिकित्सकों ने प्रतिभाग किया। उन्होंने बताया कि जंक फूड में चीनी, नमक और वसा पर चेतावनी लेबल और इनकी मात्रा का उल्लेख होने से भारत में बच्चों में बढ़ती मोटापे की वृद्धि को रोका जा सकता है। संस्थान के डीन एकेडमिक प्रोफेसर मनोज गुप्ता ने कहा कि चिकित्सक होने के नाते हम सभी को इस समस्या को समझना होगा। इस स्थिति को रोकने के लिए अकेले बच्चे या उनके परिवार वाले ही नहीं बल्कि नीति निर्माताओं, खाद्य उद्योग और चिकित्सकों का सामुहिक कर्तव्य है।

क्लिनिकल एपिडेमियोलॉजी, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ बिलियरी साइंसेज के प्रोफेसर उमेश कपिल का कहना है कि जंक फूड वाले पैकेजों में भारत को नमक, चीनी और संतृप्त वसा के लिए स्पष्ट कट ऑफ स्थापित करने की आवश्यकता है। डब्ल्यूएचओ ने फ्रंट ऑफ पैकेजिंग लेबलिंग (एफओपीएल) को एक नीति के रूप में पहचाना है। इस नीति के लागू होने से बच्चों और उपभोक्ताओं को सूचना के साथ स्वस्थ भोजन का विकल्प चयन करने में मदद मिलेगी। एम्स ऋषिकेश में इस प्रोजेक्ट का संचालन कम्यूनिटी एवं फेमिली मेडिसिन विभाग के एसोशिएट प्रोफेसर डा. प्रदीप अग्रवाल कर रहे हैं।

मुख्यमंत्री तीरथ ने आईडीपीएल ऋषिकेश में 500 बेड के कोविड सेंटर का किया उद्घाटन

कोविड केयर सेंटर में सभी ऑक्सीजन युक्त बेड की सुविधा

100 आईसीयू बेड की भी है व्यवस्था

ब्लैक फंगस के मरीजों और बच्चों के लिए अलग वार्ड की व्यवस्था

मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत ने आईडीपीएल ऋषिकेश में डीआरडीओ द्वारा स्थापित 500 बेड के अस्थाई कोविड केयर सेंटर (राइफलमैन जसवंत सिंह रावत, एम.वी.सी) का उद्घाटन किया। मुख्यमंत्री ने कोविड केयर सेंटर की सभी व्यवस्थाओं का निरीक्षण भी किया।

आधुनिक सुविधायुक्त इस कोविड केयर सेंटर में सभी बेड ऑक्सीजन युक्त हैं। 100 बेड में आईसीयू की व्यवस्था भी है। इसमें म्यूकरमायोसिस (ब्लैक फंगस) के मरीजों एवं बच्चों के लिए भी अलग से वार्ड बनाये गये हैं। बच्चों के वार्ड में स्तनपान कराने वाली माताओं के लिए भी आईसोलेशन एरिया बनाया गया है। मात्र 02 सप्ताह में डीआडीओ द्वारा इसे तैयार किया गया है। इस कोविड केयर सेंटर का क्लीनिकल मैनेजमेंट एम्स ऋषिकेश द्वारा किया जायेगा। मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत ने इस कोविड केयर सेंटर की स्थापना के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एवं रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का आभार व्यक्त किया।

मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत ने कहा कि कोविड पर प्रभावी नियंत्रण के लिए राज्य सरकार द्वारा हर संभव प्रयास किये जा रहे हैं। राज्य में स्वास्थ्य सुविधाओं में तेजी से वृद्धि की गई है। ऑक्सीजन, वेंटिलेटर आईसीयू एवं ऑक्सीजन बेड की पर्याप्त उपलब्धता है। जल्द ही हल्द्वानी में भी 500 बेड का कोविड केयर सेंटर बनकर तैयार हो जायेगा। आई.डी.पी. एल ऋषिकेश में राइफलमैन जसवंत सिंह रावत, एम. वी.सी के नाम से यह कोविड केयर सेंटर बनाया गया। मुख्यमंत्री तीरथ ने कहा कि राइफलमैन जसवंत सिंह रावत ने 1962 भारत-चीन युद्ध में अपने अदम्य साहस का परिचय दिया। इस युद्ध में वे शहीद हो गए थे। पौड़ी के बीरोखाल के बाड्यू पट्टी में जन्मे जसवंत सिंह रावत की वीरता की कहानी आज भी सबको प्रेरणा देती है।

इस अवसर पर विधानसभा अध्यक्ष प्रेमचन्द अग्रवाल, सैनिक कल्याण मंत्री गणेश जोशी, एम्स निदेशक प्रो. रविकान्त, जिलाधिकारी देहरादून डॉ. आशीष श्रीवास्तव, डिप्टी मेडिकल सुप्रिटेंट एम्स ऋषिकेश डॉ. मधुर उनियाल एवं डीआडीओ के अधिकारी उपस्थित थे।

गोपेश्वर में 45.90 लाख की लागत से शुरू हुआ आक्सीजन जनरेशन प्लांट


मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत ने जिला अस्पताल गोपेश्वर में 45.90 लाख लागत से स्थापित 200 एलपीएम ऑक्सीजन जनरेशन प्लांट का वर्चुअल माध्यम से उद्घाटन किया। ऑक्सीजन प्लांट लगने से जिला अस्पताल के सभी बेड तक निर्वाध रूप से ऑक्सीजन की सप्लाई शुरू हो गई है। इस कार्यक्रम में उपस्थित मुख्य अतिथि मा0 राज्य मंत्री डा0 धन सिंह रावत, ब्रदीनाथ विधायक महेन्द्र प्रसाद भट्ट, थराली विधायक मुन्नी देवी शाह, भाजपा जिला अध्यक्ष रघुवीर सिंह बिष्ट एवं अन्य जनप्रतिनिधि ने मुख्यमंत्री का आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर जिलाधिकारी स्वाति एस भदौरिया, पुलिस अधीक्षक यशवंत सिंह चैहान, सीडीओ हंसादत्त पांडे, सीएमओ डा0 एमएस खाती, सीएमएस डा0 जेएस चुफाल, अधिशासी अभियंता आरडब्लूडी अला दिया एवं अन्य वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे।

मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत ने अपने वर्चुअल संबोधन के दौरान स्थानीय विधायकों, जनप्रतिनिधयों, अधिकारियों एवं समस्त जनपद वासियों को बधाई दी। उन्होंने कहा कि कोविड के दृष्टिगत स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर बनाने के लिए सभी संशाधन जुटाए जा रहे है और जहॉ पर जो भी आवश्यकता है उसको पूरा करने का हर संभव प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि जिला अस्पताल में प्लांट शुरू होने से यहां पर भर्ती होने वाले मरीजों को इसका लाभ मिलेगा।

राज्यमंत्री डॉ0 धन सिंह रावत ने मीडिया से बातचीत करते हुए कहा कि सीमांत जनपद चमोली के जिला अस्पताल में 200 एलपीएम क्षमता का प्लांट एक वरदान साबित होगा। उन्होंने कहा कि अब मरीजों को यहां से रेफर करके हायर सेंटर भेजने की जरूरत नही पडेगी। बताया कि कर्णप्रयाग में भी ऑक्सीजन प्लांट स्वीकृत हो गया है और जल्द यहॉ पर भी ऑक्सीजन प्लांट लगाया जाएगा। उन्होंने कहा कि कोविड से निपटने के लिए वैक्सीन की कोई कमी नही है और वैक्सीनेशन का कार्य भी सुचारू ढंग से चल रहा है। राज्यमंत्री ने कहा कि उन्होंने जिले के दर्जनों स्वास्थ्य केन्द्रों का स्वयं निरीक्षण किया है और कही पर भी कोई कमी नही रखी गई है। जहॉ पर जो भी आवश्यकता है उसको पूरा किया जा रहा है। इस महामारी में सरकार जनता के साथ है। जनपद के प्रभारी मंत्री ने कहा कि उन्होंने जिले के आपदा प्रभावित क्षेत्रों का स्थलीय निरीक्षण भी किया है। बताया कि रैणी गांव में आपदा से क्षतिग्रस्त पुल के पुर्ननिर्माण हेतु 6 करोड़ की धनराशि स्वीकृत की गई है और इसके टेडंर भी हो गए है। साथ ही भंग्यूल गांव को जोड़ने के लिए 4 किलोमीटर सड़क भी स्वीकृत की गई है।

सरकारी सेंटरों में 18 वर्ष से अधिक आयु वर्ग को वैक्सीन के लिए आनलाइन रजिस्ट्रेशन की बाध्यता समाप्त

स्वास्थ्य मंत्रालय ने कोरोना की वैक्सीन को लेकर एक बड़ा फैसला किया है। अब 18 से 44 साल के लोग बिना ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन के भी वैक्सीन लगा सकेंगे। ऐसे लोग अब वैक्सीनेशन सेंटर पर भी रजिस्ट्रेशन करा सकेंगे। हालांकि ये सुविधा फिलहाल सिर्फ सरकारी सेंटर पर ही उपलब्ध होगी। प्राइवेट अस्पतालों के सेंटर्स पर अब भी ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन करवा कर वैक्सीन के लिए स्लॉट बुक कराना होगा। बता दें सरकार ने 1 मई से 18-44 साल के लोगों को वैक्सीन लगाने का ऐलान किया था।

सरकार ने पहले वैक्सीनेशन सेंटर पर भीड़ को नियंत्रित करने के लिए ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन जरूरी कर दिया था, लेकिन ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन में दो तरह की परेशानी आ रही थी। पहला ये कि गांव के लोग जिनके पास स्मार्टफोन नहीं थे उन्हें स्लॉट बुक करने में दिक्कतें आ रही थीं। इसके अलावा कई राज्यों से ऐसी खबरें भी आ रही थी कि लोग स्लॉट बुक कराने के बाद भी वैक्सीनेशन के लिए सेंटर पर नहीं पहुंच रहे हैं। लिहाजा ऐसे हालात में वैक्सीन की बर्बादी हो रही थी, लेकिन अब बिना रजिस्ट्रेशन के पहुंचने वाले लोगों को बची हुई वैक्सीन लगाई जाएगी।

मुनिकीरेती के लोगों को पालिका अध्यक्ष रोशन रतूड़ी ने बांटी पैरासिटामोल दवाईंयां

कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल के निर्देश पर नरेंद्रनगर विधानसभा क्षेत्र में कोविड-19 की रोकथाम एवं बचाव हेतु दवाओं एवं अन्य आवश्यक सामग्रियों का वितरण जारी है। इसमें सहयोग करने के लिए नगर पालिका मुनिकीरेती-ढालवाला के अध्यक्ष रोशन रतूड़ी भी आगे आए हैं। इसके तहत रविवार को उन्होंने एक लाख पैरासिटामोल की दवाइयों का सहयोग दिया है।

देहरादून स्थित आवास में कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल ने बताया कि नरेंद्रनगर विधानसभा में दवाइयों के वितरण का जिम्मा तहसीलदार को सौंपा गया है। इस दौरान उन्होंने कोविड-19 से सुरक्षा एवं बचाव हेतु किए जा रहे पालिका के सेनेटाइज एवं साफ-सफाई के कार्यों की प्रशंसा की। साथ ही उन्होंने प्रदेश की जनता से कोविड-19 के संक्रमण लक्षणों के दिखने पर आरटीपीसीआर टेस्ट अवश्य करवाने की अपील भी की। पालिकाध्यक्ष रोशन रतूड़ी ने बताया कि महामारी में वह लगातार लोगों को मानसिक रूप से मजबूत करने का काम कर रहे हैं। कहा कि मुनिकीरेती के ऋषिलोक कोविड केयर सेंटर में कोविड-19 से संक्रमित मरीजों का ईलाज के संग हौसला बढ़ाया जा रहा है। इस कारण यहां से अधिकांश संक्रमित मरीज स्वस्थ होकर अपने घर जा चुके हैं। कहा कि सकारात्मक सोच और आपसी सहयोग से ही इस महामारी से जीता जा सकता है।