योगी और त्रिवेन्द्र के पैतृक गांव से लागू होगी चकबंदी

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के पैतृक गांव खैरासैंण और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के पैतृक गांव पंचूर में सबसे पहले चकबंदी की जाएगी। इसके लिए राजस्व विभाग ने दोनों गांवों में चकबंदी के लिए पड़ताल की प्रक्रिया पूरी कर ली है। वहीं, पौड़ी जनपद के कुछ गांवों में चकबंदी की अनुमति दी गई है।
राजस्व विभाग के अपर सचिव एसएस बल्दिया ने बताया कि चकबंदी एवं भूमि व्यवस्था अधिनियम -2018 की नियमावली में संशोधन की तैयार चल रही है। ताकि 20 किसान भी चकबंदी के लिए तैयार होते हैं तो सरकार उसे कानूनी रूप से मंजूरी देगी। दरअसल, पहाड़ों में क्लस्टर खेती के जरिये किसानों की आय बढ़ाने के लिए सरकार का चकबंदी पर फोकस है। इसकी शुरुआत खैरासैंण और पंचूर गांव से की गई है। राजस्व विभाग की टीम ने दोनों गांवों में किसानों की सहमति से चकबंदी के लिए कृषि भूमि की पड़ताल पूरी कर ली है।
वहीं, पौड़ी के तंगोली और बीरोंखाल में चकबंदी की अनुमति दे दी गई है। प्रदेश सरकार किसानों को भी चकबंदी के प्रति जागरूक करेगी। इसके लिए चकबंदी पर डॉक्यूमेंट्री तैयार कर पंचायतों को दी जाएगी।

पहाड़ों में बिना चकबंदी के संभव नहीं है दोगुनी आय
प्रदेश सरकार ने 2022 तक किसानों की दोगुनी आय करने का संकल्प लिया है, लेकिन पहाड़ों में बिखरी कृषि जोत पर किसानों की आय बढ़ाना संभव नहीं है। इसके लिए सरकार का चकबंदी पर फोकस है। जिससे किसान एक ही जगह पर क्लस्टर खेती अपनाकर फसलों की पैदावार को बढ़ा सकें। चकबंदी से किसान को कृषि कार्य पर कम मेहनत करनी पड़ेगी और फसलों की देखभाल भी अच्छी तरह से हो सकेगी।

प्रतिवर्ष लगभग डेढ़ हजार भर्ती वाला कोस्टगार्ड भर्ती सेंटर का हुआ शिलान्यास

मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने शुक्रवार को कुंआवाला (हर्रावाला) में कोस्ट गार्ड भर्ती सेंटर का शिलान्यास व भूमि पूजन किया। इस भर्ती केन्द्र के लिए भारत सरकार से 17 करोड़ रूपये भूमि के लिए व 25 करोड़ रूपये भवन निर्माण के लिए स्वीकृति मिल चुकी है। इस भर्ती केन्द्र के लिए पूरा खर्चा भारत सरकार वहन करेगी। यह भर्ती केन्द्र ड़ेढ़ वर्ष में बनकर तैयार हो जायेगा। यह भर्ती केन्द्र केन्द्र चार राज्यों उत्तराखण्ड, उत्तर प्रदेश, हिमांचल प्रदेश और हरियाणा के लिए बनाया जा रहा है।

मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने कहा कि उत्तराखण्ड में कोस्टगार्ड भर्ती केन्द्र खुलने से प्रदेश के युवाओं को कोस्टगार्ड में रोजगार के अच्छे अवसर मिलेंगे। थलसेना, वायुसेना व नौसेना के भर्ती केन्द्र उत्तराखण्ड में पहले से ही हैं। कोस्टगार्ड भर्ती केन्द्र खुलने से राज्य के युवाओं को तटरक्षक बल में करियर बनाने का सुनहरा अवसर मिलेगा। मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र ने कहा कि यह रैबार कार्यक्रम का प्रतिफल है कि उत्तराखण्ड में कोस्टगार्ड का भर्ती सेंटर खुलने जा रहा है, जबकि देहरादून में देश का पहला ड्रोन एप्लिकेशन रिसर्च सेंटर खुल चुका है। उत्तराखण्ड में पांचवे धाम के रूप में सैन्यधाम को विकसित करने के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के संकल्प की दिशा में यह एक बड़ी पहल है।

मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र ने कहा कि देहरादून में जल्द ही भव्य शौर्य स्थल (सैन्यधाम) बनाया जायेगा। इसके लिए देहरादून में 70 बीघा जमीन का चयन कर लिया गया है। यह शौर्य स्थल सबके लिए प्रेरणा का केन्द्र बनेगा। मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र ने कहा कि रानीपोखरी में नेशनल लॉ युनिवर्सिटी बन रही है। इससे प्रदेश के युवाओं को विधि की पढ़ाई के साथ-साथ कानून के क्षेत्र में कार्य करने का सुनहरा अवसर मिलेगा। पर्यटन को बढ़ावा देने राज्य सरकार की शीर्ष प्राथमिकताओं में है। राज्य में अधिक से अधिक पर्यटक आयें इसके लिए हवाई सेवाओं को विस्तार दिया जा रहा है। जॉलीग्रांट एयरपोर्ट का विस्तार किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि पर्यटन के क्षेत्र में रोजगार के अनेक अवसर हैं। देश का 23वां सीपैट संस्थान डोईवाला में खोला गया है। सीपैट एक ऐसा संस्थान हैं, जिसमें कोर्स करने से रोजगार की बहुत प्रबल संभावनाएं हैं। इसमें जल्द ही डिप्लोमा व डिग्री कोर्स भी शुरू किये जायेंगे।

महानिदेशक कोस्टगार्ड राजेन्द्र सिंह ने कहा कि गत वर्ष मुख्यमंत्री आवास में रैबार कार्यक्रम में प्रदेश की बड़ी हस्तियों का जो मंथन हुआ। उसके सुखद परिणाम आज हम सबके सामने हैं। डीजी कोस्टगार्ड ने कहा कि देवभूमि उत्तराखण्ड का वासी होने के नाते मेरे मन में उत्तराखण्ड के युवाओं के लिए कुछ करने की तमन्ना थी। उत्तराखण्ड में कोस्टगार्ड का भर्ती सेंटर हो यह मुख्यमंत्री का ख्वाब था और मेरी ख्वाईश थी जिसका परिणाम है कि आज मंजिल हमारे सामने है। उन्होंने कहा कि यह भर्ती केन्द्र लगभग डेढ़ साल में बनकर तैयार हो जायेगा। कोस्टगार्ड द्वारा एसडीआरएफ को आपदा से बचाव राहत कार्यों का प्रशिक्षण भी दिया जायेगा। उन्होंने कहा कि भारत की कोस्टगार्ड विश्व की चौथी सबसे बड़ी कोस्टगार्ड है। काम के मामले में आज भी सबसे आगे है। उन्होंने इस भर्ती केन्द्र के लिए अपेक्षित भूमि आवंटन करने पर मुख्यमंत्री का आभार भी जताया।

2020 तक देहरादून को सीएनजी उपलब्ध कराना लक्ष्यः टीएस रावत

मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने मंगलवार मिशन स्थापना दिवस के अवसर पर विभिन्न फर्मों को कई कार्यों के कार्यादेश एवं स्मार्ट कार्ड वितरित किये। उन्होंने कहा कि देहरादून शहर की बढ़ती आबादी के दवाब को कम करने के लिये नये देहरादून की परिकल्पना को साकार किया जायेगा। इसके लिये लगभग 4 हजार हेक्टियर क्षेत्र का लैण्ड बैंक बनाने के प्रयास किये जायेंगे। उन्होंने कहा कि स्मार्ट नागरिकों के बिना स्मार्ट शहर की कल्पना नही की जा सकती है। देहरादून को स्मार्ट शहर बनाने के लिये प्रबुद्धजनो व नागरिको को भी सहयोगी बनना होगा। उन्होंने कहा कि देहरादून स्मार्ट शहर के रूप में शीघ्र ही नये क्लेवर में दिखाई देगा।

मुख्यमंत्री ने कहा कि देहरादून का नया स्वरूप प्रदान करने के साथ ही यहां के नागरिकों को सभी आवश्यक सुविधाये उपलब्ध कराने का हमारा प्रयास है। 2020 के अन्त तक देहरादून को सीएनजी उपलब्ध हो जायेगा। बरसात के बाद सौंग बांध का कार्य आरम्भ हो जायेगा इससे देहरादून को ग्रेविटी आधारित पेयजल उपलब्ध होगा तथा इससे लगभग 92 करोड़ की बिजली की बजत होगी। उन्होंने कहा कि रिस्पना को ऋषिपर्णा के स्वरूप में लाने के भी प्रयास तेजी से किये जा रहे हैं।

मुख्यमंत्री ने कहा कि स्मार्ट सिटी के अन्दर स्थापित होने वाले स्मार्ट डाटा सेन्टर तथा स्मार्ट कमाण्ड कन्ट्रोल सेन्टर से देहरादून के साथ ही हरिद्वार में आयोजित होने वाले महाकुम्भ के आयोजन में भी मदद मिलेगी।

मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री की स्मार्ट सिटी परियोजना को मूर्त रूप देने में राज्य सरकार तथा देहरादून स्मार्ट सिटी द्वारा सभी सम्भव प्रयास किये जायेंगे। देहरादून स्मार्ट सिटी द्वारा अपने 87 प्रतिशत कार्यों को मूर्त रूप देने कि तैयारी शुरू कर दी गई है।

स्मार्ट सिटी प्लान के तहत कार्यों की प्रगति की जानकारी देते हुए मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ आशीष श्रीवास्तव ने बताया कि स्मार्ट रोड परियोजना के क्रियान्वयन के लिए इस कार्य में दक्ष भारत सरकार की कार्यदायी संस्था ब्रिज एण्ड रूफ लिमिटेड को कार्य आवंटित कर दिया गया है। एकीकृत कमाण्ड एण्ड कण्ट्रोल सेन्टर के क्रियान्वयन के लिए मै0 एच0पी0 लिमिटेड का चयन कर लिया गया है।

उन्होंने कहा कि अभी तक स्मार्ट सिटी मिशन के अन्तर्गत कुल 484.76 करोड़ रूपए लागत की परियोजनाओं के कार्यादेश जारी किये जा चुकें हैं। इनमें स्मार्ट रोड लागत 57.49 करोड रूपए, ड्रेनेज लागत 37.99 करोड़ रूपए, मल्टीयूटीलिटी डक्ट लागत 64.33 करोड रूपए, स्मार्ट रोड़ के किनारे पेयजल पाइप लाईन लागत 9.96 करोड रूपए, स्मार्ट रोड़ के किनारे सीवर लाईन लागत 20.77 करोड रूपए, एकीकृत कमाण्ड एंड कण्ट्रोल सेन्टर लागत 199.78 करोड रूपए, आई०टी०एम०एस लागत 50 करोड रूपए, सिटी साइनेज लागत 18 करोड रूपए, स्मार्ट बिन्स तथा स्मार्ट वैस्ट गाड़ियां लागत 9.34 करोड रूपए, पापीपी मोड पर वाटर एटीएम लागत 1.98 करोड़ रूपए, स्मार्ट टॉयलेट लागत 2.07 करोड रूपए, स्मार्ट स्कूल्स लागत 6.05 करोड़ रूपए, एमडीडीए पार्क का सौन्दर्यकरण लागत 7 करोड रूपए शामिल हैं।

उन्होंने बताया कि इसके अतिरिक्त 331.20 करोड़ रूपए की विभिन्न महत्वपूर्ण परियोजनाओं की डीपीआर की स्वीकृति प्रदान की गई है। इनमें इलेक्ट्रिक बस लागत 41.56 करोड रूपए, इण्टरैक्टिव बस स्टॉप्स लागत 15.72 करोड़ रूपए, परेड ग्राउंड विकास योजना लागत 23.63 करोड़ रूपए,. पल्टन बाजार पैदल मार्ग का विकास लागत 13.82 करोड़ रूपए, एकीकृत ऑफिस ग्रीन बिल्डिंग लागत 204.46 करोड रूपए, सचिवालय में शिशु पालन केंद्र लागत 0.90 करोड रूपए, एबीडी क्षेत्र में पेयजल संवर्धन योजना लागत 24.11 करोड़ रूपए व राजपुर रोड का सौन्दर्यीकरण लागत 7 करोड़ रूपए शामिल हैं। इस प्रकार कुल लागत रू0 484.76 करोड के कार्यादेश दिये जा चुके हैं। जबकि कुल 331.2 करोड की डीपीआर को स्वीकृत किया जा चुका है। इस प्रकार देहरादून स्मार्ट सिटी के अंतर्गत 800 करोड़ से अधिक के कार्य जल्द ही प्रारम्भ कर दिए जाएंगे।

इस शैक्षणिक सत्र से निजी स्कूलों ने अधिक फीस वसूली तो दंड का भी होगा प्रावधान

राज्य के निजी स्कूलों में फीस निर्धारण के लिए सरकार ने उत्तराखंड सेल्फ फाईनेंस्ड इंडिपेंडेंट स्कूल (रेग्युलेशन ऑफ फीस) एक्ट तैयार कर लिया है। इसके तहत राज्य सरकार प्री-प्राइमरी से लेकर सीनियर सेंकेंडरी की कक्षाओं का अधिकतम शुल्क निर्धारित होगा। हर जिले में फीस निर्धारण के लिए जिलाधिकारी की अध्यक्षता में छह सदस्य समिति बनाई जाएगी। यह समिति फीस को लेकर स्कूलों की आपत्तियों का निस्तारण करेगी। इस समिति का कार्यकाल दो वर्ष का रहेगा। इसके निर्णयों के विरुद्ध राज्य स्तरीय अपीलीय प्राधिकरण में जा सकता है। छह सदस्य प्राधिकरण सचिव विद्यालयी शिक्षा की अध्यक्षता में गठित किया जाएगा। इस एक्ट में अधिक फीस वसूलने की शिकायत पर दंड का भी प्रावधान किया गया है। इस एक्ट को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए शिक्षा मंत्री ने सभी से सुझाव आमंत्रित किए हैं। इसके बाद इसे अमली जामा पहनाते हुए कैबिनेट में लाया जाएगा।

सचिवालय में शिक्षा मंत्री अरविंद पांडेय ने बुधवार को शिक्षा विभाग की समीक्षा बैठक में फीस एक्ट के संबंध में अधिकारियों के साथ चर्चा की। फीस एक्ट के संबंध में जानकारी देते हुए शिक्षा मंत्री ने बताया कि फीस एक्ट को अगले शैक्षणिक सत्र से लागू कराने की तैयारी है। इसके लिए खाका तैयार कर लिया गया है। इसके तहत स्कूलों में फीस का निर्धारण सरकार करेगी। जो भी विद्यालय इससे असहमत होंगे वे सत्र प्रारंभ होने से तीन माह पूर्व तक शुल्क निर्धारण के संबंध में अपना प्रत्यावेदन जनपद स्तर पर गठित फीस नियंत्रण समिति को देंगे। यह समिति आवेदन प्राप्त होने के बाद शुल्क का पुनर्निर्धारण करेगी। समिति अनियमितताओं की शिकायत का भी निस्तारण करेगी। जनपद स्तरीय समिति के निर्णय के विरुद्ध राज्य स्तरीय विनियामक प्राधिकरण में अपील दायर की जा सकेगी। यह प्राधिकरण एक सप्ताह के भीतर प्रकरण को निस्तारित करेंगे। सत्र शुरू होने से पहले सभी स्कूल अपनी फीस का विवरण वेबसाइट पर अनिवार्य रूप से प्रकाशित करेंगे।

इन बिंदुओं पर रहेगा फोकस
– कोई भी स्कूल एडवांस के रूप में फीस की वसूली नहीं कर सकेंगे।

– कोई भी स्कूल अपने परिसर में व्यावसायिक गतिविधि नहीं करेंगे यानी ड्रेस और किताब कॉपी नहीं बेच सकेंगे।

– कोई भी स्कूल बिना जिला स्तरीय समिति के अनुमोदन के ड्रेस में कोई बदलाव नहीं कर सकेंगे।

दंड का प्रावधान

एक्ट में अधिक फीस वसूले जाने की स्थिति में दंड का भी प्रावधान किया गया है। इसके तहत पहली बार शिकायत सही पाए जाने पर एक लाख रुपये, दूसरी बार शिकायत सही पाए जाने पर पांच लाख रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा। तीसरी बार शिकायत सही पाए जाने पर मान्यता समाप्ति अथवा अनापत्ति वापस लेने की कार्यवाही की जाएगी।

जनपद स्तरीय फीस नियंत्रण समिति
जिलाधिकारी, मुख्य शिक्षा अधिकारी, जिलाधिकारी द्वारा नामित चार्टेड अकाउंटेंट, लोक निर्माण विभाग का अधिशासी अभियंता, जिलाधिकारी द्वारा नामित कोई अभिभावक, जिलाधिकारी द्वारा नामित किसी विद्यालय का प्रबंधक व प्रधानाचार्य

राज्य विनियामक प्राधिकरण
सचिव, विद्यालयी शिक्षा, शिक्षा निदेशक, शिक्षा सचिव द्वारा नामित चार्टेड अकाउंटेंट, लोक निर्माण विभाग का अभियंता, सचिव द्वारा नामित अभिभावक और सचिव द्वारा नामित किसी विद्यालय का प्रबंधक व प्रधानाचार्य।

राज्य सरकार ड्रोन का इस्तेमाल इन कार्यों को करने में लगा सकती है, जानिए

सब कुछ ठीक रहा तो जल्द ही राज्य सरकार प्रदेश में ड्रोन कैमरों का प्रयोग स्वास्थ्य, प्राकृतिक आपदा, कृषि, खनन क्षेत्र में कर सकती हैं। इसके लिए व्यापक स्तर पर रणनीति तैयारियां चल रही है। अभी तक ड्रोन के माध्यम से कम समय में दवाईयां और जांच के लिए सैंपल भेजने का सफल ट्रायल हो चुका है।
प्रदेश में ड्रोन का निर्माण और तकनीक को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने फरवरी 2019 में पहली बार ड्रोन फेस्टिवल का आयोजन किया। सरकार का मानना है कि ड्रोन तकनीक से समय और मैनपावर में कमी आएगी।

आपदा प्रबंधन के साथ ही स्वास्थ्य, कृषि, खनन, वन सेक्टर में ड्रोन का इस्तेमाल कर सकते हैं। हाल ही में सूचना एवं प्रौद्योगिक विकास प्राधिकरण (आईटीडीए) की अनुमति से ड्रोन से दवाईयां और सैंपल पहुंचाने का ट्रायल कामयाब रहा। 18 मिनट के भीतर ही ड्रोन से 36 किलोमीटर दूर ब्लड सैंपल पहुंचाया गया।

जबकि वाहन से आमतौर पर एक से डेढ़ घंटे का समय लगता है। आईटीडीए विभिन्न विभागों के साथ मिल कर ड्रोन तकनीक को धरातल पर पहुंचाने के लिए रणनीति बना रहा है। सरकार प्रदेश में ड्रोन मैन्युफैक्चरिंग और तकनीक इस्तेमाल के लिए पॉलिसी बनाने पर विचार कर रही है।
आईटीडीए के वरिष्ठ कार्यक्रम अधिकारी आलोक तोमर का ने बताया कि स्वास्थ्य, खनन, कृषि, आपदा प्रबंधन समेत अन्य क्षेत्रों में ड्रोन तकनीक को धरातल पर उतारने के लिए रणनीति बनाई जा रही है।

आईटीडीए ने प्रदेश के राजकीय पॉलिटेक्नीक में पढ़ रहे 70 छात्रों को ड्रोन को उड़ाने की प्रशिक्षण दिया है, जिसमें 24 छात्राएं हैं। आईटीडीए प्रशिक्षण कार्यक्रम के माध्यम से छात्रों को ड्रोन तकनीक के लिए प्रोत्साहित कर रहा है।

कृषि क्षेत्र में ओलावृष्टि, सूखे या बीमारी लगने से फसलों को नुकसान होता है तो ड्रोन से कम समय में इसका आकलन किया जाएगा। ड्रोन पर लगे कैमरों के जरिये से प्रभावित इलाकों में सर्वे कर स्थिति का जायजा लिया जाएगा। अभी तक लेखपाल व राजस्व कानूनगो के माध्यम से फसलों का आकलन किया जाता है, जिसमें लंबा समय लगता है।

खनन क्षेत्र में प्रदेश के नदी, नालों में अवैध खनन रोकने में ड्रोन का इस्तेमाल किया जाएगा। ड्रोन से यह पता लग सकेगा कि किस क्षेत्र में माफिया खनन कर रहे हैं। ड्रोन काफी ऊंचाई से खनन की तस्वीरें विभाग को उपलब्ध करा देगा, जिससे कार्रवाई में आसानी होगी।

स्वास्थ्य क्षेत्र में आपातकालीन स्थिति में किसी मरीज का ब्लड सैंपल या जरूरत दवाईयां भी ड्रोन के जरिये पहुंचाई जा सकेगी। ड्रोन में पांच किलोग्राम भार तक सामान ले सकते हैं। देहरादून और टिहरी में अभी हाल में स्वास्थ्य सेवाओं में ड्रोन तकनीक का प्रयोग सफल रहा।

आपदा प्रबंधन क्षेत्र में प्राकृतिक आपदा की दृष्टि से उत्तराखंड संवेदनशील है। आपदा घटने पर तत्काल प्रभावित क्षेत्र का सर्वे ड्रोन से किया जा सकेगा। क्योंकि आपदा में सड़क मार्ग, कनेक्टिविटी की सुविधा ठप होने से कई बार बचाव दल को मौके पर पहुंचने पर समय लगता है। ऐसे में प्रभावित क्षेत्रों में हालात का पता ड्रोन से कुछ ही समय में लगेगा।

सीएनजी स्टेशनों की स्थापना से सीएनजी वाहनों की संख्या में होगी बढ़ोतरी

मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने शुक्रवार को गेल इंडिया लिमिटेड के अधिकारियों के साथ नेचुरल गैस पाइप लाईन व सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन प्रोजक्ट की जानकारी ली। उन्होंने अधिकारियों से कहा कि नेचुरल गैस पाइप लाईन के विस्तार में यह ध्यान रखा जाए कि इससे देहरादून, हरिद्वार व ऋषिकेश के शहर व उसके आस पास के गांव भी पूर्ण रूप से कवर हो जाए। उन्होंने कहा कि इससे लोगों को रोजगार सृजन हो सकता इसका भी पूरा आकलन किया जाए। मुख्यमंत्री ने कहा कि इस परियोजना की प्रत्येक तीन माह में समीक्षा की जायेगी।

मुख्यमंत्री ने कहा कि गैस पाइप लाईन से लोगों को काफी सुविधा होगी जबकि सीएनजी स्टेशनों की स्थापना से सीएनजी वाहनों की संख्या भी बढ़ेगी तथा इससे वाहनों से होने वाले प्रदूषण से भी दूनवासियों का छुटकारा मिल सकेगा। मुख्यमंत्री ने कहा कि देहरादून में वाहनों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। राज्य के मैदानी क्षेत्रों में आबादी का दबाव निरन्तर बढ़ रहा है। उसी क्रम में आगे भी वाहनों एवं आबादी का दबाव बना रहेगा, इसका बेहतर रास्ता सीएनजी ही है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रदेश में हरिद्वार, ऊधम सिंह नगर तथा देहरादून के बाद नैनीताल के साथ ही अन्य स्थानों में भी गैस पाइप लाइन का कार्य आरम्भ किया जाए। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री ने देश को गैस ईंधन के रूप में इस्तेमाल करने पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि गैस ईंधन कम खर्चीला तथा इको फ्रेन्डली है।

बैठक में अधिकारियों द्वारा मुख्यमंत्री को अवगत कराया गया कि हरिद्वार-ऋषिकेश-देहरादून पाइपलाईन प्रोजेक्ट (एचआरडीपीएल) के तहत 1500 करोड़ रूपये की लागत से 3 लाख पीएनजी कनेकक्शन दिये जायेंगे व 50 सीएनजी स्टेशन बनाये जायेंगे। इससे मुख्यतः ऋषिकेश, डोईवाला, विकासनगर, देहरादून, चकराता कालसी व त्यूनी क्षेत्र लाभान्वित होंगे। एचआरडीपीएल प्रोजेक्ट के तहत टेंडर व जियोटेक्निकल, टोपोग्राफिकल एवं हाइड्रोलॉजिकल का कार्य गतिमान है।

देहरादून सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन गैस प्रोजक्ट के तहत चकराता, देहरादून, डोईवाला, कालसी, ऋषिकेश, त्यूनी व विकासनगर का लगभग 3088 वर्ग किमी क्षेत्र आच्छादित किया जायेगा, जिसकी लागत 1696 करोड़ रूपये है। इसकी डीपीआर स्वीकृत की जा चुकी है। इसके लिये अधिकारियों की नियुक्ति भी की गई है। शीघ्र ही इस योजना का कार्य आरम्भ कर दिया जाएगा।

जानिए कैसा था पंत का जीवन, क्यों हर किसी की यादों में जिंदा है प्रकाश पंत

प्रकाश पंत के बारे में अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि फार्मासिस्ट होने के बावजूद उन्होंने वित्त, संसदीय व विधायी कार्यों में महारथ हासिल की। वित्त विशेषज्ञ के तौर पर जीएसटी काउंसिल में उन्हें और उनके सुझावों को भरपूर तवज्जो दी गई। कहते हैं पूत के पांव पालने में ही दिख जाते हैं। ये पंक्तियां कैबिनेट मंत्री प्रकाश पंत पर सटीक बैठती हैं।
1977 में छात्र राजनीति में वह सक्रिय हुए और सैन्य विज्ञान परिषद में महासचिव चुने गए। पेशे से फार्मासिस्ट पंत ने 1984 में सरकारी सेवा को त्याग कर समाजसेवा के लिए सियासत का रास्ता चुना। 1988 में नगर पालिका परिषद पिथौरागढ़ के सदस्य चुने जाने के बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। अविभाजित उत्तर प्रदेश में 1998 में वह विधान परिषद के सदस्य चुने गए और वहां भी अपने सवालों के जरिये छाप छोड़ी।
9 नवंबर 2000 को उत्तराखंड राज्य का जन्म हुआ तो उन्हें अंतरिम विधानसभा के स्पीकर की जिम्मेदारी सौंपी गई। इस दौरान उन्होंने अपने संसदीय ज्ञान और विधायी कौशल का बखूबी परिचय दिया। 2007 में भाजपा की सरकार में पंत संसदीय कार्य, विधायी, पेयजल, श्रम, निर्वाचन, पुनर्गठन व बाह्य सहायतित परियोजनाएं मंत्री के तौर पर अपनी जिम्मेदारी को बखूबी निभाया।
इस दौरान भी उनके संसदीय ज्ञान और विधायी कौशल को हर किसी ने सराहा। भाजपा की मौजूदा सरकार में भी वह कैबिनेट मंत्री के रूप में संसदीय कार्य, विधायी, भाषा वित्त, आबकारी, पेयजल एवं स्वच्छता, गन्ना विकास एवं चीनी उद्योग का दायित्व देख रहे थे। इस कार्यकाल में तो वह वित्त के विशेषज्ञ के तौर पर उभरे, तो हर मोर्चे पर सरकार को संभालते भी आए। वित्त में उनकी महारथ को जीएसटी काउंसिल ने भी सराहा। काउंसिल में पंत को भरपूर तवज्जो दी गई और वित्त मंत्रियों के समूह में उन्हें भी शामिल किया गया। वित्त पर अपनी मजबूत पकड़ के साथ ही जीएसटी की बारीकियों की जानकारी के बूते उन्होंने कई सुझाव काउंसिल को दिए।
जीएसटी रिटर्न दाखिल करने के मद्देनजर वार्षिक टर्नओवर की सीमा से संबंधित मसले को सुलझाने में उनकी अहम भूमिका रही। यही नहीं, जीएसटी के फायदों के बारे में व्यापारियों व कारोबारियों को समझाने और उनकी दिक्कतों को हल करने के चलते वह व्यापार व कारोबारी जगत से जुड़े लोगों में खासे लोकप्रिय थे। उनके संसदीय ज्ञान और विधायी कौशल का हर कोई मुरीद था। सत्ता पक्ष भी और विपक्ष भी। जब कभी सरकार किसी विषय पर कहीं भी उलझी तो उसे निकालने में वह संकटमोचक बनकर उभरे। प्रदेश हित को उन्होंने सर्वोपरि रखा और इसके लिए सदन और सदन के बाहर संघर्ष किया। मौजूदा विधानसभा के अध्यक्ष प्रेमचंद अग्रवाल कहते हैं कि उन्हें व्यक्तिगत रूप से कैबिनेट मंत्री पंत का सहयोग मिलता रहा। उनके संसदीय ज्ञान को हमेशा याद रखा जाएगा।

चला गया उत्तराखंड की सियासत का महारथी

काबीना मंत्री प्रकाश पंत यानी मृदु व्यवहार, बेहद सरल, सौम्य और मुस्कराता चेहरा। पक्ष हो या विपक्ष समेत तमाम सियासी दलों के विधायक हों या अन्य नेता सभी को दलगत राजनीति से ऊपर उठकर सहयोग करने को हमेशा प्रकाश पंत तत्पर रहे। महज 59 साल की आयु में उत्तराखंड की सियासत का ये अजातशत्रु एकाएक गंभीर बीमारी के चंगुल में फंसकर सभी को छोड़कर चला गया। सत्तारूढ़ दल भाजपा के साथ ही विपक्षी दलों ने भी उनके निधन को राज्य के लिए सदमा बताया है। पंत की शख्सियत को बयां करते हुए कांग्रेस विधायक काजी निजामुद्दीन कहते हैं कि वह मेरे गुरु रहे हैं। मेरे पिता काजी मोईनुद्दीन भी उनका बहुत आदर करते थे। अलग उत्तराखंड राज्य बनने के बाद से ही प्रकाश पंत राज्य में भाजपा की सियासत का अहम हिस्सा रहे।

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पंत के सपनों को अब कौन लगायेगा पंख!

प्रदेश भाजपा के दिग्गजों में शुमार होने के बावजूद प्रकाश पंत ने पार्टी के भीतर भी और बाहर विपक्षी दलों के साथ भी राजनीतिक द्वेष-विदेश से दूरी बनाए रखी। भाजपा की वर्ष 2007 में बगैर बहुमत के सत्ता में वापसी के दौरान राजनीतिक अनिश्चितता के दौर रहा हो या वर्ष 2017 में भाजपा को प्रचंड बहुमत मिलने के दौरान मुख्यमंत्री पद के लिए भी उनका नाम उछला, लेकिन पंत ने खुद को पद के विवाद से भी दूर रखा।
उनके इस व्यवहार को भी पार्टी के भीतर सम्मान की नजर से देखा जाता रहा है। पंत की खासियत ये भी रही कि उन्होंने मेहनत से जुटाए ज्ञान को बांटने में दलीय आग्रह को दूर रखा। इस वजह से विपक्षी दलों के विधायक भी उनके प्रशंसक रहे। पहले स्पीकर और फिर विधायी व संसदीय कार्यमंत्री रहते हुए विधायी ज्ञान में जो महारत हासिल की, उसे सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों के विधायकों से भी उन्होंने साझा किया। इसी वजह से कांग्रेस के विधायक काजी निजामुद्दीन उनके निधन को संसदीय लोकतंत्र के लिए गहरा आघात करार दिया। उन्होंने कहा कि पंत के सानिध्य में घंटों बैठकर उन्होंने विधायी ज्ञान हासिल किया। उनके पिता व अंतरिम सरकार में विधायक रहे काजी मोईनुद्दीन ने पंत को खास इज्जत दी। उनके कहने पर ही उन्होंने प्रकाश पंत से बतौर गुरु संसदीय ज्ञान हासिल किया।
पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष किशोर उपाध्याय ने भावुक टिप्पणी की कि प्रकाश पंत के निधन की खबर ने तन-मन दोनों को तोड़कर रख दिया। उत्तराखंड की राजनीति का अजातशत्रु चला गया। परिजनों व तुम्हारे चाहने वालों के लिए सांत्वना के शब्द ढूंढकर भी नहीं मिल पा रहे हैं।

उत्कृष्ट विधायक चुने गए थे प्रकाश पंत
काबीना मंत्री प्रकाश पंत को वर्ष 2008 में उत्कृष्ट विधायक के पुरस्कार से भी नवाजा गया था। उत्कृष्ट विधायक पुरस्कार की शुरुआत उक्त वर्ष से हुई थी। गंभीर बीमारी के चलते काबीना मंत्री प्रकाश पंत के असामयिक निधन से उत्तराखंड की सियासत में लंबे समय तक रिक्तता महसूस की जाएगी। उत्तराखंड राज्य बनने के बाद अंतरिम सरकार के पहले स्पीकर रहने के बाद उन्हें भाजपा की सरकारों में सात वर्ष तक विधायी एवं संसदीय कार्यमंत्री रहने का मौका मिला। वर्ष 2007 में प्रदेश की भाजपा सरकार और फिर 2017 में वर्तमान भाजपा सरकार में वह विधायी एवं संसदीय कार्यमंत्री की जिम्मेदारी संभाले हुए थे। उत्तराखंड में अभी तक यह जिम्मेदारी सबसे ज्यादा संभालने का रिकार्ड उन्हीं के नाम है। उन्होंने लगातार दूसरी बार वित्त मंत्री का प्रभार भी संभाला।

राष्ट्रीय खिलाड़ी के रूप में याद रहेंगे पंत
कैबिनेट में वित्त मंत्री प्रकाश पंत राष्ट्रीय स्तर के निशानेबाज भी थे। पंत ने कई राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में प्रतिभाग कर मेडल प्राप्त किए हैं। निशानेबाजी के शौकीन पंत अपने व्यस्त कार्यक्रम में से भी शूटिंग के लिए समय निकाल ही लेते थे। उत्तराखंड के लोकप्रिय नेता प्रकाश पंत का बुधवार को गंभीर बीमारी के चलते निधन हो गया। राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाने वाले प्रकाश पंत राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी भी थे। पंत ने वर्ष 2004 में कोयम्बटूर में हुई जीबी मावलंकर शूटिंग प्रतियोगिता में लक्ष्य को सटीक भेदते हुए रजत पदक पर निशाना लगाया था।
इस प्रतियोगिता में प्रकाश पंत ने वेटरन वर्ग में एमपी-एमएलए कोटे से प्रतिभाग किया था। इसके अलावा 2004 में ही देहरादून में हुई राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में पंत ने स्वर्ण पदक पर निशाना साधा था। उत्तरांचल राज्य रायफल संघ के महासचिव शूटर सुभाष राणा ने बताया कि संघ द्वारा आयोजित प्रतियोगिताओं में वह लगातार हिस्सा लेते रहते थे। इसके अलावा जब भी वह फ्री रहते थे, ऐकेडमी में निशानेबाजी करने आते थे। उन्होंने उत्तरांचल राज्य रायफल संघ की ओर से प्रकाश पंत को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए परिजनों के प्रति संवेदना व्यक्त की।

पंत को याद कर जब भावुक हो गए सीएम त्रिवेंद्र
प्रकाश पंत के असामयिक निधन से मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत उस समय भावुक हो गए, जब उन्होंने पंत के साथ बिताए 30 साल की स्मृतियों का जिक्र किया। एक वीडियो में मुख्यमंत्री ने पंत की स्मृतियों को मीडिया से साझा किया। उन्होंने बताया कि किस तरह महज 40 साल की छोटी उम्र में अपनी काबिलियत के बूते वे पहली अंतरिम विधानसभा के अध्यक्ष बने। फरवरी में बजट सत्र के दौरान बजट भाषण पढ़ते हुए जब पंत बेसुध हुए, उस वक्त का जिक्र करते हुए मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत ने कहा कि उन्हें इसके बाद दिल्ली में संजय गांधी कैंसर इंस्टीट्यूट में भर्ती कराया गया।
टेस्ट के नतीजे आने के बाद केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने मुझे बताया कि प्रकाश पंत को एडवांस स्टेज का कैंसर है, जो बहुत रेयर किस्म का है। बहुत चिंता हुई। जब उन्हें उपचार के लिए अमेरिका ले जाया जा रहा था तो एक रात पहले मैंने उनसे रात 11 बजे अस्पताल में मुलाकात की। तब प्रकाश पंत ने मुझे कहा, मैं अमेरिका से स्वस्थ होकर लौटूंगा। आज उनके निधन की सूचना मिली। ये बयां करते करते मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत का गला रुंध गया और आंखों से आंसू छलक आए।

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वनों को ग्रामीण आर्थिकी से जोङने की बङी पहल

मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने बुधवार को मुख्यमंत्री आवास में पिरूल (चीड़ की पत्तियों) तथा अन्य प्रकार के बायोमास से विद्युत उत्पादन तथा ब्रिकेट इकाइयों की स्थापना हेतु 21 चयनित विकासकर्ताओं को परियोजना आवंटन पत्र प्रदान किये। उन्होंने नवोन्मेषी उद्यमियों का स्वागत करते हुए इसे पर्यावरण संरक्षण के लिये भी नई शुरूआत बताया। उन्होंने कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों से पलायन रोकना हमारी सबसे बड़ी चिन्ता है। राज्य निर्माण के बाद भी गांवों से हो रहा पलायन चिन्ता का विषय है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि पिरूल प्रकृति की देन है इसे व्यवस्थित कर ग्रीन एनर्जी में परिवर्तित करना हमारा उदेश्य है। पिरूल से ऊर्जा उत्पादन हेतु आज 21 उद्यमी आगे आए है। उन्हें भरोसा है कि इनकी संख्या शीघ्र ही 121 होगी। उन्होंने कहा कि इसमें राज्य को एनर्जी इंधन के साथ ही वनाग्नि को रोकने में मदद मिलेगी, जगंलों में हरियाली होगी तथा जैव विविधता की सुरक्षा होगी। उन्होंने कहा कि चीड़ से निकलने वाले लीसा से भी 43 प्रकार के उत्पाद बनाये जा सकते है। इसके लिए इंडोनेशिया से तकनीकि की जानकारी प्राप्त की जाएगी। इसका एक प्रोजेक्ट बैजनाथ में लगाया गया है। इससे भी वनाग्नि को रोकने में मदद मिलने के साथ ही हजारों लोगों को रोजगार उपलब्ध हो सकेगा।

उन्होंने कहा कि उत्तराखंड के वनों से हर साल 6 लाख मीट्रिक टन पिरूल निकलता है। इसके अतिरिक्त अन्य बायोमास भी निकलता है। इस तरह पिरूल व अन्य बायोमास से बिजली उत्पादन का जो लक्ष्य हमने रखा है उसकी शुभ शुरुआत होने जा रही है। पिरूल से बिजली उत्पादन के लिए उरेडा एवं वन विभाग को नोडल एजेंसी बनाया गया है। राज्य में विक्रिटिंग और बायो ऑयल संयंत्र स्थापित किए जाने हैं। इन संयंत्रों के स्थापित होने से पिरूल को प्रोसेस किया जाएगा व बिजली उत्पादन किया जा सकेगा। उरेडा द्वारा इसके लिए प्रस्ताव आमन्त्रित किए गए थे। अभी तक 21 प्रस्ताव जिसमें प्राप्त हुए जिनमें 20 प्रस्ताव पिरूल से विद्युत उत्पादन एवं एक प्रस्ताव पिरूल से ब्रिकेट बनाने के लिए शामिल है।

एक रूपया प्रति किलो से होगा भुगतान
पिरूल के जो सेंटर स्थापित किए जा रहे हैं उन तक पिरूल की सप्लाई सुनिश्चित करने के लिए महिला समूहों को रोजगार से जोड़ा जा रहा है। जंगलों से पिरूल कलेक्शन करने के लिए महिला समूहों को एक रूपया प्रति किलो की दर से भुगतान किया जाएगा।

बिना महक, सूखे फूलों से भगवान की हो रही पूजा अर्चना

क्या वेस्ट हो चुके फूलों से कोई भगवान को प्रसन्न कर सकता है, क्या ऐसे फूल जिसकी महक चली गई हो, भगवान को चढ़ाए जा सकते है। आप सभी का जवाब न में होगा। मगर, यह सच है। ऋषिकेश में वेस्ट हो चुके फूलों से अगरबत्तीयां बनाने के काम आ रही हैं। फिर यही अगरबत्तीयां भगवान की पूजा अर्चना में प्रयोग हो रही है।

फरीदाबाद हरियाणा के रहने वाले रोहित प्रताप ने बताया कि उन्होंने करीब साढ़े तीन लाख रुपये की लागत से अगरबत्ती बनाने का काम शुरू किया था। यह पूरी तरह से हस्तनिर्मित है। शाम के समय नगर निगम की गाड़ी से ऋषिकेश के प्रत्येक मंदिर से बासी फूलों को उठाया जाता है। जिन्हें सुखाकर उसका पाउडर बनाया जाता है। इसके बाद इसकी अगरबत्ती तैयार की जाती है। नभ अगरबत्ती के नाम से अगरबत्ती को मार्केट में उतारा गया है। पूरे निर्माण कार्य में कहीं भी कोयला और चारकोल का प्रयोग नहीं होता है। फिलहाल चारधाम यात्रा जाने वाले यात्रियों के लिए बीटीसी में अगरबत्ती का स्टॉल लगाया गया है।

महिलाओं को भी मिला रोजगार
अगरबत्ती बनाने के लिए वर्तमान में करीब 10 महिलाएं काम करती हैं। शाम के समय शिवाजी नगर क्षेत्र में करीब 20 महिलाओं को अगरबत्ती बनाने की ट्रेनिंग दी जा रही है।

प्रत्येक मंदिर में लगाए हैं फूल डालने के लिए डस्टबीन
बेकार फूलों को डालने के लिए उनकी ओर से ऋषिकेश के सभी मंदिरों में कूड़ेदान लगाए हुए हैं। सभी कूड़ेदानों पर आकर्षक ढंग से लिखा है कि रास्ते में पड़े फूलों को कूड़ेदान में डालें।

कंपनी जीडीसीएल के निर्माण कार्य पर नमामि गंगे असंतुष्ट, ठोका जुर्माना

लक्कड़घाट में सीवर ट्रीटमेंट प्लांट के लिए नगर के मार्गों पर नमामि गंगे का सीवर लाइन बिछाने का काम चल रहा हैं। इस कार्य को दिल्ली की जीडीसीएल कंपनी कर रही है। कंपनी को दिए समय के मुताबिक काम अभी तक 60 फीसदी हो जाना चाहिए था मगर, अभी तक 42 प्रतिशत ही कार्य पूरा हो सका हैं। वहीं कंपनी के कार्य में कई बार शिकायतें तथा दुर्घटना भी हो रही है। इसी को देखते हुए नमामि गंगे ने कंपनी को एक लाख रूपए का जुर्माना लगाया हैं। वहीं अन्य जुर्माने के लिए उच्चाधिकारियों को पत्राचार किया है।

नमामि गंगे के प्रोजेक्ट मैनेजर संदीप कश्यप ने बताया कि नमामि गंगे परियोजना के तहत कुल 72 करोड़ रुपये की लागत से लक्कड़घाट पर एक 26 एमएलडी का सीवर ट्रीटमेंट प्लांट, तीन पंपिंग स्टेशन (मायाकुंड, बापूग्राम, सर्वहारानगर) तथा करीब 15 किलोमीटर मार्ग पर भूमिगत सीवर लाइन बिछाने का काम चल रहा है। इस पूरे कार्य का जिम्मा दिल्ली की कंपनी जीडीसीएल को सौंपा गया है। उन्होंने बताया कि कंपनी की ओर से निर्माण कार्य में आए दिन लापरवाही के मामले सामने आ रहे है। इसी के चलते 24 अप्रैल को कंपनी पर एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया है। इसके अलावा उच्चाधिकारियों को और जुर्माना लगाने के लिए पत्राचार किया गया है।

लोनिवि, निगम, एनएच को दिया मुआवजा
प्रोजेक्ट मैनेजर (नमामि गंगे) संदीप कश्यप ने बताया कि भूमिगत सीवर लाइन बिछाने के कार्य के लिए जिस विभाग की सड़क को उखाड़ा जा रहा है, उसे पिछले वर्ष ही धनराशि उपलब्ध करा दी गई है। इसमें लोक निर्माण विभाग को दो करोड़ 31 लाख, नेशनल हाईवे को 94 लाख, नगर निगम को 87 लाख रुपये दिए गए हैं। उन्होंने बताया कि भूमिगत लाइन बिछाने का कार्य पूर्ण होने पर इसका टेस्टिंग कराया जाएगा। इस दौरान कहीं से भी लीकेज की समस्या आती है, तो दोबारा उसे दुरुस्त किया जाएगा। इसके बाद ही सड़क निर्माण हो सकेगा।